अग्नि आलोक
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द मिस्ट्री ऑफ लाइफ 

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किसी पर भूत-प्रेत का साया होना : कितनी हक़ीक़त, कितना फ़साना !*

⚡डॉ. विकास मानव

     प्रेतबाधा के पीछे की कहानी बड़ी मासूम और मार्मिक होती है. चूंकि मेरा बचपन छोटे कस्बे में बीता था, तो कई प्रेतबाधा तथा जिन्न -चढ़ने वाली घटना होते रहती थी. 

       मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ जो अपने सात बित्ते की देह को एक बित्ते के आंगन में ता-जिंदगी समोए रही और कभी बाहर झाँका तक नहीं और जब बाहर निकली तो वह नहीं, उसकी लाश निकली.

    _धीरे धीरे अपना वजूद खत्म होते देख, उनका अवसाद बढ़ता जाता है , और उस स्थिति में पहुंच जाता है जहां वे अपने अस्तिव को बचाने के लिए एक नया वजूद यानी आल्टर ईगो बना लेती हैं._ 

    भूत का खेल कर के उनके अवचेतन मस्तिष्क को बड़ा सुकून मिलता है कि कैसे सब लोग डर रहे हैं उस से !

      एक महिला ,जिस पे भूत सवार होता था , वह भूत रोज़ सवार होने के बाद जलेबी और बालूशाही मांगता था खाने को. शायद ससुराल में कभी मिठाई के लिए पूछा ही नहीं होगा किसी ने उस महिला से ! मासूमियत वाला भूत था ये! 

      एक दूसरी महिला , भूत चढ़ने के बाद आवाज़ बदल कर झाड़ू से पीटती थी अपने घरवालों को. इसी तरह के कई और केस होते रहते थे आस पास.

    _भूत-प्रेत के खेल वाले लोगों का दिमाग बहुत कठिन दौर से गुज़र रहा होता है. उन्हें तुरंत मनोवैज्ञानिक /डॉक्टर या मुझ जैसे गैर व्यावसायिक मनोचिकित्सक तांत्रिक के पास ले जाना चाहिए. साथ ही साथ परिवार के बीच उसको समुचित सम्मान और प्रेम देना सबसे ज़रूरी है._

   *भूत- प्रेत है क्या ?*

      यह आम मनुष्य की अदृश्य सूक्ष्म शरीर की अवस्था है जिसमें वह जन्म लेने से पहले रहते हैं और स्थूल शरीर नष्ट होने पर अकाल में या जीवन अवधि की पूर्ण होने पर कालवश नियमानुसार मरने के बाद चले जाते हैं। 

       _भूतिक शरीर ही जीवों का वास्तविक /असली शरीर होता है, जिसमेँ जीव के जीवन लक्षण /गुँण विद्यमान /मौजूद होते हैं : जैसे अग्नि ,ताप /उष्मा , विद्युत ,चुम्बक,लचीलापन,प्रत्यास्थता ,पिंडत्व (अनेक पदार्थों /तत्वों के मिलने से एक आकर, आकृति बनना), भंगुरता ( पिंड का टूट फूट कर बिखर जाना ), प्रज्या,(अपने जैसे जीवों को प्रजनन द्वारा पैदा करना) और अन्य जैविक गुँण जैसे जीवन के लिए भोजन ग्रहण, श्वसन, दर्शन, गंध , स्पर्श, कर्म भाव ,गति भाव, रक्षा भाव ,आक्रमण भाव ,अन्ना भाव(अन्न की शरीर में गति मैटाबॉलिज्म), प्रज्या भाव (अपने जैसा जीव दूसरा अपने आप बनाना, या दूसरों जीवों की मदद से बनाना), संतान पैदा करना आदि। ये सभी गुँण जीव की भूतिहा अवस्था में ही होते हैं। जीव की भूत हीन अवस्था भौतिक /स्थूल दृश्य शरीर में नहीं होते हैं।_

    *समझने के लिए किसी मरते हुए को ध्यान से देखना होगा :*

   मरते वक्त वह जिन्दा था। हरकत मय था। क्रिया की प्रतिक्रिया व्यक्त किया करता था। कितनी देर में मरा और प्रतिपल उसपे क्या-क्या गुजरी, हाव-भाव में कैसे-कैसे और कितने बदलाव आए : सब रीड करना होगा। अब जब वह मर गया तो उसमें से ऐसा क्या निकल गया /कम हो गया?देखना/सोचना इस विषय पर तो काफी कुछ पता लग जायेगा।

