पुष्पा गुप्ता (महमूदाबाद)
_युद्धारंभ से अब तक उक्रेन के प्रचुर संसाधनों की बंदरबांट में आम उक्रेनी जनता के जीवन में विध्वंस का बवंडर लाने वाले दोनों साम्राज्यवादी लुटेरे गिरोहों की प्रचार-सुनामी झेलने के बाद वास्तविक स्थिति के आकलन का एक विनम्र प्रयास :_
अमरीकी-नाटो गिरोह प्रचार युद्ध में विजयी है, आर्थिक युद्ध में आगे है, किंतु सैन्य युद्ध में रूसी गिरोह विजय की ओर है क्योंकि उक्रेनियों को लडाई में सब तरह की मदद का भरोसा दिला मौके पर दूर जा बैठे अमरीका-नाटो के बगैर उक्रेन रूसी साम्राज्यवाद की फौजी ताकत के सामने असहाय है। इस आकलन के आधार क्या हैं?
_एक : रूसी बख्तरबंद/टैंक फौज बिना दुराव-छिपाव का कोई प्रयास किए खुले में सडकों पर है। अर्थात उक्रेनी एयरफोर्स खत्म है और पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया ने अपने लडाकू जहाज भेज एंग्लो-सैक्सन गिरोह के लिए बलि का बकरा बनने से इंकार कर दिया है।_
दो : रूसी फौज कूट चैनलों के बजाय खुले रेडियो चैनलों पर काफी संचार कर रही है जहां उन्हें यथोचित तकनीकी क्षमता वाली पूरी दुनिया सुन सकती है। अर्थात उन्हें हमले का खतरा नहीं है बल्कि वे उक्रेनी रक्षकों को भ्रमित व भयग्रस्त करने का प्रयास कर रहे हैं।
तीन : उक्रेनी फौज कोई हमलावर ऑपरेशन नहीं कर पा रही है। वह बस शहरों-बस्तियों में तोपखाने व एंटी एयरक्राफ्ट बैटरियों पर निर्भर रक्षात्मक पोजीशन लिये हुए है जहां से वह कुछ रूसी टैंकों, गाडियों व हेलीकॉप्टर आदि गिरा पा रही है।
_सवाल उठेगा कि फिर रूसी फौज के आगे बढ़ने की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? इसके लिए उक्रेनी फौज की रणनीति तैयार करा 24 फरवरी तक पतली गली से निकल भागे उसके हजारों नाटो उस्तादों की दो कुटिल किंतु आजमाई हुई चालें जिम्मेदार हैं।_
एक : उक्रेनी फौज की ये रक्षात्मक पोजीशन स्कूलों, अस्पतालों व रिहायशी इलाकों के साथ/अंदर हैं। रूसी फौज के लिए मुश्किल है कि उसे इन्हें चिह्नित कर सही लक्ष्य के साथ नष्ट करना है नहीं तो नागरिक आबादी के जनसंहार का प्रचार युद्ध उसके खिलाफ छिडना तय है। अपने आरामदायक घरों में बैठे अमरीकी-नाटो 'लिबरल' बडी बेताबी से ऐसी स्थिति के इंतजार में हैं जब बडे़ पैमाने पर उक्रेनी नागरिकों का खून बहे।
दो : शहरों में नाजी व अपराधी गिरोहों सहित अप्रशिक्षित नागरिकों को बड़ी संख्या में हथियार बांटे गए हैं जिनके अनाडी गिरोह फौज से रक्षा में तो नहीं पर अंधाधुंध गोलीबारी से रिहायशी बस्तियों में खून खराबा करने में जरूर समर्थ हैं। इनसे निपटना एक बडी समस्या है। रूसी संभवतः इस लडाई में न उलझ पहले ही सब ओर घेराबंदी कर उक्रेनी फौज से समर्पण करा लेना चाहते हैं।
_कुल मिलाकर कहा जाये तो अमरीका-नाटो व रूसी साम्राज्यवाद की परस्पर चालबाजियों की कीमत युद्ध न चाहने वाली उक्रेनी जनता चुका रही है। याद रहे मौजूदा राष्ट्रपति जेलेंस्की ने युद्ध के बजाय बातचीत के द्वारा शांति के नारे पर चुनाव लडा था और उसे 73% वोट मिले थे।_
पर जैसा पूंजीवाद में होता है, चुनाव में जनता को लगता है कि वह चुन रही है, पर चुनती किसे है, पूंजीपतियों के प्रतिनिधि को, जो पूंजीपतियों के हित में काम करता है।
_अब तक 5 रूसी सांसद कह चुके हैं कि ड्यूमा में प्रस्ताव सिर्फ द्नेत्स्क व लुहांस्क को मान्यता देने का था, उक्रेन पर हमले का नहीं।_(चेतना विकास मिशन)




