~ पुष्पा गुप्ता
क्या हारून-अल-रसीद, इब्न सीना और इब्न रुश्द जैसे सत्वग्रही तत्वों की पुन: प्रतिष्ठा हमारे समय की बुनियादी ज़रूरत नहीं है? आइये पहले समझते हैं वर्तमान धर्मांधता और विचारांधता का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य :
किसी मज़हब या विचारधारा को समझने के लिए पुस्तकों में लिखे उसके सिद्धांतों के साथ उसके इतिहास को जानना उतना ही ज़रूरी है। देखा यह गया है कि किसी मज़हब या विचार को व्यवहार में उतारने के लिए जैसे लोग मिले हैं वह वैसा ही हो गया है। व्यवहार्यता ही सभी मज़हबों एवं विचारों की असली कसौटी है। और व्यवहार में उन्हें लाता है मनुष्य। मनुष्य की एक सिफ़त यह है कि वह उदात्त से उदात्त मज़हब या विचार को व्यवहार में अपने स्वभाव के अनुरूप ढाल लेता है।
यही कारण है कि किसी भी मज़हब या विचारधारा में कोई भी दो मनुष्य हूबहू एक से नहीं मिलते। जब जिस स्वभाव के मनुष्य / मनुष्यों का वर्चस्व होता है, तब उसी के अनुरूप मज़हब और विचार ढल जाते हैं।
सन् 1996 में अमेरिकी राजनीतिशास्त्री सैम्युएल पी हंटिंगटन की एक पुस्तक आई—The Clash of Civilizations and the Remaking of World Order. शीतयुद्धोत्तर विश्व के बारे में उत्तर अधुनिकतावादियों के ‘इतिहास के अंत’ के बचकाने प्रमेय के जवाब में हंटिंगटन ने अपनी पुस्तक में प्रतिपादित किया कि शीतयुद्धोत्तर विश्व में धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिताएँ ही द्वंद्व और संघर्ष के मूल आधार बनेंगी और तज्जनित युद्ध राष्ट्रों के बीच नहीं, राष्ट्रों के भीतर धर्मों और संस्कृतियों के बीच लड़े जाएँगे।
सभ्यताओं का संघर्ष—यह जुमला कामू से शुरू होकर कई विश्लेषकों द्वारा इस्तेमाल हो चुका था जिनमें संयोग से अयोध्या विवाद पर लिखनेवाले गिरिलाल जैन भी शामिल थे। हंटिंगटन ने साफ़ किया कि वे ऐसे युद्ध की वकालत नहीं कर रहे हैं, बस वैचारिकी पर आधारित संघर्ष के समाप्त होने पर विश्व के नए परिदृश्य का ख़ाक़ा खींच रहे हैं (जिससे निपटने की समुचित तैयारी की अपेक्षा थी)।
हंटिंग्टन ने चिन्हित किया कि इस्लामिक सभ्यता में जनसंख्या का (जन्म और धर्म-परिवर्तन से) जबर्दस्त विस्फोट हुआ है जिससे उसकी सीमाओं पर और उसके भीतर भी बुनियादपरस्ती का ज्वार बढ़ रहा है जो एक विश्वव्यापी अस्थिरता पैदा करेगा। इसके पीछे पश्चिमी सभ्यता और उसके मूल्यों से आहत होने और अपनी प्राचीन सांस्कृतिक पहचान की रक्षा और उसका विस्तार करने की भावना निहित है।
पश्चिमी सभ्यता के आघात से अपने सांस्कृतिक मूल्यों की सुरक्षा और उनके दृढ़ीकरण के लिए इस संस्कृति के एक मुखर वर्ग में प्रतिद्वंद्विता का युयुत्सु भाव है। उसके लिए यह अपना आधुनीकरण करेगी, शक्ति-संचय करेगी और अपनी अस्मिता के उन्मेष से ‘सब कुछ या कुछ भी नहीं’ की भावना से बहुकोणीय संघर्ष करेगी।
इस प्रक्रिया में राष्ट्रों के भीतर जो सांस्कृतिक संकट के बिंदु (fault lines) हैं—चेचन्या, बोस्निया, कश्मीर वगैरह–वहाँ अशांति की ज्वाला धधक सकती है.
