डॉ. प्रिया
_क्या मनुष्य स्वतंत्र होने के योग्य है? क्या वह स्वायत्तता का सुपात्र है? क्या उसे महान निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए? कहीं ऐसा तो नहीं कि मनुष्य की सबसे गहरी आकांक्षा शासित होने और बिना कोई प्रश्न किए अनुगमन करने की हो? कहीं वह अधिनायकों की राह तो नहीं तकता?_
ये तमाम प्रश्न फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की ने- प्रत्यक्ष या परोक्ष रीति से- ‘द ग्रैंड इनक्विज़िटर’ में उठाए हैं। ये कोई स्वतंत्र कृति नहीं, बल्कि उनके उपन्यास ‘द ब्रदर्स करमाज़ोव’ का एक चर्चित अध्याय है। दृश्य यह है कि मध्यकाल के स्पेन में- जहाँ धर्मविरुद्धों को मृत्युदण्ड दिया जा रहा है- सहसा जीज़ज़ पुन: धरती पर लौट आते हैं। लोग उन्हें पहचान लेते हैं और मंत्रमुग्ध होकर उनका पीछा करने लगते हैं। जीज़ज़ एक मृत बालिका को पुनर्जीवित कर देते हैं।
ताबूत पर चढ़ाए सफ़ेद फूलों को हाथ में थामे वह बालिका मुस्कराने लगती है। लोग आस्था के आवेग से हर्षोन्मत्त हो जाते हैं और उस धरती को चूमने लगते हैं, जहाँ जीज़ज़ खड़े हैं। तभी चर्च के कार्डिनल (द ग्रैंड इनक्विज़िटर) वहाँ से गुज़रते हैं। वे जीज़ज़ को बंदी बना लेते हैं और उन्हें मृत्युदण्ड देने की घोषणा कर देते हैं। मृत्युदण्ड से पूर्व कार्डिनल जीज़ज़ से मिलने उनकी कोठरी में जाते हैं और उन्हें बतलाते हैं कि अब हमें आपकी ज़रूरत नहीं है, आप चर्च के काम में केवल व्यवधान ही उत्पन्न करेंगे।
आपसे कुछ भूलें हुई थीं, जिन्हें हम सुधार रहे हैं, और आपका नाम लेकर ही सुधार रहे हैं, किंतु आप स्वयं अब अवांछनीय हैं।
प्रश्न यह है कि कार्डिनल जीज़ज़ को अवांछनीय क्यों समझते हैं? उनका आरोप है कि जीज़ज़ ने मनुष्य के गुणों का ज़रूरत से ज़्यादा आकलन किया था। वे मनुष्यता की बुनियादी वृत्तियों को समझ नहीं सके। जब शैतान ने जीज़ज़ को तीन प्रलोभन दिए, तब उन्हें उनको स्वीकार कर लेना चाहिए था। उन्हें पत्थर को रोटी में परिवर्तित कर देना चाहिए था, चमत्कारों के माध्यम से इस बात का सबूत देना चाहिए था कि वे सचमुच ईश्वर के पुत्र हैं और उन्हें मनुष्यों का शास्ता बन जाना चाहिए था।
लेकिन जीज़ज़ ने शास्ता बनने से इनकार किया और मनुष्यों को स्वतंत्रता दी। कार्डिनल का इल्ज़ाम है कि यह एक भारी भूल थी, क्योंकि मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए नहीं बने हैं। और चूँकि जीज़ज़ मनुष्यों को बंधक बनाने का अवसर चूक गए, इसलिए अब चर्च को उनके स्थान पर यह काम करना होगा और इसके लिए जीज़ज़ को एक जीवित व्यक्ति के रूप में रास्ते से हटना होगा, उनकी सूली पर आरूढ़ मूर्ति इस प्रयोजन में उनसे अधिक उपयोगी है।