 आदमी के जीते जी उसका शरीर गर्म था। आदमी के मरने के बाद अब शरीर ठंडा हो गया प्राकृतिक रूप से। आखिर उस में ऐसा क्या था जो उस शरीर को उस आदमी के जीते जी उसे गर्म रखे हुए था। जी हाँ इसे अपने तरकशी दिमाग से सोचना, कुछ जबाब मिल जायेगा।

      प्रत्येक जीव के स्थूल दृश्यमय शरीर के अन्दर उसका एक कारण रूपी संचालक सूक्ष्म रूप से विस्तारित रूप वाला शरीर होता है। इस सूक्ष्म शरीर में सूक्ष्म विद्युत का , चुम्बकन का ,ताप का आकर्षण का प्रतिकर्षण का ,गति का ,पोषण शोषण का ,गुँण होता है जिसके शरीर में विद्यमान /उपस्थित होने पर ही जीव का स्थूल दृश्य शरीर जीवित होता है।

   जब यह अदृश्य शरीर जो सूक्ष्म शरीर इस दृश्य स्थूल शरीर में से अलग हो जाता है तो स्थूल शरीर में शरीर को नियंत्रित करने वाली विद्युत न होने से शरीर धारण कर्ता इन्द्रियाँ धर्म हीन हो जाती हैं। आँखें हैं जगदर्शन क्रिया प्रतिक्रिया बंंद। कान हैं सुनाई देना बंद। नाँक है गंध क्रियाएं बंंद। मुख ह पर खाना बंंद। हाथ हैं कर्म बंद। पैर हैं गति बंंद। जननाँग हैं पर संवेदना बंंद। 

    आखिर कौन था वो जो इस शरीर को अपनी विद्युत शक्ति से सक्रिय बनाये हुए था। जिसकी मौजूदगी से शरीर गर्म रहता था वही था वह जमदग्नि /यमदग्नि (सृष्टि सृजन संचालित नियम नियंत्रण व्यवस्था) परिस्थितिकी देवता। नियंत्रित अग्निमय पुरुष हिरन्यगर्भा जो इस शरीर में गर्भस्थ शिशु अवस्था में छिपा हुआ रहकर इस स्थूल शरीर को नियंत्रित करके चला रहा था। ठीक उसी तरह से जैसे गर्भवती स्त्री के व्यवहार को उसका गर्भस्थ शिशु नियंत्रित करके उसको अक्सर भ्रमित करता रहता है और उस स्त्री को भ्रमित व्यवहार करने का दौहृत (दो हृदय) का मनोरोगी /मानसिक रोगी बना देता है। जिससे उसका प्राकृतिक व्यवहार स्थिर स्थाई नहीं रहता है। जो गर्भस्थ शिशु के लिंग के अनुसार बदलता रहता है। कभी कभी वह स्त्री मरदाना व्यवहार पुरुषों के जैसा करती है तो कभी जनाना /स्त्रियोचित व्यवहार करती है।

   ठीक ऐसा ही विचित्र भ्रम पूर्ण व्यवहार मनुष्य करता है उस हिरन्यगर्भा अदृश्य के स्थूल दृश्य शरीर में उपस्थित होने पर।

    शरीर में मौजूदगी से यह जीवित भूतिक /भौतिक शरीर वाला प्राणी /मनुष्य भौतिक जग में से अपनी आवश्यकता के अनुसार दूसरे पदार्थों को वस्तुओं को खींच ले लिया करता है। अपने चुम्बकीय गुँण से , इस चुम्बकीय हिरन्यगर्भा में अपनी शक्ति थी अपना ताप आप नियंत्रण करने की तथा यह इस स्थूल निर्जीव शरीर को भी गरम रखता था। 

  _यह अपनी आवश्यकताओं के अनुसार दूसरे जीवों को मनुष्य को भौतिक वस्तुओं को अपनी ओर खींच लिया करता था। आकर्षण शक्ति थी इस में जो अब इसके शरीर में से बाहर निकल जाने से मरने के बाद अब खत्म हो गई।_

  मुरदा शरीर में आकर्षण प्रतिकर्षण का गुँण नहीं होता है। केवल भूतिक शरीर में ही आकर्षित करने प्रतिक्रिया प्रतिकर्षण का गुँण होता है। तो वो भूत कहाँ गया? इस शरीर को चलाने वाला इस शरीर का असली मालिक /स्वामी इसका भूत अब कहाँ है?