इस पुस्तक की प्रतिक्रिया में और हंटिंग्टन के इस प्रमेय की काट के लिए कई पुस्तकें आईं जिनमें वस्तुस्थिति की इस निर्मम व्याख्या के विरुद्ध आदर्शवादी, सैद्धांतिक विमर्श के सहारे मानवमूल्यों की पैरवी की गई और ख़ासकर धर्म के भावात्मक प्रभाव की एकांतिकता को नकारा गया। इस अभियान में अपने अमर्त्य सेन ने भी Identity and Violence शीर्षक से एक बहुत भाव-प्रवण किताब लिखी जिसमें मनुष्य की अस्मिता में धार्मिक एकान्तिकता पर ज़ोर देने का प्रबल विरोध किया।
उन्होंने यहाँ तक आरोप लगाया कि आतंक के विरुद्ध युद्ध में हंटिंग्टन के प्रमेयों के आधार पर मुसलमानों की धार्मिक और पश्चिम-विरोधी पहचान की एक गढ़ंत गढ़ी जा रही है जो मानव-विरोधी है। दु:ख यही है कि इतिहास उच्च आदर्शों, महान मूल्यों और सैद्धांतिक विवेचनों के सहारे नहीं चलता।
1996 से लेकर आज तक जो हुआ है, हंटिंगटन के निर्मम यथार्थवादी प्रमेयों का ज़मीन पर उतरकर विश्व के लिए एक अकल्पित संकट पैदा करने का इतिहास है जिससे हम अभी भी मुक्त नहीं हो पाए हैं। आवश्यकता है, इसके कारणों की खोज में हम पीछे दूर तक इतिहास की एक निर्लिप्त यात्रा करें।
दुनिया के सांगठनिक धर्मों और विचारधाराओं का इतिहास पढ़ने पर एक नैराश्यपूर्ण आशंका होती है—कहीं अंध-आस्था और अंध-भक्ति मनुष्य के स्थायी और प्रकृत गुण तो नहीं। और वर्तमान विश्व-परिदृश्य की ओर नज़र डालने पर यह आशंका दृढ़ होने लगती है। इतिहास तो यही बताता है कि सभी धर्मों और विचारधाराओं का प्रणयन स्थान विशेष और काल विशेष की परिस्थितियों में, उन्हीं के मद्देनज़र हुआ लेकिन उनके अंध-अनुयायियों ने उन्हें सार्वभौम और सार्वकालिक बनाकर बहुत वितंडावाद खड़ा किया। इससे मानव-ज्ञान और मानव-संस्कृति के स्वत:स्फूर्त विकास के मार्ग में विकट बाधा उत्पन्न हुई।
विडंबना यह है कि इस तरह का अंधानुकरण उन प्रणेताओं के काम की बुनियादी तासीर के सर्वथा प्रतिकूल था, जिन्होंने अपने समय में सड़-गलकर असंगत हो चुकी मान्यताओं को चुनौती दी और भीषण विरोध के बावजूद उस समय के अनुरूप नए, अग्रगामी और इसलिए मानवता के लिए उपयोगी विचार दिए।
इस संबंध में ईसाइयत का इतिहास आँख खोलनेवाला है। रोमन साम्राज्य के मूर्तिपूजक दौर में ईसाइयों के उत्पीड़न और ईसाई संतों की शहादत का भयानक दौर चला, जो ईसाई धर्म की लोकप्रियता और उसके प्रचार-प्रसार का सबसे अहम कारण बना। लेकिन जैसे ही सम्राट कॉन्स्टेन्टाइन ने ख़ुद ईसाई धर्म स्वीकार कर (313 A D) इसे साम्राज्य का आधिकारिक धर्म बना दिया, चक्र उल्टी दिशा में चल पड़ा और साम्राज्य की ग़ैर-ईसाई प्रजा का ठीक उसी तरह उत्पीड़न शुरू हो गया, जैसे पहले ईसाइयों का हो रहा था।
बाद में पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन और पोप द्वारा रोमन साम्राज्य के भूत-तुल्य ‘पवित्र रोमन साम्राज्य’ की स्थापना (800 ई.) के साथ चर्च के खोखले आडंबरों और ईसाई जगत (Christendom) पर उसके निरंकुश नियंत्रण ने पूरे यूरोप को मध्ययुगीन अंधकार में डुबो दिया, जिसमें पुराने यूनान का मुक्त, विवेकपूर्ण चिंतन पूरी तरह लुप्त हो गया, और सारा चिंतन-मनन-लेखन सम्राट और पोप–लौकिक और पारलौकिक सत्ता–के अधिकार-क्षेत्र को लेकर चल रहे विवाद के इर्दगिर्द घूमने लगा।