जब दोस्तोयेव्स्की यह लिख रहे थे (‘द ब्रदर्स करमाज़ोव’ 1880), तब मनुष्यता का इतिहास एक दोराहे पर खड़ा था। रूस भीतर ही भीतर क्रांति के लिए तैयार हो रहा था, ज़ार पर प्राणघातक हमले किए जा रहे थे और निहिलिस्टों और सोशलिस्टों की आवाज़ बलवती होती जा रही थी।
फ्रांस की क्रांति एक सदी पुरानी हो चुकी थी और यूरोप पर कम्युनिज़्म का प्रेत मंडलाने लगा था, जिसकी घोषणा मार्क्स और एंगेल्स ने तीस साल पहले (‘द कम्युनिस्ट मेनिफ़ेस्टो’ 1848) कर दी थी। क्रांति हुई, सोवियत-संघ बना और टूटा, और एक सदी के बाद आर्थिक उदारीकरण ने विजय की घोषणा की।
इस परिघटना को भी अब तीन दशक बीत चुके हैं और अब हमारे पास दोस्तोयेव्स्की की भविष्यवाणियों का जायज़ा लेने के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक-परिप्रेक्ष्य हैं। बीते तीन दशक मनुष्यता की निर्बाध स्वतंत्रता के उत्सव की तरह रहे और फ्री-विल के सिद्धांत ने एक डॉक्ट्रिन की तरह मनुष्य की आत्मा में स्वयं को पैबस्त कर दिया। लिब्रलिज़्म ने इंडिविजुअल को प्रतिष्ठा दी, जिसके जीवन का एक ही उद्देश्य था- सुख की स्वच्छंद तृष्णा।
लोकतंत्र, मानवाधिकार और निजी स्वतंत्रता के घोषणापत्रों ने मनुष्य को बेलगाम बना दिया, किंतु क्या उसे विषाद से भी मुक्त किया? या उसे और क्लान्त, भ्रान्त, दयनीय और दुर्बल ही बनाया? क्या मनुष्य में यह क्षमता है भी कि वह इतनी सारी स्वतंत्रता का बोझ सहन कर सके, विक्षिप्त हुए बिना? क्योंकि मनुष्यता इस सदी में सामूहिक-विक्षिप्तता की ओर बढ़ चली है, इसमें संदेह नहीं होना चाहिए।
दोस्तोयेव्स्की की बात में सच्चाई है। अपनी युवावस्था में दोस्तोयेव्स्की स्वयं लिबरल और सोशलिस्ट हुआ करते थे, इसी आरोप में ज़ार ने उन्हें मृत्युदण्ड दिया था और बाद में उनकी सज़ा माफ़ कर साइबेरिया निर्वासित कर दिया था। दण्डद्वीप की यंत्रणाओं को झेलकर दोस्तोयेव्स्की ने मनुष्य की नियति को और गहराई से समझा और यह जाना कि उसकी आत्मा जिस वस्तु के लिए विकलता से भरती है, वह उसे लिब्रलिज़्म और इंडिविजुअलिज़्म या सोशलिज़्म से नहीं मिलने वाली है। जिस दिन मनुष्य के भीतर चेतना जागी, उसी दिन उसने एक फ्री-विल की परिकल्पना कर ली, किंतु क्या वह उसके लिए तैयार था?
मनुष्य की चेतना ने उसे ऐसे दोराहे पर ला खड़ा कर दिया है, जहाँ वह एक तरफ़ फ्री-विल के अभिमान से भरा है, वहीं दूसरी तरफ़ ब्रह्माण्ड की महान शक्तियाँ उसके बौनेपन, लाचारी और असहायता को हर पल उसके सामने प्रदर्शित करती हैं। ईश्वर और पशु के बीच ठिठका मनुष्य नाम का यह प्राणी इसी विषाद में गल रहा है। पशु वह अब बन नहीं सकता और ईश्वर वह बन नहीं सका है। तब उसके लिए श्रेयस्कर रास्ता क्या है? स्वतंत्रता या समर्पण? फ्री-विल या डिवाइन ग्रेस की स्वीकृति? नेतृत्व या अनुगमन?
