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वैश्विक फलक : ख़तरनाक हो रहा है खालिस्तान के बहाने बटवारा

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पुष्पा गुप्ता

     _कुछ दिन पहले एक किताब आई थी, ‘ब्रदरहुड ऑफ सैफ्रन ‘, इसे लिखने वाले का नाम है वाल्टर एंडरसन, जो अमेरिका में हिंदू थिंक टैंक के चिरपरिचित चेहरों में से एक हैं। वाल्टर एंडरसन 1980 में नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास में तैनात थे। अब इससे अंदाजा लगा लीजिए कि कितना लंबा खेल हुआ होगा। आप विदेशी थिंक टैंक के लोगों से किताबें लिखवाकर वैचारिक विभाजन करवाइये, मगर अंततः उसे भुगतना इस देश को ही है!_

          अप्रवासी भारतीय खालिस्तान के सवाल पर कभी एकमत नहीं हो सकते. मगर,  इसे सुनियोजित तरीक़े से सुलगाने, और प्रवासियों को बाँटने की कोशिश हो रही है. इस काम में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो से लेकर पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान खामौशी से लगा हुआ है. करतारपुर से कनाडा तक साज़िशों के ताने-बाने को कैसे भंग कर पाएंगे?

    भारत सरकार मूक दर्शक होकर देखती रहेगी, यह नासूर बढ़ता जायेगा !

         टोरंटो से ब्रैम्टन की दूरी 44 किलोमीटर की है। लगभग आधे घंटे का सफ़र। मेरी पत्रकार मित्र वी. राधिका टोरंटो में ही सेटल्ड हैं। एक दिन सुझाया कि कनाडा में सिख प्रवासियों को समझना है, तो आधे दिन के वास्ते ब्रैम्टन चले जाओ। यह 2004 की बात है। ब्रैम्टन सिख अलगाववादी राजनीति का अधिक्रेंद्र देखते-देखते नहीं बना, उसमें वहां की सरकार की भी अहम भूमिका रही है, यह उस जगह पर जाने के बाद स्पष्ट हो जाता है।

कनाडा की कुल आबादी का डेढ़ प्रतिशत सिख हैं, तो वहां सरकार उनकी न सुने, ऐसा संभव नहीं। भारत में सिखों की संख्या 1.7 प्रतिशत है। मानकर चलिये कि कुछ वर्षों मंे कनाडा में प्रवास करने वाले सिख भारत जितने हो जाएंगे। 18 सितंबर 2022 को ब्रैम्टन में खालिस्तान पर रेफरंडम का आयोजन किया गया।

    उस मतसंग्रह में एक लाख से अधिक सिखों की हिस्सेदारी ने कई सवाल खड़े किये हैं।

        कनाडा में 13 लाख 75 हज़ार भारतवंशियों की आबादी में लगभग चार लाख हिंदू और पांच लाख सिख हैं, बाक़ी दूसरे मतों को मानने वाले। मतलब, खालिस्तान के वास्ते तथाकथित मतसंग्रह में एक चौथाई से भी कम सिखों ने हिस्सा लिया। चार लाख प्रवासी सिखों ने इस कार्यक्रम से दूरी बनाकर रखी थी।

       जिन एक लाख सिखों ने ब्रैम्टन के गोर मेडो कम्युनिटी सेंटर पर आयोजित मतसंग्रह में हिस्सा लिया, उनमें पाकिस्तान वाले कितने हैं, यह भी खोज का विषय है। गुज़िश्ता रविवार को ब्रैम्टन से इस घटना की जो रिपोर्ट कर रहे थे, बताते हैं कि यह एक मेगा इवेंट जैसा था।

        पूरा ब्रैम्टन शहर खालिस्तान के झंडे, बैनर, द्वार से सुसज्जित। खलिस्तान का लोगो और टीशर्ट आये हुए अतिथियों को बांटे जा रहे थे। वोटरों के लिए लंगर का विशेष इंतज़ाम। 

मतसंग्रह के पांच दिन बाद 23 सितंबर को भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने एक एडवाजरी जारी करते हुए कनाडा में रह रहे अनिवासी भारतीयों व छात्रों से कहा है कि वो हेट क्राइम से सतर्क रहें। उन्हें कोई इसका शिकार बनाता है, तो वो ‘मदद पोर्टल‘ पर जाएं, और अपनी शिकायत रजिस्टर्ड करें। खालिस्तान पर मतसंग्रह से पहले टोरंटो स्थित बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर की दीवारों को भारत विरोघी ग्रैफिटी से कुछ उपद्रवी तत्वों रंग दिया था।