थोड़े-से धर्माधिकारियों को छोड़कर (कई राजाओं सहित) अधिकांश जनता अशिक्षित ही नहीं, निरक्षर थी। विशाल भू-संपत्ति के स्वामी चर्च के निरंकुश पदाधिकारी, और ऊपर से नीचे (सम्राट से लेकर भू-स्वामी) तक प्रभु और अधीनस्थ (Lord and Vassal) की शृंखला में बंधे सामंत मिलकर ईसाई जगत का वह क्रूर परजीवी वर्ग बनाते थे जिसका सारा ताम-झाम निरीह, विवश भू-दासों (serfs) के श्रम पर निर्भर था।
मध्ययुग के इस अंधकार, धर्मोन्माद और विशेषाधिकार-केन्द्रित विषम सामाजिक व्यवस्था पर प्रभावी आघात किया पुनर्जागरण (Renaissance) ने, जो इटली के उन तटीय शहरों– वेनिस, जेनोआ, नेपल्स–से शुरू हुआ जो विश्व-व्यापार की नई मंडियों के रूप में उदित हो रहे थे, जहाँ दुनिया भर के व्यापारी आकर मिलते थे। वेनिस के एक स्वतंत्र गणराज्य होने से वह (पवित्र) रोमन सम्राट और पोप दोनों के शिकंजों से मुक्त था।
वहाँ से जो हवा चली उसने इटली की अन्य तटीय मंडियों को भी अपनी तासीर में ले लिया। उसके बाद मध्य इटली के शहर फ़्लोरेंस की बारी आई जो उस समय महाजनों (money-lenders) के जमावड़े के चलते यूरोप की वित्तीय राजधानी-जैसा बन गया था और नई सोच व नई खोजों के लिए आवश्यक माहौल और संसाधन मुहैया कराने की स्थिति में था। और वह भी उस समय एक नगर-गणराज्य होने से नए विचारों के लिए बेहद मुफ़ीद था।
फ़्लोरेंस ने पुराने यूनान से प्रेरणा लेकर पहले दांते और पेट्रार्क (Petrarch) जैसे प्रसिद्ध कवियों को जन्म दिया (तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी), फिर लेवोनार्डो द विंसी (1452-1519), माइकेलेंजेलो (1475-1564) और राफेल (1483-1520)-जैसी बहुमुखी कला-प्रतिभाओं को, जिन्होंने धार्मिक मान्यताओं की जड़ता को तोड़ने और मानव-चेतना को मुक्त आकाश देने की पूर्व-पीठिका तैयार की।
सोलहवीं शताब्दी बीतते-बीतते इटली मेँ कला की यह नई उठान धीमी पड़ने लगी , लेकिन इसका सिलसिला वहाँ से हॉलैंड (Rembrandt) और स्पेन (Velasquez) होता हुआ पूरे यूरोप मेँ छा गया।
इसी दौर (पंद्रहवीं से सत्रहवीं शताब्दी) मेँ विज्ञान की खोजों ने मानव-जीवन को एक नई गतिशीलता प्रदान की। स्वाभाविक है कि वैज्ञानिकों को शुरू मेँ चर्च के विकट विरोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि सभी धार्मिक प्रतिष्ठानों की तरह चर्च भी यथास्थितिवाद का पोषक था और नहीं चाहता था कि लोग नई बातें सोचें या नया आविष्कार करें। स्वाभाविक है कि जिन मान्यताओं पर उसका शीराज़ा खड़ा था, उन पर प्रश्नचिन्ह लगने मेँ उसे अपने अस्तित्व के लिए ख़तरा दिखाई पड़ता था।
बाइबिल की शाब्दिक व्याख्या के आधार पर चर्च की मान्यता थी कि पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र मेँ थी, सूरज तथा अन्य खगोलीय पिंड इसके चारों ओर चक्कर लगाते थे। [Psalm 104:5—‘The Lord set the earth on its foundations; it can never be moved.’] पोलिश गणितज्ञ और खगोलशास्त्री कॉपरनिकस (1473-1543) ने सिद्ध कर दिया कि, नहीं, पृथ्वी ही सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है। कॉपरनिकस तो चर्च के प्रकोप से बच गया क्योंकि जिस वर्ष उसकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘On the Revolution of Heavenly Bodies’ छपी (1543), उसी वर्ष उसका देहांत हो गया।