   यकीनन वह अब अपने लिए दूसरा शरीर खोजने गया है।जिसमें घुस कर वह अब अपनी आगे की भविष्य में की इच्छाओं को पूरा करके अपना अगला भविष्य का जीवन जियेगा। 

    _जब तक यह अदृश्य शरीर वाला हिरन्यगर्भा भूत अदृश्य रुप में इस दृश्य शरीर के अन्दर था तभी तक यह शरीर अपने लिए पोषण और दूसरों का शोषण करने में समर्थ था।_

  प्रत्येक जीव का भूत ही उसके शरीर का नियंत्रणकर्ता अग्निवर्णा, चुम्बकीय, विद्युतीय, प्रज्यायी संतान उत्पन्न कर्ता/धर्ता स्वामी होता है।

जब कभी कभार (सामान्य रूप से नहीं) कोई अशरीरी आत्मा अपने सभी गुँणधर्मयुक्त इच्छा सहित (भूत) दूसरेत के शरीर में घुसकर उसको नियंत्रण करने में समर्थ हो जाती है तो वह भूत आवेशित व्यक्ति अपनी सामान्य खुराक से ज्यादा खाना खाने लगता है पर सेहत नहीं बनती। भूख बढ़ जाती है तृप्ति नहीं होती। शारीरिक श्रम क्षमता सामान्य से अधिक बढ़ जाती है। पसीना ज्यादा, हरदम, अकारण ही आता है। बी.एम.आर. बढ़ जाता है। शरीर का तापमान बढ़ा हुआ। शरीर गर्म रहने लगता है। शवसन दर बढ़ जाती है। शरीर का आक्सीकरण /मंद दहन दर बढ़ जाती है। वह गोपनीय जानकारी आसानी से देने लगता है क्योंकि भूतात्मा की पकड़ मन के अवचेतन स्तर पर ज्यादा होती है। 

   सामान्य शरीरी आत्मा की पकड़ मन के चेतन स्तर पर ज्यादा होती है। सामान्य शरीरी आत्माएं मर्यादित प्रेम व्यवहार करती हैं जबकि अशरीरी आत्माएं भूत प्रेत आदि अमर्यादित प्रेम व्यवहार या शत्रु व्यवहार करते हैं।

भूत की शरीर में उपस्थित से शरीरधारी का व्यवहार खराब हो जाता है। ठीक उसी तरह से जैसे जब एक मकान में दो मकान मालिक आ जाते हैं या एक मकान के दो मालिक बन जाते हैं।

  ऐसे में एक मकान को जो उसका असली मालिक नहीं होता वह उसे तोड़ने फोड़ने खराब करने पर उतर आता है : भूत स्वामी।  जो उस मकान का असली मालिक होता है वह उसे बचाने सुरक्षित संरक्षित करने में लग जाता है। दुनिया देखती है तमाशा।

  दुर्गति दुर्दशा होती है उस मकान रुपी शरीर की। 

   _अर्थात उस भूतावेशित व्यक्ति को मल्टीपल करैक्टर डिस्आर्डर का नया मानसिक रोग लग जाता है। यह उस व्यक्ति के शरीर में घुसे घुसे भूतों की संख्या या शक्ति पर निर्भर करता है। यदि उस शरीर में एक भूत घुसा है तो एक शरीर के दो मालिक होने से डबल कैरेक्टर डिस्आर्डर या दोहरा चरित्र धारण का मनोरोग पैदा होता है। यदि अपवाद स्वरूप दो या दो से ज्यादा भूत एक शरीर में घुस जाते है तब उस व्यक्ति को मल्टीपिल कैरेक्टर डिस्आर्डर /बहु चरित्र स्वामी का भयंकर /खतरनाक मारक घातक मानसिक रोग हो जाता है।_

भूत वह लोग बनते हैं जिनका दिमाग /मन सक्रिय अवस्था में रहता है। अर्थात जिनको मरने से पहले आत्मविशलेषण का प्रकृति अवसर नहीं देती। जो अकाल मौत दुर्घटनाओं में मरते हैं जिससे उनके मन की स्थिति उग्र व्यग्र बेचने दुखी होती है। मन में इच्छाएं अतृप्त होती है मूर्त अमूर्त चिंतन चलब्रहा होता है। किसी से बदला लेने की, हिसाब किताब चुकता करने की, प्रेम करने की इच्छा चल रही होती है। ऐसे में वह अतृप्त विवेकहीन आत्मा अपनी प्रवल इच्छावश दूसरों के शरीर में बलपूर्वक घुस जाया करती है। 

  अब प्रेत आवेशित व्यक्ति भूत रूप में ,और परेशान हो जाता है। वह जीव जिसके शरीर में घुसकर वह भूतात्मा प्रवेश कर चुकी है।

   वजह है दूसरे के शरीर को उसकी बिना मर्जी के नियंत्रण करने की कुचेष्टा। जिससे वह शरीर वाला दुखी होता है। शरीर ठीक से काम नहीं करता। चले तो किसके नियंत्रण में। परिणामतः शरीर को बीमार या व्यक्ति को मानसिक विकार वाला कहा जाता है।

