भारत की स्वतंत्रता की चर्चा जब होती है तो ध्यान आता है उन क्रांतिकारियों का, जिन्होंने 1857 में
स्वतंत्रता की बलि वेदी पर अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया। एक ऐसा स्वतंत्रता संग्राम जहां धर्म का
भेद नहीं था, जाति, तबके, ओहदे, क्षेत्र, क्षेत्रीयता, भाषा सब गौण थे। रोटी और कमल जहां क्रांतिकारियों की
जुबान थे, जहां महल और जनता एक साथ थी, जहां सिर्फ आजादी के मतवाले थे और जिस संग्राम ने
ईस्ट इंडिया कंपनी के 100 साल से ज्यादा पुराने राज काे भारत से उखाड़ फेंका था। 10 मई 1857 को
मेरठ से जब आजादी की यह ज्वाला भड़की तो हर कोई गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए उठ खड़ा
हुआ था……

भारत के इतिहास में 1857 का स्वतंत्रता संग्राम पहली ऐसी सशस्त्र क्रांति थी, जो इतने बड़े पैमाने पर हुई
और इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। कमल और रोटी इसके प्रतीक बने। क्रांति के लिए
31 मई 1857 का दिन तय किया गया था। लेकिन असल शुरुआत तय दिन से पहले ही 10 मई को
मेरठ की छावनी में हुई। चर्बी वाले कारतूस का उपयोग करने से मना करने पर भारतीय सिपाहियों को
कोर्ट मार्शल कर जेल में डालने का आदेश सुनाया गया था। लेकिन जेल तोड़ डाली गई और 85
सिपाहियों ने मेरठ की छावनी में आजादी के आड़े आने वाले हर अंग्रेज अफसर की हत्या कर दी। एक
गांव के निकट सब एकत्र हुए और फिर दिल्ली की ओर चल पड़े। बूढ़े मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर
को अपना नेता मान अंग्रेजों के खिलाफ सब मैदान में उतर पड़े। मेरठ और दिल्ली से चली क्रांति की
सूचना मिलते ही धीरे-धीरे दूसरे इलाके के लोग भी इसमें शामिल हो गए और अंग्रेजों को पहली बार
भारत में इतने बड़े सामूहिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। पेशवा नाना साहिब, तात्या टोपे, रानी
लक्ष्मीबाई, बाबू कुंवर सिंह, अजीमुल्ला खां, बेगम हजरत महल समेत कई क्रांतिकारी, संग्राम के प्रमुख चेहरे
के रूप में उभरे। क्रांति की इस ज्वाला को दबाने में अंग्रेजों को दो साल से ज्यादा लग गए और इसका
नतीजा भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खात्मे के रूप में हुआ। इस क्रांति ने भारत में एक
सामंती युग का अंत कर एक नवीन युग को जन्म दिया। जिसका नेतृत्व अब आने वाली प्रगतिशील व
शिक्षित भारतीय पीढ़ी करने वाली थी। इस विद्रोह ने भारतीय राजनीति, प्रशासन, सामाजिक व आर्थिक
व्यवस्था और राष्ट्रीय भावना को प्रभावित किया। वास्तव में 1857 की क्रांति न कोई सामान्य सिपाही
विद्रोह था, न ही कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया स्वरूप घटनाक्रम। भारत माता को स्वतंत्र करवाने के लिए
हमारे पूर्वजों द्वारा एक सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम था जिसके कारण 90 वर्ष बाद 1947 में हम आजाद
हुए।
मेरठ में जिस जगह से इस स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत हुई थी, वहां शहीद स्मारक के जरिए इन 85
वीर बलिदानियों की स्मृति काे संजोया गया है। इसी वर्ष जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद वहां गए
थे। पीएम नरेंद्र मोदी दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने मेरठ के इस शहीद स्थल
पर पहुंच कर अमर बलिदानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की 165वीं वर्षगांठ पर अमृत महोत्सव की श्रृंखला में इस बार पढ़िए
इस समर से जुड़े तात्या टोपे, ऊदा देवी, दो भाई नीलांबर और पीतांबर और पियाली बरूआ की बलिदान
गाथा…:-
छापामार युद्ध के महानायक तात्या
श में 1857 में आजादी का बिगुल फूंकने वाले बड़े नामों में एक नाम तात्या टोपे का भी शामिल हैं।
उन्होंने न सिर्फ 1857 में स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी बल्कि पूरे देश में आजादी की चेतना का सूत्रपात
किया। उन्होंने गुलामी को अपनी नियति मान चुकी जनता को यह बताया कि आजादी क्या होती है और
