दिल्ली हाईकोर्ट ने RSS की वीकली मैगजीन ऑर्गनाइजर और एक अन्य मैगजीन द कम्यून से एक आर्टिकल हटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि इमेज बनाने में सालों लग जाते हैं। इन मैगजीन के लेख में एक क्रिश्चियन स्कूल पर आरोप लगाया गया था कि वहां के प्रिंसिपल नन और हिंदू महिला कर्मचारी का यौन शोषण करते हैं। इसमें शेफ, स्टाफ मेंबर्स के शामिल होने का भी आरोप है।
दरअसल, RSS की ऑर्गनाइजर मैगजीन में जून 2023 में एक आर्टिकल छपा था। इसका टाइटल ‘इंडियन कैथोलिक चर्च सेक्स स्कैंडल: प्राइस्ट एक्सप्लॉइटिंग नन्स एंड हिंदू वुमन एक्सपोस्ड’ था। इस पर दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस ज्योति सिंह ने ऑर्गनाइजर को उनके प्लेटफॉर्म से इस आर्टिकल को हटाने का आदेश दिया है।
दोनों मैगजीन ने आर्टिकल छापने में लापरवाही दिखाई- हाईकोर्ट
कोर्ट ने कहा ऑर्गनाइजर और द कम्यून ने यह आर्टिकल बिना किसी फैक्ट वैरिफिकेशन के लापरवाही से प्रकाशित किया है। इस रिपोर्ट से प्रिंसिपल की छवि और प्रतिष्ठा धूमिल होती है। वह देश के सम्मानित नागरिक हैं और कई एजुकेशनल इंस्टीट्यूट से जुड़े हैं।

कोर्ट ने कहा- जब तक ये कि आर्टिकल पब्लिक डोमेन में रहेंगे, तब तक प्रिंसिपल की छवि खराब होने की आशंका बनी रहेगी।
प्रिंसिपल बोले- मेरी और मिशनरियों की छवि खराब हो रही
स्कूल के प्रिंसिपल ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि वह बहुत से स्कूलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं। लेकिन कभी किसी यौन और लेन-देन के मामलों में नहीं पड़े। उन्होंने ये भी कहा कि यह आर्टिकल इसलिए पब्लिश किया गया, क्योंकि उनकी और मिशनरियों की छवि खराब की जा सके। साथ ही लोगों के मन में पूर्वाग्रह बनाया जा सके।
कोर्ट ने कहा- अभिव्यक्ति और किसी के सम्मान के अधिकार के बीच संतुलन रहे
इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज की गई। ऑर्गनाइजर और द कम्यून की जांच की गई। इस मामले जस्टिस ज्योति सिंह ने इस आर्टिकल की जांच की और कहा कि यह आर्टिकल मानहानि का मामला बनता है।मूलाधिकारों का आर्टिकल 20 दोषसिद्धि को लेकर संरक्षण की बात कहता है यानी जब तक किसी व्यक्ति का दोष साबित ना हो जाए, उसे दोषी नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा- इसमें कोई शक नहीं कि संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की आजादी देता है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि 19(B) में कुछ बंदिशें भी है, जिसमें मानहानि भी शामिल है। अभिव्यक्ति की आजादी किसी को अपमानित करने का अधिकार नहीं देती। कोर्ट बार बार कह रहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी और किसी के सम्मान के अधिकार की बीच एक बैलेंस होना चाहिए।