उसकी मृत्यु के बाद ही चर्च वस्तुस्थिति से अवगत हो पाया और तुरंत इस पुस्तक पर पाबंदी लगा दी। लेकिन जब इटली के ही एक दूसरे वैज्ञानिक जिऑर्डनो ब्रूनो (Giordano Bruno–1548-1600) ने कॉपरनिकस की बात दोहरा दी और यह भी कहा कि सभी तारे अपने-आप मेँ सूर्य थे, तो चर्च के बर्दाश्त से बाहर हो गया। धर्म-परीक्षण (Inquisition) की क्रूर प्रक्रिया से जिऑर्डनो को विधर्मी घोषितकर रोम मेँ ज़िंदा जला दिया गया (1600)।
ब्रूनो का समकालीन दूसर इटैलियन वैज्ञानिक गैलीलियो (1564-1642) ब्रूनो-जैसा साहसी नहीं निकला। अपने ही द्वारा बनाए दूरबीन के सहारे किए गए गहन निरीक्षण से उसने ब्रूनो की बात को सच पाया और कहा भी। फिर बाइबिल के प्रति पूरी निष्ठा दिखाते हुए उसने संत आगस्तीन का यह तर्क देने की कोशिश की कि बाइबिल की कविताओं, गीतों, निर्देशों और ऐतिहासिक वक्तव्यों को शब्दश: नहीं लिया जा सकता।
उसके तर्क को अस्वीकारकर जब चर्च ने उस पर धर्म-परीक्षण की कार्रवाई शुरू की, अंतरात्मा को दबाकर उसे अपनी पहलेवाली बात से मुकरना पड़ा और घोषित करना पड़ा कि उससे ग़लती हो गई, पृथ्वी दरअसल ब्रह्मांड के केंद्र मेँ थी और सूर्य ही इसके चारों ओर चक्कर लगाता था। माना जाता है कि इस छद्म स्वीकारोक्ति के बाद वह धीरे-से बुदबुदाए बिना नहीं रह सका–‘Eppersimuove.’ (‘फिर भी यह घूमती तो है’)। इसके बावजूद उसे कुछ समय तक क़ैद मेँ रहना पड़ा ताकि वह अपने ‘दूषित’ अंत:करण को प्रायश्चित्त की आग से शुद्ध कर सके। वहाँ से छूटने पर उसे जीवन भर अपने ही घर में नज़रबंद रखा गया, जहां तीन साल तक हर हफ़्ते पश्चात्ताप के सातों भजन उसे पढ़ने पड़ते थे।
जिसे अक्षरस: ‘इलहाम’ माना जाता है, उसके प्रति अंध आस्था वैज्ञानिक सत्य के साथ किस क़दर निरंकुश ज़्यादती करती रही है, इसके प्रसंगों से इतिहास भरा पड़ा है…और विडंबना यह कि यह विवेकशून्य प्रक्रिया आज भी ज़ारी है। अस्तित्व की शास्वत त्रासदी !
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि पुराने यूनान के लुप्त हुए ज्ञान को खोजकर पुन: सामने लाने और इस तरह पुनर्जागरण की पूर्वपीठिका तैयार करने में उन जिज्ञासु, उदार और सत्वग्राही अरब चिंतकों-विद्वानों का विशेष हाथ रहा जिन्होंने अरब सभ्यता के स्वर्णकाल को स्वर्णकाल बनाया। जब ईसाई जगत जड़ता के अंधकार में डूबा था, अरब से दर्शन, विज्ञान, कला और साहित्य की एक बहुमुखी रोशनी फूटी।
अरबों ने दुनिया को तीन ख़ूबसूरत शहर दिए—दमिश्क, बग़दाद और कुर्तुबा (Cordoba–स्पेन), जिन्हें उन्होंने शिक्षा, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान का केंद्र बना दिया। काहिरा, बसरा और कूफ़ा उनके अन्य शहर थे जहां से बौद्धिक जीवन का प्रकाश पूरी दुनिया में फैला। अरब अच्छे इतिहासकर तो थे ही, कायनात की विविधता को समेटकर उसमें जीवंत रंग भरनेवाले अच्छे गल्पकार भी थे। ‘एक हज़ार एक रातें’ बग़दाद की प्रतिभा की उपज थी, जो आज भी लोगों को चमत्कृत करती है।
