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*सतयुग काल में हुई थी गढ़कालिका मंदिर की स्थापना, आज भी चढ़ते हैं कपड़े से बने नरमुंड*

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धार्मिक नगरी उज्जैन में मां गढ़कालिका का मंदिर अत्यंत प्राचीन है। ऐसा माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारत काल में हुई थी, जबकि मां की मूर्ति सतयुग काल की बताई जाती है। मंदिर का जीर्णोद्धार ईस्वी संवत 606 में सम्राट हर्षवर्धन ने करवाया था। स्टेट काल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। पुराने शहर के गढ़क्षेत्र में प्राचीन भैरव पर्वत पर माता गढ़कालिका विराजित हैं। दक्षिण भारतीय परंपरा में इसे शक्तिपीठ या देवी पीठ माना गया है।

Navaratri 2025: Ancient Garhkalika Temple, devotees offer cloth-made narmund to Goddess during festival

महाभारत काल में हुई थी मंदिर की स्थापना

गर्भगृह में माता कालिका की मूर्ति मुखाकृति में विराजित है, जो भयानक रूप वाली लेकिन हंसती हुई दिखाई देती हैं। मूर्ति के आसपास माता महालक्ष्मी और माता सरस्वती भी विराजित हैं। मंदिर की शासकीय पुजारी महंत करिश्मा नाथ के अनुसार माता गढ़कालिका संहारकारिणी शक्ति स्वरूप हैं और ललाट पर हिंगलू से बना गोलाकार रक्ताभ टीका, विशाल नेत्र और लपलपाती जिह्वा उन्हें अत्यंत दर्शनीय बनाते हैं। महाकवि कालिदास भी मां गढ़कालिका के उपासक माने जाते हैं।

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आज भी चढ़ते हैं कपड़े से बने नरमुंड

माना जाता है कि आज भी मंदिर में कपड़े के बने नरमुंड चढ़ाए जाते हैं और दशहरे के दिन नींबू का प्रसाद वितरित किया जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि घर में ये नींबू रखने से सुख-शांति बनी रहती है। नवरात्रि में माता के दर्शन मात्र से अपार सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है। मंदिर तांत्रिक क्रियाओं के लिए भी प्रसिद्ध है और इस दौरान माता भक्तों को अलग-अलग रूपों में दर्शन देती हैं।

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दशहरे पर बंटता है नींबू का प्रसाद

महाकवि कालिदास से जुड़ी मान्यता के अनुसार एक बार पेड़ की डाल काटने पर उनकी पत्नी विद्योत्तमा ने उन्हें फटकार लगाई। इसके बाद कालिदास ने मां गढ़कालिका की उपासना की और महान कवि बन गए। उज्जैन में हर साल होने वाले कालिदास समारोह के आयोजन से पहले माता कालिका की आराधना की जाती है।

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भैरव पर्वत पर विराजित हैं माता गढ़कालिका

शक्ति संगम तंत्र में भी माता गढ़कालिका का उल्लेख है। मंदिर के आसपास के मार्ग नीचे होने के कारण यह स्पष्ट होता है कि मंदिर पर्वत पर स्थापित था। विभिन्न कालखंडों में मंदिर के जीर्णोद्धार के प्रमाण भी मिलते हैं। तांत्रिक क्रियाओं के लिए भी यह मंदिर मशहूर है। यहां पर पूर्व में बलि प्रथा भी थी लेकिन अब समय के साथ बलि प्रथा बंद हो गई है। 

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दक्षिण भारतीय परंपरा में यह मंदिर शक्तिपीठ या देवी पीठ माना गया है

मंदिर में लाखों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। पुजारी रामस्वरूप शर्मा बताते हैं कि यह महाकवि कालिदास और सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी हैं। गढ़कालिका माता के दर्शन मात्र से सुख, शांति, समृद्धि और वैभव की प्राप्ति होती है। यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है और उप-शक्तिपीठ भी कहा जाता है। नवरात्रि के अलावा आम दिनों में भी श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। श्रद्धालु दीपक चंदेल के अनुसार पिछले 20 साल से वे माता के दर्शन के लिए आते हैं और अब तक जो भी उन्होंने मांगा वह सब पूरा हुआ है।

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ग्वालियर के महाराजा ने कराया था मंदिर का पुनर्निर्माण

शारदीय नवरात्रि में मंदिर में रोज नए शृंगार और झांकियां सजाई जाती हैं। इसी कड़ी में नवरात्रि के पहले दिन गुफा में मां गजलक्ष्मी के रूप में दर्शन कराए गए। शासकीय पुजारी महंत करिश्मा नाथ ने बताया कि दूसरे दिन 23 सितंबर को गन्ने से सजावट कर त्रिपुरसुंदरी-ललिता स्वरूप में दर्शन हुए। तीसरे दिन 24 सितंबर को चूड़ियों से सजावट कर तारा देवी स्वरूप में, चौथे दिन 25 सितंबर को कुटिया में अन्नपूर्णा स्वरूप में, पांचवें दिन 26 सितंबर को चॉकलेट से सजावट कर भद्रकाली स्वरूप में, छठे दिन 27 सितंबर को विभिन्न फूलों से सजावट कर महाकाली स्वरूप में दर्शन कराए गए। इसी प्रकार नवरात्रि के नौ दिनों में माता अलग-अलग रूपों में भक्तों को दर्शन देती हैं।

Ramswaroop Mantri

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