और इस बिल को अंजाम तक पहुँचाने वाले व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू थे.
~सत्यजीत सत्यार्थी
इस बिल के विरोध की कहानी समझने के लिए आपको 1929 में जाना होगा. यह वही वर्ष है जिसमें लाहौर में रावी नदी के तट पर जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास किया गया था और अगले वर्ष 26 जनवरी को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया था और वैसा किया भी गया था. बाद में संविधान को इस दिन लागू कर इसको गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा जब भारत आज़ाद हो गया. इसी वर्ष ब्रिटिश सरकार द्वारा शारदा एक्ट पास किया गया था जिसमें विवाह हेतु बालिकाओं के लिए न्यूनतम उम्र 14 वर्ष और बालकों के लिए 18 वर्ष घोषित की गई थी. गीता प्रेस और कल्याण पत्रिका के आइकॉन हनुमान प्रसाद पोद्दार इस कानून का विरोध किए. उनका तर्क था कि विवाह धर्म का एक भाग है और धर्म पर कानून बनाने से धर्म कमजोर पड़ेगा.
12 साल बाद 1941 में ब्रिटिश सरकार द्वारा हिन्दू स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने के लिए हिन्दू लॉ कोड बनाने का निर्णय लिया गया और इसके लिए एक हिन्दू लॉ कमिटी नियुक्त की गई.
3 साल बाद 1944 में इस कमिटी को revived किया गया और इसे हिन्दू कोड बिल का ड्राफ्ट बनाने के लिए कहा गया ताकि हिन्दू विवाह और विरासत का आधुनिकीकरण किया जा सके. यह बिल हिन्दू स्त्रियों को पूर्ण अधिकार दिए जाने के लिए थी.
हनुमान प्रसाद पोद्दार की पत्रिका कल्याण ने इस बिल के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया.
21 Feb 1947 को चार-सदस्यीय हिन्दू लॉ कमिटी का चेयरमैन व कलकत्ता हाई कोर्ट का जज BN Rau (वही BN Rau जिन्होंने आगे चलकर भारत का संविधान का ड्राफ्ट लिखा) ब्रिटिश भारत सरकार के समक्ष इस बिल का प्रतिवेदन समर्पित किया.
कल्याण पत्रिका इस बिल के विरोध का अभियान जारी रखी थी. अब तक यह स्पष्ट हो गया था कि ब्रिटिश हुकूमत को अब भारत को आज़ादी देनी ही पड़ेगी. अतः ब्रिटिश हुकूमत इस बिल को छोड़ दी.
15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हो गया. जवाहरलाल नेहरू आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और उन्होंने अपने टीम में डॉ. अम्बेडकर को भी चुन लिया और उन्हें कानून मंत्री बना दिया तथा हिन्दू कोड बिल को आगे बढ़ाने का कार्य सौंपा.
डॉ. अम्बेडकर अपनी इस जिम्मेदारी को अच्छी तरह से निभाए और ब्रिटिश काल में जो हिन्दू कोड बिल का ड्राफ्ट तैयार था उसमें वे आवश्यक परिवर्तन किए.
अब कल्याण पत्रिका ने अम्बेडकर पर आक्रमण कर दिया. अम्बेडकर को जाति के आधार पर भी टारगेट किया गया लेकिन अम्बेडकर यहाँ एक संत के रूप में इसे बर्दाश्त किए और अपनी महानता का परिचय दिए.
कल्याण द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को अम्बेडकर को कानून मंत्री से हटवाने के लिए काफ़ी लोगों से पत्र लिखवाए. परंतु नेहरू उन पत्रों को इग्नोर किए और अम्बेडकर को कानून मंत्री के रूप में कार्य करने दिए.
तब पोद्दार ने अपनी कल्याण पत्रिका के माध्यम से नेहरू पर अटैक करना शुरू कर दिए. लेकिन नेहरू हिमालय की भांति अडिग रहे.
इस बीच काफ़ी घटनाएँ घटती हैं. फास्ट फॉरवर्ड करता हूँ.
अब आज़ाद भारत का प्रथम आम चुनाव, 1951-52 का समय आ जाता है. अम्बेडकर अपने कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र दे देते हैं. वे नेहरू पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने हिन्दू कोड बिल को लागू नहीं किया.