अरबों ने वास्तुकला की सारसेनिक शैली ईजाद की, जिसमें अरब और सीरिया के ख़ूबसूरत खजूर-वृक्षों और उनके झुरमुटों की अनुकृति में सरल पर सुंदर और प्रभावोत्पादक खंभों, मीनारों, गुंबदों और मेहराबों का कल्पनाशील संयोजन था। इस्लाम में किसी आकार के चित्रण की मनाही के कारण उन्होंने ख़ूबसूरत, बारीक जालियों और मेहराबों पर सुंदर अरबी लिखावट में क़ुरान की आयतों द्वारा सजावट की एक अनोखी शैली विकसित की।
अरब सभ्यता के इस स्वर्णकाल मेँ ज्ञान की अपार भूख के चलते पुरानी सभ्यताओं– यूनान-रोम, ईरान और भारत—की विभिन्न विषयों की पुस्तकों का अध्ययन अपने उरूज़ पर था और गणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति (trigonometry), खगोलशास्त्र (astronomy) और औषधिशास्त्र के ज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन और संवर्धन हो रहा था।
उस समय के अरबों की एक विशेषता यह थी कि वे ज्ञानार्जन को अपने-आप में एक जीवन-मूल्य मानते थे और इस पर इतना ज़ोर देते थे कि उन्हें जहां से जो भी मिला, उसे ग्रहण किया; यही नहीं, उसे और आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हो उठे।
हारून-अल-रशीद की ख़िलाफ़त (786-809) के समय बग़दाद में विद्वानों और कलाकारों की इतनी क़द्र थी कि उन दिनों दुनिया भर के विद्यार्थी, विद्वान और कलाकार बग़दाद विश्वविद्यालय का रुख़ करते थे। विज्ञान के क्षेत्र में अरबों की समझ ग़ज़ब की थी। उन्होंने दुनिया का पहला दूरबीन बनाया और नाविकों के लिए कुतुबनुमा विकसित किया। चीनियों के संपर्क से उन्होंने काग़ज़ बनाना सीखा और यह तकनीक योरोप ले गए।
सिंध में अपने शासन (आठवीं से दसवीं शताब्दी) के दौरान उन्होंने भारतीयों से चिकित्साशास्त्र, दर्शन, नक्षत्र-विज्ञान, गणित और शासन-संबंधी ज्ञान बटोरने में कोई संकोच नहीं किया। कई अरब विद्यार्थी औषधिशास्त्र में विशेषज्ञता हासिल करने तक्षशिला विश्वविद्यालय आते थे। अमीर ख़ुसरो ने लिखा है कि अरब ज्योतिषी अबू माशर बनारस आकर वहाँ दस वर्षों तक गणित ज्योतिष का अध्ययन करता रहा था।
अरब विद्वान भारत से ब्रह्मगुप्त की दो पुस्तकें—ब्रह्मसिद्धान्त और खंडरखाद्य—बग़दाद ले गए और वहाँ मौजूद भारतीयों की मदद से अल फ़ज़ारी ने अरबी में उनका अनुवाद किया। भारत से शून्य और दशमलव लेकर उन्होंने अरब संख्याएँ और अरब गणना-प्रणाली विकसित की जो आज विश्व की धरोहर है, वरना इस कंप्यूटर-युग में बड़ी संख्या की गणना के लिए सर्वथा अक्षम और अटपटी रोमन प्रणाली से कैसे काम चलता !
भारतीय वेदान्त और बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को लेकर अरबों ने एक उदार और समावेशी दर्शन विकसित किया, जिसमें अपने भीतर ही ख़ुदा को ढूँढ़ने और आत्म-चिंतन द्वारा सत्य को पाने पर ज़ोर है, वही सर्वग्राह्य सूफ़ी संप्रदाय के रूप में प्रचलित हुआ। कुर्तुबा और बग़दाद के विश्वविद्यालयों में जो समावेशी अरब दर्शन विकसित हुआ, उसका प्रभाव पेरिस और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों पर भी पड़ा और पूरा योरोप उससे अनुप्राणित हुआ।
