जयपुर के 180 साल पुराने अरबों के महल को लेकर जयपुर का पूर्व राजघराना और राज्य सरकार आमने-सामने है। ये महल है सवाई मान सिंह टाउन हॉल, जहां ब्रिटिश राज में राजपूताना हाईकोर्ट फैसले करता था।
आजादी के बाद यहां राजस्थान विधानसभा चलती थी। कानून बनते थे। आज उसी जगह के मालिकाना हक का विवाद राजस्थान हाईकोर्ट में है। सरकार यहां 100 करोड़ रुपए खर्च कर अंतरराष्ट्रीय म्यूजियम बनवाना चाहती है। वहीं पूर्व राजपरिवार इसे वापस चाहता है।
इस रिपोर्ट में हम बताएंगे कि क्या सोचकर पूर्व राजपरिवार ने यह महल राजस्थान सरकार को सौंपा था। अब पूर्व महारानी पद्मिनी देवी, सांसद दीया कुमारी और पद्मनाभ सिंह किस आधार पर राज्य सरकार से इस महल को वापस लौटाने को कह रहे हैं।
राजमाता चंद्रावत चाहती थीं भव्य राम मंदिर बनवाना

सवाईमान सिंह टाउनल हाल के अंदर का दरवाजा। इसकी नींव सबसे पहले भव्य राम मंदिर बनाने के लिए रखी गई थी।
हेरिटेज विशेषज्ञ जितेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि आज हम जिस जगह को टाउन हॉल या पुरानी विधानसभा के नाम से जानते हैं, उस जगह को लेकर पूर्व राजघराने ने जो दो सपने संजोये वो उनके जीते जी पूरे नहीं हो सके। यहां पूर्व राजमाता चंद्रावत एक भव्य राम मंदिर बनवाना चाह रही थीं और उनके बेटे महाराजा रामसिंह द्वितीय अपनी मां राजमाता चंद्रावत के लिए महल बनवाना चाह रहे थे। बाद में तय हुआ कि यहां महल बनेगा, लेकिन महल बनने से पहले ही राजमाता और महाराजा रामसिंह द्वितीय, दोनों का निधन हो गया।
वर्ष 1840 में महल बनना शुरू हो गया और इसके सामने ही राम मंदिर के लिए जगह चिन्हित की गई। राजमाता के लिए इस महल के सामने ‘सात चौक’ का राम मंदिर भी बनवाया जाने लगा था। किसी न किसी कारण से महल का काम बीच-बीच में अटक जाता था। एक बार तो इस महल का निर्माण कार्य 1870 से 1880, यानी 10 साल तक अटका रहा। फिर इस महल का निर्माण सवाई माधोसिंह द्वितीय ने करवाना शुरू किया। इस बीच पूर्व महाराजा रामसिंह द्वितीय का वर्ष 1881 में निधन हो गया। आखिरकार वर्ष 1883 में यह महल बनकर तैयार हुआ।

सवाई मानसिंह टाउन हाल को पहले नया महल नाम दिया गया था। माधोसिंह द्वितीय इसे सिटी पैलेस की तरह सजाना चाहते थे।
यहीं मन बना कि राजस्थान की राजधानी तो जयपुर रहेगा, नेहरू भी आए
आजादी से पूर्व जयपुर के विकास के लिए राजघराने ने अंग्रेज इंजीनियर कर्नल स्विंटन एस जैकब को तैनात किया हुआ था। इस महल को स्विंटन ने राजपूताना स्थापत्य शैली और रोमन वास्तु शैली के आधार पर बनवाया था। तब इस महल को ‘नया महल’ के नाम से जाना जाने लगा था। अंग्रेज यहां राजपूताना हाईकोर्ट चलाते थे। इसी महल में अंग्रेज अफसर फैसले लेते थे। फिर, मिर्जा इस्माइल ने 1943 में इमारत का विस्तार करवाया। उसके बाद से इसका नाम सवाई मानसिंह टाउन हॉल रख दिया गया।
इस टाउन हॉल में 20 अक्टूबर 1945 में अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन हुआ, जिसमें जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे गणमान्य लोग उपस्थित हुए थे। इसके बाद आजादी के समय जब रियासतों का विलय हो रहा था, तो उदयपुर, कोटा सहित कुछ राजघराने चाहते थे कि उनके शहर को राजस्थान की राजधानी घोषित किया जाए।
राजधानी घोषित करने के लिए गठित हुई सत्यनारायण राव कमेटी जयपुर पहुंची। इसी टाउन हॉल में उनके लिए खान-पान की व्यवस्था की गई। कमेटी को यहां बहुत अच्छा लगा और प्रकृति आदि रास आ गई। कमेटी ने यहां जो समय गुजारा, उस दौरान मन बना लिया था कि राजस्थान की राजधानी जयपुर बनेगा। बाद में दिल्ली जाकर भी कमेटी ने यही फैसला लिया।