उसे हासिल करना कितना जरूरी है? 16 फरवरी 1814 को जन्मे तात्या टोपे का असली नाम रामचंद्र
पांडुरंग राव था। महाराष्ट्र का येवला उनका पैतृक गांव था। पेशवा बाजीराव द्वितीय जब पुणे से
निकलकर कानपुर के निकट बिठुर गए तो पुणे से कई परिवार उनके साथ वहां पहुंचे। इनमें पांडुरंग
परिवार भी शामिल था। पांडुरंग अपनी पत्नी, बच्चे रामचंद्र और गंगाधर के साथ बिठुर आ गए थे। बिठुर
में तात्या टोपे नाना साहेब और मोरोपंत तांबे(रानी लक्ष्मीबाई के पिता) के संपर्क में आए। वे नाना साहेब
के दोस्त, दीवान, प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख जैसे पदों पर रहे। ब्रिटिश सैनिकों ने जब झांसी को घेरा तो
नाना साहेब ने तात्या के नेतृत्व में ही सेना को भेजा। विष्णुभट गोड़से ने अपने यात्रा वृतांत ‘माझा
प्रवास’ में लिखा है कि इस युद्ध में तात्या टोपे की सेना बहुत बहादुरी से लड़ी, लेकिन तात्या ये युद्ध
नहीं जीत सके। कानपुर, चरखारी, झांसी और कोंच की लड़ाइयों की कमान तात्या टोपे के हाथ में थी।
चरखारी को छोडकर दुर्भाग्य से अन्य स्थानों पर उनकी पराजय हो गयी। तात्या और लक्ष्मीबाई को
कामयाबी मिली ग्वालियर में। ग्वालियर के किले पर उनके अधिकार करने के बाद अंग्रेज भी अचंभित रह
गए। यहीं अंग्रेजों के साथ एक बार फिर भीषण संग्राम हुआ, जहां रानी लक्ष्मीबाई को वीरगति मिली।
लेकिन नाना साहेब के भतीजे राव साहेब और तात्या अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। दोनों ने संघर्ष जारी
रखा। इसके बाद तात्या टोपे का जीवन अद्वितीय शौर्य गाथा से भरा है। लगभग सब स्थानों पर विद्रोह
कुचला जा चुका था, लेकिन तात्या ने एक साल की लम्बी अवधि तक मुट्ठी भर सैनिकों के साथ अंग्रेज
सेना को झकझोरे रखा। इस दौरान उन्होंने दुश्मन के खिलाफ एक ऐसे जबर्दस्त छापेमार युद्ध का
संचालन किया, जिसने उन्हें दुनिया के छापेमार योद्धाओं की पहली पंक्ति में लाकर खडा कर दिया। इस
छापेमार युद्ध के दौरान तात्या टोपे ने दुर्गम पहाड़ियों और घाटियों में बरसात से उफनती नदियों और
भयानक जंगलों के पार मध्य प्रदेश और राजस्थान में ऐसी लम्बी दौड लगाई, जिसने अंग्रेजी कैंप में
तहलका मचा दिया। कहा जाता है कि शिवपुरी के पास नरवर के राजा मानसिंह ने तात्या की जानकारी
अंग्रेजों तक पहुंचाई। गद्दारी के कारण तात्या 7 अप्रैल 1859 को सोते हुए पकड़ लिए गए। रणबांकुरे
तात्या को कोई जागते हुए नहीं पकड़ सका। विद्रोह और अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ने के आरोप में 15
अप्रैल 1859 को शिवपुरी में तात्या का कोर्ट मार्शल किया गया। उन्हें मौत की सजा दी गयी। शिवपुरी
के किले में उन्हें तीन दिन बंद रखा गया। 18 अप्रैल को शाम चार बजे तात्या को अंग्रेज कंपनी की
सुरक्षा में बाहर लाया गया और हजारों लोगों की उपस्थिति में खुले मैदान में फांसी पर लटका दिया
गया। कहते हैं तात्या फांसी के चबूतरे पर दृढ कदमों से ऊपर चढे और फांसी के फंदे में स्वयं अपना
गला डाल दिया। हालांकि इस प्रचलित कथन को लेकर बहुत विवाद रहे हैं। कहा जाता है कि अंग्रेजों ने
तात्या की जगह किसी और को पकड़ लिया था। तात्या की मृत्यु को लेकर विवाद भले ही हो, लेकिन
उनकी अप्रतिम वीरता ने अंग्रेजों के दांत जरूर खट्टे कर दिए थे।
ऊदा देवी: 30 से अधिक अंग्रेज सैनिकों को अकेले मारा
झांसी की रानी की तरह 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली एक वीरांगना ऊदा देवी को
दुर्भाग्य से वह यश और सम्मान नहीं मिला, जिसकी वह वास्तव में हकदार थीं। अवध क्षेत्र के उजरियांव
गांव के एक निर्धन परिवार में जन्मीं ऊदा देवी की पहचान अंग्रेजों को अचंभित करने वाली नायिका के
रूप में की जाती है। बचपन से ही ऊदा देवी के मन में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश था। 1856 में अंग्रेजों ने