कहा जाता है कि कुर्तुबा के मुख्य पुस्तकालय में चार लाख पुस्तकें थीं, जिनमें दुनिया भर का मानव-ज्ञान सुरक्षित था।
कैसी विडंबना है कि उसी अरब से ‘शुद्ध इस्लाम’ के नाम पर निकला वहाबी कट्टरवाद आज दुनिया भर में धार्मिक बुनियादपरस्ती और आतंकवाद का निर्यातक और प्रेरक बन गया है–अंध आस्था का विध्वंसक चरम।
यहाँ अरब सभ्यता के स्वर्णकाल के दो सितारों—इब्न सीना और इब्न रुश्द—पर थोड़ा विस्तार मौजूँ होगा. इन दोनों ने पुराने यूनान के लुप्त हुए ज्ञान को खोजकर योरोप को संप्रेषित किया, जिसने यूरोपीय नव-जागरण के लिए प्रकाश-स्तंभ का काम किया।
इब्न सीना (980-1070) ( फ़ारसी में Ibn Sina तथा अंग्रेज़ी और लैटिन में Avicenna) बुखारा (संप्रति उज़बेकिस्तान) के पास एक गाँव में जन्मे, ईरानी मूल के थे। वैसे तो वे औषधिशास्त्री थे लेकिन दरअसल विविध विषयों के जानकार एक उदार और निष्णात बौद्धिक थे। कहते हैं, उन्होंने कुल 450 पुस्तकें लिखीं, उनमें से 240 वजूद में रह गई हैं, जिनमें 150 दर्शन पर और 40 औषधिशास्त्र पर हैं। लेकिन उनमें खगोलशास्त्र, भूगोल, कीमियागरी, भूगर्भशास्त्र, मनोविज्ञान, इस्लामी धर्मशास्त्र, तर्कशास्त्र, गणित, भौतिकी और काव्यशास्त्र संबंधी जानकारी भी बिखरी हुई है।
उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “रोगमुक्ति पर” (The Book on Healing) मध्य-युगीन विश्वविद्यालयों में 1650 तक औषधिशास्त्र के विश्वकोश की हैसियत से पढ़ाई जाती रही। उनकी अधिकांश पुस्तकें अरबी में हैं, जो मध्य-पूर्व मेँ विज्ञान की भाषा बन गई थी, और कुछ ही फ़ारसी में हैं। इब्न सीना का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा उनके द्वारा बहुत सटीक ढंग से मुस्लिम धर्मशास्त्र (कलाम) तथा प्लेटो-अरस्तू की तत्वमीमांसा (metaphysics) के बीच सामंजस्य स्थापित करना। बाद में संत टॉमस अक्वीनास (1225-1274) ने उन्हीं के प्रमेयों के आधार पर अरस्तू का बाइबिलीकरण किया तो मारसिलिओ ऑफ पदुआ (1275-1342) ने उन्हीं के प्रमेयों पर चलते हुए सम्राट-समर्थक और पोप-विरोधी राजनीतिक दर्शन रचा।
किसी महान रचना में कितना कुछ संगर्भित होता है, जहां से दो विपरीत ध्रुव अपने लिए खाद-पानी प्राप्त कर सकते हैं।
अरस्तू के दर्शन और तत्व-मीमांसा का मुख्य घटक है सोद्देश्यतावाद (Teleology), जिसमें किसी वस्तु की प्रकृति उसके उस लक्ष्य में निहित होती है जो उसकी चरम परिणति या सर्वोत्तम अभिव्यक्ति के रूप में उसमें संगर्भित होता है। उसकी पहचान उसके विरूपित यथार्थ से नहीं, उसके प्रत्यय या भाव (idea) से होती है, जो उसका अंतिम लक्ष्य, उसका आदर्श (ideal) भी है, जिसकी ओर वह उन्मुख है।
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मनुष्य की प्रकृति वह है जो उसमें एक नैतिक, सामाजिक प्राणी, नगर-राज्य के एक उदात्त नागरिक के रूप में संगर्भित है, न कि व्यवहार में लक्षित उसका खंडित व्यक्तित्व। राज्य की प्रकृति आदर्श राज्य है, विकृत या पतित राज्य नहीं। यह एक क्रांतिकारी अवधारणा थी जिसने अरबों के माध्यम से उत्तर-पुनर्जागरण युगीन यूरोपी मानस में प्रवेश किया और हीगल, कान्ट-जैसे अनेक प्रत्ययवादी दर्शनिकों की दीर्घ परंपरा को जन्म दिया।