चुनाव का बिगुल बजता है और नेहरू कांग्रेस के सारे नेताओं को कहते हैं… विशेषकर उन नेताओं को जिन्होंने हिन्दू कोड बिल में पोद्दार का साथ दिया था… कि वे इस इश्यू को जनता के बीच ले जाएँगे और यदि जनता इसे अपना आशीर्वाद देगी तो यह बिल पारित कर दिया जाएगा. कांग्रेस के नेता मान जाते हैं.
यहाँ यह उल्लेख करना जरूरी है कि नेहरू यदि अम्बेडकर के दबाव में इस बिल को उस समय पारित कराने का प्रयास करते तो वे असफल हो जाते और कांग्रेस टूट जाती क्योंकि कांग्रेस के काफ़ी नेता इस बिल के विरोध में थे. एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रूप में यह डॉ. अम्बेडकर की चतुर योजना थी कि नेहरू पर नैतिक दबाव डालकर उन्हें इस बिल को पारित कराने के रास्ते पर ले जाना है जिसमें कांग्रेस का विभाजन निश्चित है और साथ ही सरकार का पतन भी और उसके बाद जो आम निर्वाचन होता उसमें कांग्रेस के लीडर्स अपने में ही लड़ाई-झगड़ा करते और अम्बेडकर अपनी पार्टी को चुनाव में ज्यादा सीट पर जीत दिलवा पाते.
लेकिन अम्बेडकर जी की यह अनुमानित योजना सफल नहीं हुई क्योंकि नेहरू गांधी के शिष्य थे और गांधी के शिष्य होने का अर्थ है असीम धैर्य. नेहरू ने कोई गलती नहीं की और इस बिल को कुछ दिन के लिए वे कोल्ड स्टोरेज में रख दिए.
खैर, देश के प्रथम आम निर्वाचन में सभी अपना भाग्य आजमाने निकल पड़े. अम्बेडकर जी ने नेहरू के ऊपर भीषण आक्रमण किया. उन्हें हिन्दू कोड बिल को लागू नहीं करने का दोषी कहा.
नेहरू ने किसी के ऊपर आक्रमण नहीं किया. वे जनता से दो टूक बात किए और कहा कि हिन्दू कोड बिल को चाहते हैं तो मुझे वोट दीजिए. मैं चुनाव जीतकर सरकार बना पाऊँगा तो हिन्दू कोड बिल लागू करूँगा. यदि इसे नहीं चाहते तो वोट न करें मुझे. उन्होंने जनता को यह भी बता दिया कि हिन्दू कोड बिल दरअसल है क्या चीज़.
नेहरू ने बाजी पलट दी. जब पोद्दार की कल्याण पत्रिका के मार्फ़त हिन्दू राष्ट्रवादी लोग इस बिल के विरुद्ध आंदोलन कर रहे थे तब राम राज्य परिषद् के संस्थापक व प्रखर वक्ता स्वामी करपात्री महाराज ने कहा था कि यह बिल न तो तर्कसम्मत है, न शास्त्रसम्मत, और न ही लोकसम्मत. वास्तव में करपात्री महाराज का ऐसा कहने का कुछ आधार भी था. आधार यह था कि ब्रिटिश सरकार जब इस बिल को पारित कराने के बारे में प्रयास कर रही थी तब सरकार द्वारा बनाई गई हिन्दू लॉ कमिटी द्वारा इस बारे में public opinion भी लिया गया था और देश की असंख्य जनता इस बिल के विरोध में अपनी राय रखी थी. तो लोकसम्मत वाले पॉइंट पर करपात्री महाराज सही थे और शास्त्रसम्मत तो हो भी कैसे सकता था यह बिल और तर्कसम्मत में तो नज़रिया का महत्त्व है कि चीजों को कौन कहाँ से देख रहा है. खैर, कांग्रेस यह चुनाव जीतती है और इस बिल को नेहरू लोकसम्मत बना देते हैं और आधुनिक दृष्टिकोण से तर्कसम्मत तो था ही. नेहरू पुनः प्रधानमंत्री बनते हैं और इस बिल को तोड़कर चार भागों में पारित करा देते हैं. ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि विरोध का स्वर उस समय भी शांत नहीं हुआ था. काम भी हो और लाठी भी न टूटे लोकोक्ति का यह ऐतिहासिक उदाहरण था.