मनुष्य-जाति का इतिहास एक कुचक्र का शिकार हो चुका है। वह ईश्वर का आविष्कार करता है और फिर ईश्वर के नियमों (जिन्हें कि उसने ही रचा है) का उल्लंघन करके स्वयं के संकल्प की प्रतिष्ठा करता है। फिर वह ग्लानि से भर उठता है। उसकी हस्ती का नाकुछ होना उसे टीस से भरने लगता है तो वह ईश्वर सरीखे किसी नायक का चयन कर बैठता है।
मोहभंग उसकी नियति बन चुकी है, बशर्ते अफीम का नशा बहुत गहरा ना हो। सुखी वही है, जिसने अपनी अवस्था के बारे में कभी सोचा ही नहीं, अलबत्ता वह सुख भी अल्पकालिक है। सच्चाई देर-अबेर मनुष्य के सामने स्वयं को प्रकट करती ही है।
यह अकारण नहीं है कि मनुष्य ने सभ्यता के लम्बे इतिहास में निरंतर ईश्वरों और देवताओं, पैग़म्बरों और मसीहाओं, नेताओं और नायकों को आविष्कृत किया है। उन्हें अपने सिर पर बैठाया है और उनका अनुगमन करके सुख पाया है। और फिर उनके प्रति विद्रोह भी किया है। मनुष्य को नहीं पता कि अपनी बुद्धि और विवेक का क्या करे।
इनकी मदद से जीवन तो वह बिता लेगा, लेकिन जीवन का प्रयोजन खोज नहीं सकेगा। सार्वभौमिक उदारीकरण के बीते तीन दशक के अनुभव तो यही बतलाते हैं कि मनुष्य की स्वतंत्रता जितनी निर्बाध होगी, उसका विषाद उतना ही बढ़ेगा। यह प्राणी अभी स्वायत्तता के योग्य नहीं है। लोकतंत्र उसके हाथ में बंदर के उस्तरे की तरह है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का उपयोग वह स्वयं के विदूषकत्व के निरूपण में करेगा।
मानवाधिकार का मतलब उसके लिए मनचाहा करना है, और मन की चाह की कोई सीमा नहीं, ना उसकी कोई औचित्यसिद्धि है। वास्तव में मनुष्य को बंधन चाहिए, सत्ता का अंकुश चाहिए, सिर पर बैठे अधिनायक चाहिए, देवत्व का आभास देने वाले नेता चाहिए- जिन्होंने युद्धों, अतिचारों और अंधराष्ट्रवाद को जन्म दिया है और सम्प्रदायों के वीभत्स उन्माद रचे हैं।
मनुष्य की स्वतंत्रता इतनी लचर है कि जब वह उसका उपयोग कर अपने नेता और नायक चुनता है- ताकि उनके हाथों अपनी स्वतंत्रता को बंधक बनाकर रख सके- तो वहाँ भी वह भूल कर बैठता है।
यह अकारण नहीं है कि सभी धर्मों-सम्प्रदायों में ऐसी दैवीय चेतनाओं की परिकल्पना की गई है, जो भविष्य में अवतरित होंगी- मैत्रेय आएँगे, कल्कि आएँगे, मेहदी का अवतरण होगा, जीज़ज़ की सेकंड-कमिंग प्रतीक्षित है। अगर मनुष्य के सामने डे ऑफ़ जजमेंट या परलोक के न्याय का आश्वासन ना हो तो वह विक्षिप्त हो जाएगा। अतीत के अवतारों से उसका जी नहीं भरा, उसे भविष्य में भी मसीहाओं के आगमन का दिलासा चाहिए। और जब तक मसीहा नहीं आएँगे, तब तक वह किन्हीं राष्ट्रनायकों को आविष्कृत करके सिंहासन पर विराजित कर देगा, क्योंकि मनुष्य की सबसे गहरी आकाँक्षा शासित होने की है, वह चाहता है कि कोई कोड़े फटकारे और उसे बतलाए कि उसे क्या करना है, क्योंकि उसे बिलकुल नहीं पता कि उसे क्या करना है और क्यों करना है।
जीज़ज़ के सिर पर जो काँटों का ताज था, वह मनुष्य की फ्री-विल का रूपक है। वह अदृश्य मुकुट सभी ने पहन रखा है। सभी की आत्माएँ क्लान्त हैं और विषाद से भर चुकी हैं।
फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की ने ‘द ग्रैंड इनक्विज़िटर’ में आज से 140 साल पहले जो प्रश्न पूछे थे, वो आज और भी प्रसंगानुकूल हो चुके हैं।
मनुष्यता को इस पर मनन करना ही होगा और स्वयं की सीमाओं का आत्महंता साहस के साथ अवलोकन करने के सिवा उसके पास कोई और रास्ता नहीं है।