      वहां खलिस्तान समर्थक स्लोगन भी उकेर दिये थे। टोरंटो में भारतीय वाणिज्य दूतावास की दीवारों पर भी ऐसा कुछ हुआ था, उसके कुछ विजुअल्स पाकिस्तान के जियो न्यूज़ ने दिखाये थे। ऐसी करतूत में सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) का नाम सबसे आगे है। 

सबसे दुखद पहलू यह है कि खालिस्तान की आवाज को बुलंद कराने में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का पूरा समर्थन है। जस्टिन ट्रूडो ने बाकायदा बयान दिया कि खालिस्तान के वास्ते मतसंग्रह जबतक शांतिपूर्ण है, हम उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं सकते।

      यह कनाडा के क़ानून द्वारा प्रदत अधिकार है कि किसी विषय पर आप मत संग्रह करा सकते हैं। फ्री स्पीच, असेंबली कनाडा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। कनाडा सरकार अखंड भारत के अस्तित्व को स्वीकार करती है। हमने अपने पोजिशन में कोई बदलाव नहीं किया है।

      हम किसी एडवोकेसी ग्रुप द्वारा मतसंग्रह को मान्यता नहीं देते, मगर हम उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं सकते हैं। 

       थोड़ी देर के वास्ते मान लिया कि कनाडा के प्रधानमंत्री अपने देश के आइन को लागू कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन एक उदाहरण के हवाले से वह अपने कुतर्क में खु़द फंस जाएंगे। ओंटारियो गुरूद्वारा कमेटी बाकायदा आदेश जारी करती है कि हमारे घर्मस्थलों, ख़ुसूसन ब्रैम्टन के गुरूद्वारो में दूतावास या भारत सरकार का कोई अधिकारी प्रवेश नहीं करेगा।

     अब कोई जस्टिन ट्रूडो से पूछे कि कनाडा की घरती पर यह आदेश कैसे लागू हो सकता है?

        टोरंटो स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के आगे जो कुछ उपद्रव हुआ उसके पीछे की कथा यह है कि ओंटारियो के अंतर्गत आने वाले केल्डोन शहर में किसी इंडो-कैनेडियन नागरिक ने भिंडरावाला का बैनर फाड़ दिया था, जिसे बाद ने पुलिस ने हिरासत में ले लिया था।

       इस घटना की प्रतिक्रिया में कोई पांच सौ सिखों का हुजूम टोरंटो स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के आगे प्रदर्शन करने पहुंच गया। उनका आरोप था कि यह सब दूतावास के उकसावे पर हुआ है। वो बोल रहे थे, ‘जनरैल सिंह भिंडरावाला शहीद हैं, संत हैं, खालिस्तान आंदोलन के आइकॉन हैं, हम उनका अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे।‘

       इस तरह का कांड करके उत्तर अमेरिका में हिंदू-सिखों को विभाजित करने की चेष्टा पहले से हो रही है, इस सच से हम इंकार नहीं कर सकते। ऐसे खेल में न सिर्फ़ प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो व उनके शैदाई सिख सांसद शामिल हैं, बल्कि पाकिस्तान का दूतावास भी अहम भूमिका अदा कर रहा है।

यह एक ख़तरनाक पहलू है कि इस इलाक़े में रहने वाले भारतवंशियों को बांटने की साजिश चल रही है। 2021 में प्रवासी भारतीयों के बारे में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में जानकारी दी गई कि विदेश रहने वाले भारतीयों की संख्या 18 करोड़ है।

       हर साल प्रवासी भारतीयों की संख्या में दस लाख का इजाफा होता गया है। 2010 से ‘एनआरआई-पीआईओ’ की आबादी में 17. 2 प्रतिशत की दर से बढ़त हो रही है। ये कहने को प्रवासी हैं, मगर इनमें खेमे बंटे हुए हैं। एक, भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान का समर्थक और दूसरा विरोधी।

        कुछ ऐसे भी हैं, जो इस खेमेबाजी से दूर अपने काम और परिवार से सरोकार रखते हैं। इंडियन डायसपोरा में यह खेमेबाजी मई 2014 के बाद से व्यापक रूप से दिखी है। जो लोग दुनियाभर में डायसपोरा को मॉनिटर करते हैं, उन्हें भी इस नये ट्रेंड पर हैरानी है। 

