शशिकांत गुप्ते
इन दिनों विनोदपूर्ण प्रतिस्पर्धा चल रही है। विभिन्न तरह की रेवड़ियां बांटने की घोषणाएं हो रही है। मानों रेवड़ियां बांटों प्रतिस्पर्धा चल रही है।
मूलभूत समस्याओं के लिए तो कुछ अति समझदार लोग कहते हैं,ये मूलभूत समस्याएं तो सदियों से चली आ रही है। संभवतः ये अति समझदार लोग यथास्थितिवाद के पक्षधर होते हैं। जो चाहते ही नहीं कि, परविर्तन हो।
इतिहास में यदि राजाराम मोहन राय,स्वामी दयानंद स्वरस्वती,
महात्मा फुले,उनकी सहचरी सावित्री बाई फुले, महात्मा गांधी, विनोबा भावे,इन परिवर्तनकारियों की बहुत लंबी फेरहिस्त है। यदि ये सभी लोग रूढ़ियों और कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष नहीं करते तो आज जो सामाजिक क्षेत्र में परिवर्तन दिखाई दे रहा है,वह परिवर्तन होता?
इसी तरह स्वतंत्रता संग्राम में असंख्य देशभक्तों ने अपनी शहादत दी,असंख्य देशभक्तों ने सक्रिय भूमिका निभाई, जेल गए,यातनाएं सही। यदि ये सभी यथास्थितिवादी होते तो ये लोग भी इसी दकियानूसी सोच को रखते हुए कहते हम तो हजारों वर्षो गुलाम रहें हैं?
एक सुनियोजित वैचारिक षडयंत्र के तहत स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए गए अमूल्य संघर्ष को भुलाने की साज़िश चल रही है।
इतिहास को बदलना किसी के लिए भी संभव नहीं हैं।
यह साज़िश ठीक इस संवाद जैसी ही जो संवाद दस वर्ष पूर्व प्रचलित किए गया। यह संवाद है,देश में सत्तर साल कुछ भी नहीं हुआ।
किसी व्यक्ति ने अपने स्वार्थपूर्ति के लिए उक्त संवाद बोला,अंध भक्तो ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किए बगैर उक्त संवाद को दौहराना शुरू कर दिया।
उक्त संवाद दौरहाराने वालों में वे भी शामिल थे,जो अभीतक सत्तर से पिचहत्तर सावन देख चुके हैं।
जिन्होंने इन्ही दिनों में स्कूल कॉलेज की पढ़ाई पूर्ण की और विभिन्न महाकमों में नौकरी, व्यापार किया,अपना निजी व्यवसाय किया,अपने बच्चों को भी पढ़ाया, बैंक से ऋण लेकर अपना मकान बनाया,और शासकीय सेवा से सेवानिरुत्त होने पर पेंशन प्राप्त की,जो लोग पेंशन प्राप्त करने कुछ अंतराल के बाद स्वर्गवासी हो गए उनकी अर्धार्गिनियो को फैमिली पेंशन का लाभ मिला।
क्या यह उन्ही सत्तर वर्षों में नहीं हुआ?
“सहिष्णुता एक आदर्श मानसिक सोच है,और अन्याय सहन करना बुजदिली है।”
लोकतंत्र में जनता द्वारा सत्ता से सवाल कर समस्याओं को हल करवाना जागृत मानसिकता का द्योतक है।
कारण लोकतंत्र में जनता ही देश की मालिक है।
समस्याओं के लिए यह कहना की समस्याएं तो सदियों से चली आ रही है,यह गुलामी मानसिकता ही है।
परिवर्तनकारी हर क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन के पक्षधर होते हैं।
गांधीजी ने समाज के कल्याण के लिए सुधारवादी तरीके को त्याग कर परिवर्तनकारी तरीका ही अपनाया था।
आज हर क्षेत्र में वैचारिक क्रांति आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है।
सन 1974 में स्वतंत्रता सैनानी जय प्रकाश नारायण जी वैचारिक क्रांति का आव्हान किया था।
आज समाज में साहित्यकार,
लेखक,चिंतक,शिक्षक और सभी जागरूक नागरिकों का कर्तव्य है, कि, दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर देशहित में वैचारिक क्रांति में अपना योगदान देना चाहिए।
इस संदर्भ में दुष्यंत कुमार रचित यह दो शेर मौंजू है।
कौन कहता है आसमाँ में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
शशिकांत गुप्ते इंदौर