*आम तौर पर*

 ये ढोंग ज्यादा वास्तविक कम है। यह मनोरोग है। यह धूर्त तांत्रिकों का व्यवसाय है। इसके बहाने वे धन तो लुटते ही हैं, प्रभावित इंसान फ़ीमेल है, तो उसे भरपूर भोगते भी हैं।

        किसी व्यक्ति पर में भूतप्रेत का आवेश आया दिखे तो घबड़ायें नहीं। ना किसी आम डा० को दिखाएं। हो सके तो भूत प्रेत आवेशित मनुष्य को किसी अच्छे मनो चिकित्सक को दिखायें। 

   _जब वह प्रमाणित कर दे कि वास्तव में यह व्यक्ति भूतप्रेत आवेशित है तो तब अच्छे चरित्र के तांत्रिक को दिखायें। गैर-व्यावसायिक ज्ञानी ही ऐसी बलाओं से छुटकारा दिला सकता है।_

*बुरी आत्माएं उत्तम प्रकृति के लोगों से दूर रहती हैं :*

   उड़ीसा के एक कस्बे खरियार रोड में दो मित्रों ने मिलकर अजीब शर्त लगाई। शर्त यह थी कि अमावस्या की रात को दोनों में से जो भी कब्रिस्तान में एक खास कब्र के नीचे कील ठोक कर आएगा। उसे 5000 रु. ईनाम में मिलेंगे। 

   एक मित्र कब्रिस्तान जाने पर राजी हो गया। शर्त के मुताबिक बारिश के मौसम की घनघोर अंधेरी रात में कील ठोक कर ज्यों ही वह लौटने लगा : अचानक उसे लगा जैसे उस कब्र में कोई उसकी धोती पकड़ कर खींच रहा है।

   ऐसा डरावना ख्याल आते ही उसने जोरों से चीख मारी : बचाओ, मेरी धोती खींच रहा..!साथी भाग गया। वह वहीं गिरकर बेहोश हो गया। सुबह लोगों को उसकी लाश मिली। लोगों ने यही समझा कि उसे किसी प्रेत ने मार दिया था। अगली रात परीक्षण के लिए में खुद वही काम किया। मैं ये पोस्ट लिख रहा हूं, यानी नहीं मरा।

   अभी २०१७ की बात है। नए नए हॉस्टल में लड़कियां रह रही थी। एक दिन सुबह क्लास चल रही थी तो एक लड़की बेहोश हो गई। हम ने तुरंत पानी के छांटे मारे और डॉक्टर के पास लेकर गए। डॉक्टर बोले कुछ है तो नहीं, फिर भी उन्होंने विटामिन चॉकलेट दिए चूसने के लिए। लेकिन शाम को वो क्लास नहीं गई। अपने कमरे में सोई रही। एक लड़की बुलाने गई तो उसको आंख फाड़ कर ऐसे देखने लगी कि लड़की चिल्लाकर बाहर आ गई।

    फिर एक रात में हॉस्टल में खबर फैल गई कि उस कमरे में कोई औरत फांसी दी थी और वो अभी चढ़ी है इस लड़की के ऊपर। ग़ज़ब यह है कि लड़की की माता-पिता खुद आकर हमें बोले कि कुछ करो। बिना किसी पड़ताल के, बिना किसी सुबूत के भूत मान लिया गया। बाद में मैंने उसे ठीक किया बिना किसी तांत्रिक क्रिया के, महज मनोवैज्ञानिक कौन्सिलिंग से।

     *नरो: प्रेतस्य शिष्यस्त्तु पितृमेध समाचारन।*

    *प्रेतहारै: सम् तत्र दशरात्रेण शुद् ध्यति।।*

  अर्थात जब इंसान का प्राणान्त हो तब मृतक शरीर जिस का नाम अब भूत (जो वर्तमान में जिंदा नहीं) है, उस का दाह करने वाला  प्रेतहार (मृतक को उठाने वालों) के साथ दशवें दिन शुद्ध होता है।  जब उस शरीर का दाह हो चुका तब भी उस का नाम भूत ही होता है अर्थात् वह अमुक-नामा व्यक्ति था। 

   यानी जितने उतपन्न हों, वर्तमान में आकर : और फिर न रहें; उनके भूतस्थ होने से उन का नाम भूत होता है। ऐसा ब्रह्मा से लेकर आज पर्यन्त के विद्वानों का सिद्धान्त है। _परन्तु जिस को शंका , कुसंग, कुसंस्कार हो उसका मालिक भगवान भी नहीं।_

Ramswaroop Mantri

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