विदेशों में बसे भारतीय, अखाड़े के रूप में इस्तेमाल किये जाएंगे, इसकी शुरूआत किसने की होगी? मत सोचिये कि पीएम मोदी ने शुरूआत की है। प्रख्यात कूटनीतिक के.सी. सिंह बताते हैं, ‘9 जनवरी 1915 को महात्मा गांघी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आये। उस घटना की स्मृति में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हर साल प्रवासी भारतीयों के किसी प्रमुख सदस्य को सम्मानित करने का निर्णय लिया।

       यह भी तय हुआ कि प्रवासी भारतीयों को पद्म सम्मान दिया जाए। इसके लिए घनघोर लॉबी होने लगी।

एंबेसडर के.सी. सिंह अब अवकाश प्राप्त हैं। उनकी यह टिप्पणी भारतीय दूतावासों की दुविधा, और अप्रवासी संगठनों के बीच प्रतिस्पर्धा के बारे में बहुत कुछ बता जाती है। दिल्ली-मुंबई में जो रहते हैं, उन्हें लगता है कि विदेश में रहने वाले सारे भारतीय एक है।

कनाडा-अमेरिका की सिख राजनीति को अपवाद मानें, तो 2002 से पहले यह स्थिति थी। आज की जमीनी हकीकत यह है कि वहां भी धर्म, समुदाय, प्रांतवाद के आधार पर एनआरआई-पीआईओ देश में मौजूदा नेतृत्व के प्रति अपनी निष्ठा बदलने लगे हैं।

       यह दिलचस्प है कि इंडियन डायसपोरा में गुजरातियों की संख्या 33 फीसदी है। सबसे अधिक गुजराती ब्रिटेन में हैं। साढ़े-छह लाख के आसपास, दूसरे नंबर पर अमेरिका है, जहां पांच लाख से अधिक गुजराती रहते हैं। ये दो ऐसे लोकेशंस हैं, जहां से पूरे यूरोप और उत्तर अमेरिका में भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान के लिए माहौल बनाया जाता है।

       प्रधानमंत्री मोदी ने इस ऊर्जा को पहचाना है, और इन्हें वक्त जरूरत के हिसाब से उनके इवेंट मैनेजर ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करने लगे। प्रवासी गुजरातियों के दूसरे गढ़ केन्या, कनाडा, ओमान, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, पुर्तगाल हैं।

देश की कुल आबादी का करीब सवा प्रतिशत विदेश में हो, और उसका 33 फीसदी हिस्सा गुजराती समुदाय का हो, तो वह उनके पराक्रम को गायेगा ही। एक आम गुजराती पीएम मोदी का जो अक्स ख़ुद में देखता है, कभी डॉ. मनमोहन सिंह के वास्ते कनाडा से अमेरिका में बैठे सिख एनआरआई देखा करते थे। 

       जुलाई 2006 में अमेरिका से जो भारत की न्यूक्लियर डील हुई, उसमें उस इलाके में मजबूत सिख लॉबी की बड़ी भूमिका रही थी। कनाडा में भारतीय प्रवासियों में सिखों की संख्या 34 फीसदी है, और हिंदू 27 प्रतिशत हैं। इसी हवाले से प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने तंज करते हुए कहा था, ‘हमारे कैबिनेट में जितने सिख हैं, मोदी मंत्रिमंडल में भी नहीं होंगे।’ यह बात तो हंसी-मजाक की थी।

       मगर, प्रवासियों के बीच समुदाय की राजनीति का साइड इफेक्ट यह हुआ कि कनाडा में सिख बनाम हिंदू की राजनीति आरंभ हुई। यह ठीक है कि इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी ने उठाया, मगर बाकी भारतवंशियों की आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई।

       संघ के लोग मानते हैं कि यूके से उत्तर अमेरिका तक उसके चालीस लाख समर्थक एक बड़ी ताकत हैं। भारत में सोशल मीडिया 2014 के बाद जाग्रत हुई है, उससे डेढ़ दशक पहले यूके से उत्तर अमेरिका तक हिंदू चेतना इंटरनेट के जरिये सुलगाई जा चुकी थी।

        उस फसल को आज प्रधानमंत्री मोदी व्यापक रूप से काट रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज की तारीख में ग्लोबल है। ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ (एचएसएस) नाम से 39 देशों में उसकी जड़ें फैली हुई हैं।  

   (चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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