हबीब जालिब आम नागरिक के शायर थे। अपनी इंक़लाबी नज़्मों से उन्होंने तानाशाही हुकूमत को ख़ूब बेनक़ाब किया। जालिब का जन्म 1928 में पंजाब में हुआ, जवानी के दौर में उन्होंने भारत का बंटवारा देखा। वह इस बंटवारे को नहीं मानते थे लेकिन परिवार के कारण उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा। 1959 में जनरल अय्यूब ख़ान पाकिस्तान में मार्शल लॉ चला रहा था। उस दौरान रावलपिंडी रेडियो से एक मुशायरा प्रसारित हुआ। ज़्यादातर शायरों ने आशिक़ी और महबूबा पर ग़ज़लें पढ़ीं, पाकिस्तान की तारीफ़ों की नज़्में गायी गईं। फिर आए हबीब जालिब जिन्होंने अफ़सरों के हुक़्म को सिरे से नकारते हुए पाकिस्तान के असल हालातों और दहशत के आलम पर पढ़ना शुरू किया।झूठ बोलने वाली हुकुमत के होश उड़ गए 'कहीं गैस का धुआं है, कहीं गोलियों की बारिश शब-ए-अहद-ए-कमनिगाही तुझे किस तरह सुनाएं' ‘सब कुछ ठीक है’ जैसा झूठ बोलने वाली हुकुमत के होश उड़ गए। मुशायरे को तुरंत रोक दिया गया, जालिब को जेल भेज दिया गया। लेकिन तब तक हबीब जालिब पाकिस्तान के हालात की असल तस्वीर पेश कर चुके थे। जेल में जालिब को काग़ज-कलम तक मुहैया नहीं कराया गया लेकिन जालिब का क्रांतिकारी फ़न काग़ज-कलम का मोहताज़ नहीं था। वह ज़ुबां से रचते थे और देखते ही देखते उनकी रचना आम आदमी की ज़ुबां पर चढ़ कर इंक़लाब बन जाती थी। खौफ़ कभी उनके आसपास भी नहीं भटक पाया। तब शुरू हुआ बेख़ौफ़ कलमकारी का ये सिलसिला जो अंत तक जारी रहा और अलग-अलग हुकूमतों द्वारा उन्हें क़ैद कर के जेल में बंद किये जाने का सिलसिला भी चलता रहा। जालिब की ज़िंदगी के कई साल जेल में ही गुज़रे।आज भी बग़ावत की ज़रूरत के पक्षधरों का तराना है यह नज़्मकुछ सालों बाद अय्यूब ख़ान ने एक ऐसे संविधान का पक्ष रखा जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान की आवाम अभी लोकतंत्र के लिए परिपक्व नहीं है। इसलिए कार्यवाहक राष्ट्रपति चुना जाना चाहिए। जालिब ने साफ़ शब्दों में कहा कि यह तानाशाही को सुंदर लिबास में पेश करने का नाटक है। इसी की मुख़ालफ़त में उन्होंने प्रसिद्ध नज़्म ‘दस्तूर’ लिखी जो पाकिस्तान में कौमी तराने की तरह मशहूर हुई। बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर चढ़ गई। आज भी बग़ावत की ज़रूरत के पक्षधरों का तराना है ये नज़्म, पढ़िए और महसूस कीजिए शब्दों में पिरोई गई चिंगारियों को।मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानतादीप जिसका महल्लात ही में जले चंद लोगों की ख़ुशियों को लेकर चले वो जो साए में हर मसलहत के पले ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को, मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख्त-ए-दार से मैं भी मंसूर हूं कह दो अग़ियार से क्यों डराते हो ज़िन्दां की दीवार से ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता फूल शाख़ों पे खिलने लगे, तुम कहो जाम रिंदों को मिलने लगे, तुम कहो चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो इस खुले झूठ को जेहन की लूट को मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता तुमने लूटा है सदियों हमारा सुकूं अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फुसूं चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूं तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानताइस नज़्म जैसा थप्पड़ कोई ‘हबीब जालिब’ ही मार सकता थाजालिब ने तानाशाही हुकूमत से लोहा नहीं लिया बल्कि अपने कलम के कहर से मज़हबी गडरियों को भी ख़ूब बेनक़ाब किया। इस तरह जालिब का नाम उन कलम के सिपाहियों में शामिल हो जाता है जो सत्ता के दो प्रमुख गढ़ – राजनीति और धर्म से एक जैसी शिद्दत से लड़ते रहे। इस नज़्म जैसा थप्पड़ कोई ‘हबीब जालिब’ ही मार सकता था। ख़तरा है ज़रदारों को, गिरती हुई दीवारों को सदियों के बीमारों को, ख़तरे में इस्लाम नहीं सारी ज़मीं को घेरे हुए हैं आख़िर चंद घराने क्यों नाम नबी का लेने वाले उल्फ़त से बेगाने क्यों ख़तरा है खूंखारों को, रंग बिरंगी कारों को अमरीका के प्यारों को, ख़तरे में इस्लाम नहीं आज हमारे नारों से लज़ी है बया ऐवानों में बिक न सकेंगे हसरतों अमां ऊंची सजी दुकानों में ख़तरा है बटमारों को, मग़रिब के बाज़ारों को चोरों को मक्कारों को, ख़तरे में इस्लाम नहीं अम्न का परचम लेकर उठो, हर इंसां से प्यार करो अपना तो मंशूर है ‘जालिब’, सारे जहां से प्यार करो ख़तरा है दरबारों को, शाहों के ग़मख़ारों को नव्वाबों ग़द्दारों को, ख़तरे में इस्लाम नहींतुझको दरबार में कोड़ों से नचाया जाएएक बहुत मशहूर किस्सा है। एक बार ईरान के शाह रेज़ा पहलवी पाकिस्तान आए उनकी ख़िदमत के लिए पाकिस्तान के गवर्नर ने उस वक़्त की फ़िल्म अभिनेत्री नीलू को नाचने के लिए बुलावा भेजा। नीलू ने इंकार कर दिया तो उन्हें लेने पुलिस भेज दी गई। नीलू ने आत्महत्या की कोशिश की इस घटना पर ‘जालिब’ ने एक नज़्म लिखी जिसे बाद में एक फ़िल्म में भी प्रयोग किया गया तू कि ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-शहंशाही थी रक़्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है तुझ को इंकार की जुरअत जो हुई तो क्योंकर साया-ए-शाह में इस तरह जिया जाता है अहल-ए-सर्वत की ये तजवीज़ है सरकश लड़की तुझ को दरबार में कोड़ों से नचाया जाए नाचते नाचते हो जाए जो पायल ख़ामोश फिर न ता-ज़ीस्त तुझे होश में लाया जाए लोग इस मंज़र-ए-जांकाह को जब देखेंगे और बढ़ जाएगा कुछ सतवत-ए-शाही का जलाल तेरे अंजाम से हर शख़्स को इबरत होगी सर उठाने का रिआया को न आएगा ख़याल तब-ए-शाहाना पे जो लोग गिरां होते हैं हां उन्हें ज़हर भरा जाम दिया जाता है तू कि ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-शहंशाही थी रक़्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है जालिब हर दौर में उतने ही प्रासंगिक रहेंगे। एक कलमकार के लिए इससे ज़्यादा आदर-सम्मान और कुछ नहीं होता ।
हबीब जालिब….इंक़लाब का ऐसा शायर जिसे काग़ज-कलम की ज़रूरत न थी