पुरानी विधानसभा जब टाउनहाल में चलती थी, तब अंदर से ऐसा दिखाई देता था।
पूर्व राजपरिवार के क्या हैं तर्क और सरकार क्यों लौटाने को तैयार नहीं?
पूर्व राजपरिवार दावा करता है कि विलय के दौरान उन्होंने राज्य सरकार को टाउन हॉल सरकारी काम में उपयोग के लिए दिया था। वर्ष 2000 के बाद यहां से विधानसभा ज्योति नगर में नए भवन में शिफ्ट हो गई। इसके बाद राज परिवार ने 7 अगस्त, 2019 को कोर्ट में दावा पेश कर सरकार से वो महल वापिस देने को कहा।
जयपुर शहर में पुरानी विधानसभा टाउन हॉल व होमगार्ड कार्यालय परिसर पर फिर से कब्जा लेने के लिए दायर अपीलों पर जस्टिस नरेंद्र सिंह की अदालत ने बीते सप्ताह ही सुनवाई पूरी की है। हाईकोर्ट ने इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। भास्कर ने इस विवाद पर दोनों पक्षों के वकीलों से तर्क और दलीलें जानी…
पूर्व राजपरिवार का दावा : पूर्व राजपरिवार की ओर से दायर अपीलों में कहा गया था कि टाउन हॉल व जलेब चौक परिसर स्थित लेखाकार कार्यालय को कोवेनेंट (अंग्रेजी शासन के दौरान बना प्रसंविदा का एक नियम) में निजी संपत्ति माना गया था और सरकार को उसके उपयोग के लिए लाइसेंस पर दिया गया था। इसके अनुसार जब तक सरकार इस संपत्ति को उपयोग में लेगी। तब तक वह ही इसका रखरखाव करेगी, लेकिन अब जिस उद्देश्य से यह संपत्तियां सरकार को दी गई थी। उस उद्देश्य से सरकार इनका उपयोग नहीं कर रही है। ऐसे में यह संपत्तियां वापस दिलाई जाएं।

पूर्व राज परिवार की ओर से कोर्ट में पेश दस्तावेजों में बताया गया कि इन संपत्तियों पर अभी उनका ही मालिकाना हक है।
राज्य सरकार का दावा : सरकार की ओर से कोर्ट में कहा गया कि कोवेनेंट में उपरोक्त संपत्तियां राज्य सरकार को देने के बारे में लिखा गया है। सरकार को यह संपत्ति कोवेनेंट से मिली है, ना की लाइसेंस के जरिए। कोवेनेंट को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। जिस दिन कोवेनेंट लिखा गया था, उस समय वहां विधानसभा अस्तित्व में ही नहीं थी। ऐसे में सरकार उपरोक्त परिसरों का कोई भी उपयोग करने के लिए स्वतंत्र है। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अदालत ने अपीलों पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
सरकार बनाना चाहती है अंतरराष्ट्रीय म्यूजियम
अब राज्य सरकार यहां सौ करोड़ रुपए में अंतरराष्ट्रीय स्तर का म्यूजियम बनाना चाहती है, लेकिन मामला कोर्ट में जाने के बाद बीते दिनों 4 अगस्त को स्टे लगा दिया गया है। इसे लेकर पूर्व राजपरिवार की ओर से कहा गया कि अब टाउन हॉल का राजस्थान विधानसभा के लिए उपयोग होने के बाद राज्य सरकार यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का म्यूजियम बनाना चाहती है।
इसी तरह लेखाकार कार्यालय को दी गई संपत्ति का अब होमगार्ड कार्यालय के रूप में उपयोग हो रहा है। लेकिन अब इसकी जरूरत नहीं रही है। जिस उद्देश्य के लिए संपत्तियां दी गई थी, वह पूरा होने के कारण इन्हें अब पूर्व राजपरिवार को वापस दे दी जाए। इस मामले में एडीजे कोर्ट में दावा पेश किया गया था, लेकिन अधीनस्थ कोर्ट ने अस्थाई निषेधाज्ञा के प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया हैं।