अवध के नवाब वाजिद अली शाह को कोलकाता निर्वासित कर दिया और अवध की बागडोर उनकी बेगम
हजरत महल के हाथों में आ गई। कहा जाता है कि ऊदा देवी ने बेगम हजरत महल से अंग्रेजों के
खिलाफ जंग में भाग लेने देने की प्रार्थना की। इसके बाद बेगम ने उनसे महिलाओं की एक प्रशिक्षित
टुकड़ी तैयार करने को कहा। इसी दौरान ऊदा देवी का विवाह अवध सेना के एक सैनिक मक्का पासी से
हुआ। 10 जून 1857 को लखनऊ के चिनहट कस्बे के करीब इस्माइलगंज में ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज
के साथ विद्रोही सेना की हुई लड़ाई में मक्का पासी वीरगति को प्राप्त हो गए। पति की मौत का सदमा
ऊदा देवी के लिए प्रेरणा बन गया और वहीं से उनकी सोच और विचार में बदलाव हुआ। कहते हैं, ऊदा
देवी ने अपने पति के शव पर उनकी शहादत का बदला लेने की कसम खाई थी। 16 नवंबर 1857 को
अंग्रेजों की विशाल सेना ने लखनऊ के सिकंदरबाग को घेर लिया। उस समय सिकंदरबाग में करीब 2
हजार भारतीय सिपाहियों ने शरण ले रखी थी। ऊदा देवी ने अपनी महिला सैनिकों की टुकड़ी को अंग्रेजी
सेना का सामना करने का आदेश दिया। साथ ही, वह पुरुषों का लिबास धारण कर खुद दोनों हाथों में
पिस्तौल और कारतूस लेकर एक पीपल के पेड़ पर चढ़ गईं। वह वहां से घने पत्तों के बीच से अंग्रेजी सेना
को निशाना बनाने लगीं। उन्होंने हमलावर अंग्रेजी सैनिकों को सिकंदरबाग में तब तक नहीं घुसने दिया
जब तक उनका गोला-बारूद समाप्त नहीं हो गया। कहा जाता है कि ऊदा देवी ने एक स्नाइपर की तरह
हमला करके करीब 32 अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। अपने सैनिकों को ताश के पत्तों की
तरह गिरता देख कर अंग्रेजों को ऊपर से गोलियों के चलने का पता लगा। जब ऊदा देवी पेड़ से उतर
रही थीं तब अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें गोली मार दी। जब उनके मृत शरीर को नीचे उतारा गया तो दोनों
हाथों में पिस्तौल लिए पुरुष वेश में एक स्त्री को देख कर सब हैरान थे। कहा जाता है कि ऊदा देवी की
स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर अंग्रेज सेनानायक ने अपना हैट उतार कर उन्हें सलामी दी
थी। ऊदा देवी की वीरता का ब्रिटिश अधिकारियों पर इतना जबर्दस्त असर रहा कि उनकी वीरता के चर्चे
ब्रिटेन के अखबारों में प्रमुखता से छपे। आज भी पीलीभीत क्षेत्र में ऊदा देवी की वीरता और वीरगति की
प्रशस्ति में लोक गीत गाए जाते हैं। ऊदा देवी की वीरता और मातृभूमि के लिए समर्पण युवाओं के लिए
प्रेरणादायी और पूरे देश के लिए एक मिसाल है। 19 नवंबर 2021 को राष्ट्र रक्षा समर्पण पर्व के दौरान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वीरांगना ऊदा देवी की वीरता को याद किया था।
पियाली बरूआ ने 1857 की क्रांति में असम में अंग्रेजों के खिलाफ संभाल रखा था मोर्चा
सन 1857 में हुए भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में पियाली बरुआ ने न सिर्फ बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया
था बल्कि उन्होंने एक अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मणिराम दीवान के साथ मिल कर अंग्रेजों के
खिलाफ काम भी किया था। राष्ट्रप्रेम की ज्वाला मन में जलाए पियाली बरुआ को किसी भी तरीके से
पश्चिमी प्रभाव स्वीकार नहीं था। स्वतंत्रता सेनानी और असमिया नेता पियाली बरुआ ने स्वतंत्र असम के
लिये ब्रिटिश शासकों के खिलाफ क्रांति की शुरुआत की थी। उन्होंने असम में चीफ लेफ्टिनेंट के रूप में
अंग्रेजों के खिलाफ सभी योजनाओं को अंजाम दिया। उन्होंने 1857 की स्वतंत्रता की प्रथम लड़ाई के
दौरान अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोहों की रूपरेखा तय करने में मुख्य भूमिका निभाई। इसके लिए उन्होंने
असम के युवाओं से ब्रिटिश शासन का प्रतिरोध करने की अपील की और क्रांतिकारियों का एक समूह
गठित किया। कोलकाता में रहने के बावजूद मणिराम लगातार पियाली बरुआ के संपर्क में बने रहे और
