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बहुत भयावह है आज़ादी का गोल्डन वर्ष 

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सलीम अंसारी की कलम से

समाजवादी चिंतक डाक्टर सुरेश खेरनार कल इंदौर में थे वे यहां मधु लिमए और मधुदंडवते जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर  डॉक्टर राम मनोहर लोहिया सामाजिक समिति द्वारा आयोजित सांप्रदायिक राजनीति के खतरे और वामपंथी समाजवादी कार्यकर्ताओं का कर्तव्य विषय पर बोलने के लिए आए थे।

इस अवसर पर उन्होंने जाति प्रथा , धार्मिक  और सांप्रदायिक राजनीति के उभार और धर्मनिरपेक्षता पर खतरों का तर्क सम्मत आकलन करते हुए समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष दलों को‌ चेताते हुए मास कांटेक्ट मुहिम पर ज़ोर दिया।

 उन्होंने दस्तावेजों के हवाले से बात रखी,जब तर्क होते हैं तो लहजा खुद ब खुद शांत होता है फिर खेरनार तो सत्तर पार कर गये है,इस उम्र में धैर्य स्वाभाविक होता है। सांप्रदायिक राजनीति के उभार के लिए उन्होंने बहुत ही सौम्य तरीके से समाजवादी और वामपंथी राजनीति को भी ज़िम्मेदार बताया। बंगाल की ज़मीनी स्थिति पर  उन्होंने कम्युनिस्ट केडर के सांप्रदायिक मोड़ पर चिंता जताई। उन्होंने बगैर तकल्लुफ कहा कि भाजपा के रास्ते में एक मात्र ममता बनर्जी  रुकावट हैं ,ममता को हटा दें तो भाजपा का रास्ता बंगाल में साफ है। सांप्रदायिक राजनीति के उभार के लिए वह शाहबानो प्रकरण को टर्निंग प्वाइंट मानते हैं। खेरनार समान सिविल कोड के समर्थन में खड़े दिखाई दिए , उनकी माने तो संघ पहले इसका पक्षधर नही था (हालांकि आज तो वह उसके मुख्य चुनावी वादों शामिल है भाजपा इससे अब बहुसंख्यकों को रिझाने का काम लेती है)

 डाक्टर सुरेश खेरनार ने देश में राजनीतिक धुर्वीकरण के बढ़ने को लेकर समाजवादी और वामपंथियों पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने सांप्रदायिक राजनीति की तरक्की के लिए समाजवादियों और वामपंथियों की गलतियों को भी ज़िम्मेदार ठहराया। उन्होंने सवाल किया कि क्या वजह है कि आर एस एस और कम्युनिस्ट पार्टी एक साथ मुल्क में बनती है मगर आज वह कहां खड़े हैं और कम्युनिस्ट कहां खड़े हैं। बंगाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कल जहां जनसंघ खड़ी थी वहां आज कम्युनिस्ट खड़े हैं।संघ पर उन्होंने जमकर हमला बोला और दस्तावेजी सबूतों और अपने अनुभव के आधार पर बताया कि उसके मूल में ” मुसोलिनी और हिटलर ” की विचारधारा है।उसके समरसता के विचार को उन्होंने जातिवाद को जस का तस रखने का प्रयास बताया। उनके मुताबिक जातिवाद के जहर अब भी मौजूद है,बस बड़े शहरों जाति पुछी नही जाती। उन्होंने अपने निजी अनुभव के आधार पर संघ को मुस्लिम विरोधी बताया। 

पहलवानों के मसले पर उन्होंने सरकार के रवैए पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यह वही सरकार तो है जो बिल्किस बानों के गुनहगारों को छोड़ देती है और इसी विचारधारा से जुड़े लोग अपराधियों का स्वागत करते हैं। उन्होंने दस्तावेजी हवालों से बताया कि “बर्तन से वही टपकता है जो उसमें होता है।” खेरनार ने इस हवाले से मोदी के मुस्लिम महिला हितैषी होने पर भी चुटकी ली।

खेरनार ने भाजपा सरकार के तौर तरीकों को इसराईली  सरकार के तौर तरीकों से जोड़ते हुए कहा कि मैने वहां लोगों को धर्म के आधार पर बांटने के लिए  दीवारें देखीं हैं वही तजुर्बा मध्य प्रदेश के खरगोन में देखने को मिला। उन्होंने सवाल किया कि क्या किसी ने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई?

उन्होंने आज़ादी की गोल्डन की जुबली को भयावह बताते हुए कहा कि आज लोग अपनी विशेष पहचान को छिपाने के लिए मजबूर हैं। उन्होंने कहा यह समस्या महज़ कबीर के दोहे पढ़ने से दूर नही होगी बल्कि इसके लिए बड़े पैमाने पर लोगों से मिलकर बात करनी होगी। व्याख्यान में मौजूद लोगों कि संख्या भी विचारों के अलग टेस्ट के चलन और गंभीर और सकारात्मक प्रयासों के प्रति अनदेखी को दर्शाती है। व्याख्यान को सुनने के लिए परंपरागत श्रोता ही पहुंचे थे। वर्तमान सांप्रदायिक उभार से लड़ने की ज़िम्मेदारी आज भी उन कंधों पर है जिनके सर के बाल सुफेदी से भड़क उठे हैं,मगर इनके हौंसलों और तल्लीनता को सेल्यूट तो बनता है।

लिखारी

Ramswaroop Mantri

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