इसी टाउन हॉल को राज्य सरकार 100 करोड़ रुपए खर्च कर इंटरनेशनल म्यूजियम बनाना चाहती है।
आजादी के बाद राज्य सरकार को कौन-कौन सी प्रमुख संपत्तियां दीं
जयपुर के पूर्व राजघराने ने विलय के बाद दो तरीके से अपनी संपत्तियां राज्य सरकार को हस्तांतरित की थीं। एक तरीका स्थाई था, जिसे पूरी तरह से राज्य सरकार को सौंप दिया गया था। मतलब, मालिकाना हक राज्य सरकार को दे दिया। इनमें राजस्थान सरकार को स्थाई तौर पर कई संपत्तियां सौंपी गईं, जिनमें ये संपत्ति शामिल हैं…
- राजस्थान यूनिवर्सिटी के लिए 500 बीघा जमीन
- राजस्थान शासन सचिवालय
- एसएमएस अस्पताल
- महारानी और महाराजा कॉलेज
- सवाई मान सिंह स्टेडियम
दूसरा तरीका था कि मालिकाना हक तो पूर्व राजपरिवार का था, लेकिन राज्य सरकार को सरकारी कामकाज के लिए इस्तेमाल को दे दी गई। इसे लाइसेंस पर दी गई संपत्तियां (कोवेनेंट) माना गया, लेकिन इन संपत्तियों का मालिकाना हक राज्य सरकार को नहीं दिया गया था।
वर्ष 1970 के बाद पूर्व राजघराने के ब्रिगेडियर भवानी सिंह उत्तराधिकारी बन गए। भवानी सिंह ने 1972 में महाराजा सवाई मानसिंह-द्वितीय म्यूजियम ट्रस्ट को कुछ संपत्तियां सौंप दीं। यह ट्रस्ट राज परिवार का ही है। ट्रस्ट में शामिल प्रमुख संपत्तियां…
- सवाई मानसिंह टाउन हॉल (पुरानी विधानसभा)
- पुराना पुलिस हेड क्वार्टर (अब हेरिटेज निगम कार्यालय)
- राजेंद्र हजारी गार्ड बिल्डिंग
- जलेब चौक परिसर स्थित संपत्तियां
- जनानी ड्योढ़ी
हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी निगाहें
सरकार और पूर्व राज परिवार की नजरें हाईकोर्ट पर टिकी हुई हैं। कभी भी फैसला आ सकता है। पूर्व राजपरिवार के पक्ष ने हाईकोर्ट में महल का मालिकाना हक मांगने के साथ-साथ हर्जाने का भी दावा किया है। पूर्व राजपरिवार के 7 अगस्त, 2019 को लगाए दावे के अनुसार सरकार उनकी संपत्ति पर नाजायज तरीके से संपत्ति पर अवैध कब्जा किए हुए है। पूर्व राजपरिवार ने कहा है कि राज्य सरकार उनकी संपत्तियों पर अवैध कब्जे को छोड़े और कब्जे के दौरान के समय का हर्जाना संपत्तियों के हिसाब से प्रति संपत्ति 50 लाख से 1 करोड़ रुपए प्रति माह तक दिलवाया जाए।

यह तस्वीर विधानसभा सत्र के दौरान प्रवेश करते विधायकों की है।
पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का विधानसभा में हुआ था भाषण
राजस्थान में पुरानी विधानसभा के साथ कई ऐतिहासिक बातें जुड़ी हुई हैं। वर्ष 1952 में पहली बार विधानसभा का गठन हुआ था। उस समय विधानसभा सवाई मानसिंह टाउन हॉल में चलती थी। विधानसभा मामलों के एक्सपर्ट और विधानसभा के पूर्व रिसर्च एंड रेफरेंस विंग के हेड कैलाश सैनी के मुताबिक राजस्थान विधानसभा में 1953में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का भाषण हुआ था। इसके बाद नवंबर 2001 में ज्योति नगर स्थित विधानसभा के नए भवन का उद्घाटन करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन आए थे।