इब्न रुश्द (1126-1198) (अरबी में Ibn Rushd और लैटिन तथा अंग्रेज़ी में Averroes) कुर्तुबा (स्पेन) में पैदा हुए. उन्होंने अल ग़जली-जैसे मुस्लिम धर्मशास्त्रियों के बरअक्स अरस्तू के दर्शन को प्राथमिकता दी और सिद्ध किया कि दर्शन और इलहाम में कोई अंतर्विरोध नहीं है, और दोनों एक ही सत्य तक पहुँचने के अलग-अलग मार्ग हैं। इब्न रुश्द ने अरस्तू के तर्कशास्त्र, भौतिकी, मनोविज्ञान और तत्वमीमांसा पर लिखे ग्रन्थों की संक्षिप्त और विस्तृत (पंक्ति-दर-पंक्ति) दोनों तरह की टीकाएँ लिखीं।
उन्हें अरस्तू का ग्रंथ ‘पॉलिटिक्स’ उपलब्ध न होने से रुश्द ने प्लेटो की ‘रिपब्लिक’ की टीका लिखी और उसके दार्शनिक राजा के प्रमेय तथा स्त्रियों की शिक्षा और समानता के सिद्धान्त की वकालत की। रुश्द ने अरब के इतिहास से ढूँढ़-ढूँढ़कर प्लेटो के वर्गीकरण में दी गई पतित राज्य-व्यवस्थाओं के उदाहरण प्रस्तुत किए। तेरहवीं शताब्दी के योरोप में अरस्तू को जो पुनर्जीवन और पुनर्प्रतिष्ठा प्राप्त हुई, इब्न रुश्दकी टीकाओं को उसकी आधार-शिला माना जाता है। इसी शताब्दी मेँ जैकब अनातोले ने रुश्द के कई ग्रन्थों का अरबी से हिब्रू मेँ अनुवाद किया। फिर जैकब मान्टीनो और अब्राहम द बाल्मेस ने उनका हिब्रू से लैटिन मेँ अनुवाद किया।
रुश्द के अन्य ग्रंथों का माइकेल स्कॉट ने सीधे अरबी से लैटिन मेँ अनुवाद किया। रुश्द द्वारा अरबी मेँ लिखे कई ग्रंथ खो गए हैं, किन्तु उनका हिब्रू और लैटिन अनुवाद उपलब्ध है। इब्न रुश्दने कुल 80 ग्रंथ लिखे थे–उनके लेखन का सबसे समग्र लैटिन संस्करण कई जिल्दों मेँ वेनिस से 1564-74 मेँ प्रकाशित हुआ था।
प्लेटो और अरस्तू की पुनर्प्रतिष्ठा के साथ-साथ समुद्री मार्गों की खोज ने भी योरोप को मध्ययुगीन अंधकार से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो 1453 में कुस्तुंतुनिया पर उसमानी तुर्कों का क़ब्ज़ा हो जाने और उसके चलते रेशम और मसाले के पुराने व्यापार-मार्गों के बंद हो जाने के कारण अपरिहार्य हो गया था।
समुद्री मार्गों ने एशिया के साथ व्यापार में यूरोपियों को आक्रामक वर्चस्व प्रदान किया और समुद्री शक्ति की अहमियत बढ़ जाने से ज़मीनी साम्राज्य के बजाए समुद्रपार उपनिवेश बनाने और उनके आर्थिक दोहन से गृहदेश के तेज़ी से सम्पन्न होने की स्थिति पैदा हुई । इससे मालामाल हुए योरोपीय देशों में उपजी नई साहसिकता, ऊर्जा और आत्म-विश्वास ने वैज्ञानिक आविष्कारों और पूंजी-संचयन के योग से अंतत: औद्योगिक क्रांति को संभव बनाया, जिसने दुनिया का चेहरा बदल दिया।
क्रिया-प्रतिक्रिया की शृंखला से आज पूरे विश्व में धर्मांधता, धार्मिक जड़ता और तज्जन्य अमानुषिक उन्माद का पुनरोदय हो रहा है. समावेशिता (inclusiveness) और ग्रहणशीलता (eclecticism) का स्थान एकांतिकता (exclusiveness) और बुनियादपरस्ती (fundamentalism) ले रही हैं.