योजना बनाते रहे। हालांकि, उनकी एक गुप्त बैठक से ठीक पहले, योजना का पर्दाफाश हो गया। इसके
बाद, अंग्रेजों ने मणिराम दीवान को कलकत्ता में, जबकि पियाली बरुआ को जोरहाट में गिरफ्तार कर
लिया। इन पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया और 26 फरवरी 1858 को उन दोनों को जोरहाट में
सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया गया। लोगों के दिलों में विद्रोह की चिंगारी भड़काकर क्रांति की
यह मशाल खामोश हो गयी। प्रत्येक वर्ष 26 फरवरी को पूरा देश स्वतंत्रता संग्राम के इन शहीदों को
श्रद्धांजलि अर्पित करता है। अंग्रेजों के खिलाफ उनकी लड़ाई और देश की आजादी के लिए उनके
बलिदान का सम्मान करने के लिए मणिराम दीवान और पियाली बरुआ दोनों की मूर्तियों को गुवाहाटी में
स्थापित किया गया है। n
पियाली बरुआ, एक असाधारण व्यक्तित्व के मालिक थे जिन्हें किसी भी तरीके से पश्चिमी प्रभाव
स्वीकार नहीं था।
नीलांबर और पीतांबर के गुरिल्ला युद्ध से कांपते थे अंग्रेज
सन 1857 में आजादी की पहली लड़ाई में अपनी शहादत देने वाले झारखंड के महानायक नीलांबर और
पीतांबर ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ
विद्रोह करने में अहम भूमिका निभाई थी। झारखंड के पलामू के रहने वाले नीलांबर और पीतांबर के मन
में राष्ट्र प्रेम की भावना बचपन से ही थी। ऐसे में जब नीलांबर-पीतांबर ने नेतृत्व संभाली तो पूरे पलामू
में विद्राेह की ज्वाला धधकने लगी और विद्राेहियाें काे स्थानीय जागीरदाराें और अन्य लाेगाें का समर्थन
मिलने लगा। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में दोनों भाइयों ने भोगता और खरवार समुदाय को मिलाकर एक
शक्तिशाली संगठन बनाया और अपनी शक्ति को मजबूत करने के लिए चेराें के जागीरदारों से दोस्ती कर
अग्रंजों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में बाबू कुंवर सिंह से भी इनका संपर्क
लगातार बना रहा। कहा जाता है कि इन दोनों भाइयों को गुरिल्ला युद्ध में महारत हासिल थी जिसके
कारण वे अंग्रेजों को काफी छकाते रहते थे और इनके नेतृत्व में काफी संख्या में ग्रामीण अंग्रेजों से
आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। इन लोगों के आंदोलन ने अंग्रेज सरकार को इतनी क्षति पहुंचाई थी कि
जनवरी 1858 में इलाके के कमिश्नर डाल्टन को मोर्चा संभालने के लिए स्वयं पलामू आना पड़ा। उनके
साथ भारी-भरकम सेना भी आई जिसके बाद यहां जोरदार संघर्ष हुआ। अंग्रेजों के कई बार की कोशिश के
बावजूद दोनों भाई को गिरफ्तार नहीं किया जा सका। आखिरकार काफी मशक्कत के बाद कर्नल डाल्टन
ने दोनों भाइयों को पकड़ लिया और उनके खिलाफ मुकदमा चलाकर महज 35 वर्ष की आयु में ही उन्हें
फांसी पर लटका दिया। 1859 में सरेआम पहाड़ी गुफा के सामने आम के पेड़ पर इन्हें फांसी दी गई थी
ताकि आदिवासियों का मनोबल टूट जाए लेकिन आज भी यहां के लोग बड़ी श्रद्धा से उनको याद करते
हैं। नीलांबर और पीतांबर के गांव चेमो सान्या में आज भी वो पेड़ मौजूद हैं, जिसके नीचे बैठकर दोनों
भाई अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के लिए रणनीति बनाया करते थे। कहा जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के
खिलाफ 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नीलांबर-पीतांबर ने सिर्फ पलामू प्रमंडल में ही नहीं,
बल्कि आरा, भोजपुर, सरगुजा, रांची, लोहरदगा, गुमला एवं चतरा तक अंग्रेजों के खिलाफ लोहा लेने का कार्य
किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर 15 नवंबर, 2021 को रांची में
भगवान बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान सह स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय का उद्घाटन किया जिसमें विभिन्न
आंदोलनों से जुड़े अन्य जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के साथ-साथ नीलांबर-पीतांबर के बारे में भी
जानकारी प्रदर्शित की गई है।