भारत में भी एक ऐसा दौर चल रहा है जिसमें हर चीज़ के लिए आगे के बजाए पीछे देखने और विगत के सब कुछ का महिमामंडन करने की प्रवृत्ति जड़ें जमा रही हैं. नए माहौल में पुष्पित-पल्लवित भी हो रही है. यह दौर क्यों आया, इसकी खोजबीन निष्ठा के साथ दूर तक करें तो शायद लगे कि इसके पीछे वैश्विक धार्मिक उन्माद की प्रतिक्रिया है, उससे उत्पन्न असुरक्षा भाव की अभिव्यक्ति है, अतीतोन्मुख कोटर में घुसकर प्रतिकार का संकीर्ण प्रयास है, उसी की नक़ल है।
धर्म के नाम पर आज दुनिया में जो हो रहा है, उसे समझने में मध्ययुग के घटाटोप और धर्म-सुधार के अतिवादी दौर से मदद मिल सकती है। पहले की तरह आज भी सारी लड़ाई वर्चस्व की, दुनिया की सत्ता-संरचना और उसका केंद्र बदलने की है। जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे हम सैम्युएल हंटिंटन की स्थापनाओं (‘सभ्यताओं का संघर्ष’—1996) का ही अनुसरण करते दिखाई पड़ रहे हैं।
मार्क्स ने कल्पना न की होगी कि सर्वहारा-क्रांति के सात-आठ दशक बाद वैश्वीकरण और कार्पोरेट प्रभुत्वके अपने नए अवतार में पूँजीवाद फिर से हावी हो जाएगा। लेकिन उसी के साथ मानवता के दूसरे दुश्मन सांगठनिक ‘धर्म’ की क्रूर, हिंसक, अतिवादी उछाल से दुनिया की व्यवस्था चरमरा उठेगी। पूंजीवाद-साम्यवाद का पुराना संघर्ष पीछे रह जाएगा और इतिहास आगे बढ़ने के बजाए लौटकर मध्ययुगीन धर्मांधता की अंध-गलियों में खो जाएगा।
ऐसे में प्रगतिशील वामपंथ का दिग्भ्रमित होना लाज़मी है। विडंबना यह है कि पूँजीवाद के प्रति अपनी पुरानी रंजिश के चलते, वर्चस्व की इस नई लड़ाई में, वामपंथ प्राय: कुछ धर्मांध शक्तियों का मुखर विरोध करता है तो चुप्पी साधकर कुछ के पाले में खड़ा दिखाई पड़ता है। कम से कम उनके दुष्कृत्यों की ओर से आँख-कान बंदकर वह पूँजीवाद और साम्राज्यवाद विरोधी वही पुराना राग अलापता जाता है।
धुर दक्षिणपंथ और वामपंथ का यह गठजोड़ ऐसी समसामयिक गुत्थी है, इतिहास में जिसकी कोई नज़ीर नहीं. और सोवियत रूस के पतन तथा चीन के वैश्विक पूंजीवाद की साम्यवादी राजनीतिक निरंकुशता के कवच से मज़बूत होने की प्रक्रिया से साम्यवादी क्रांति के निवारक असर का लोप है।
इस तरह आज का वामपंथ बदले हुए समय, तकनीकी के अप्रत्याशित विकास और जीवन के हर क्षेत्र में अपूर्व तेज़ी से बढ़ते तकनीकी के प्रभाव, उससे उद्भूत आक्रामक विज्ञापन और निरंकुश उपभोक्तावाद जैसी नई समस्याओं, जीवन की बदलती प्राथमिकताओं, निर्द्वंद्व हुए पूंजीवाद में कॉन्ट्रैक्ट, सब कॉन्ट्रैक्ट, सब सब कॉन्ट्रैक्ट … की श्रृंखला के सबसे निचले सिरे पर शोषित श्रमिकों की आर्थिक सामाजिक सुरक्षा के स्थापित मानों के क्षरण को संबोधित करने में अक्षम नहीं है?
साम्यवाद इन नई उभरती शक्तियों और परिस्थितियों से रूबरू नहीं हो पा रहा और उसी पुराने रास्ते पर वही पुराना ढोल पीटता आगे बढ़ता दिखाई पड़ रहा है. इस अर्थ में वह अब परिवर्तनवादी नहीं, यथास्थितिवादी हो गया है. हर समस्या का हल डेढ़ सौ साल पीछे मुड़कर मार्क्स में ढूँढ़ता है, इस अर्थ में प्रतिक्रियावादी भी.
यह हमारे समय की वह विडम्बना है जिससे आँख मूँदकर बौद्धिक लोग शुतुरमुर्ग़ बन गए हैं. देखते हैं तो बस अपने समानधर्मा अन्य शुतुरमुर्ग़ों को. परस्पर अहो-अहो की ऐसी जकड़बंदी है कि बाहर से कोई नई हवा प्रवेश नहीं कर सकती. इतने असहिष्णु कि कोई कुछ विपरीत कह दे तो तुरंत संदर्भ से छिटककर पहले उसकी लानत मलामत पर उतर आते हैं, इतने रुष्ट कि वश चले तो उसका लिक्वीडेशन ही कर डालें.
ऐसे में क्या यह सवाल प्रासंगिक नहीं हो उठा है—धर्मों के इस विभाजनकारी, घृणा-मूलक वर्चस्व के युग में समाजवाद का भविष्य और उसका भावी स्वरूप क्या होगा ?





