चार चिरकुट जैसा चाहें जैसा बोलें जो भी उनका ज्ञान व जानकारी का स्तर हो उसमें रमे रह सकते हैं पर देश की राजनीतिक चर्चा गांधी लोहिया जेपी के विचार योगदान और समाजवादी सिद्धांत के बगैर हो नहीं सकती। समाजवाद किसी के यहॉं गिरवी नहीं है , न पार्टियों न नेताओं की दुकानों के यहॉं। यह सनातन सिद्धांत है समता और समृद्धि का। जब तक इंसान इन दोनों बातों के लिये सपने देखता रहेगा , लड़ता रहेगा डा० लोहिया की सप्तक्रांति कौंधती रहेगी। समाजवादी और कांग्रेस के रिश्ते पारिवारिक हैं। लाठी मारने से काई नहीं फटती दोस्त। विवाद मत करो। तुम इतिहास लिखने की कोशिश में जिसे अभद्र भाषा में तौल रहे हो, वे ख़ुद इतिहास हैं
रमाशंकर सिंह पूर्व मंत्री मध्यप्रदेश शासन
चंचल ( भू यानी बीएचयू ) खुले आम डंके की चोट पर कांग्रेस में हैं लेकिन नाल गढ़ी है समाजवादी आँगन में ! उनकी वर्तमान सोच और राजनीति से पूरा इत्तेफाक होना ज़रूरी नहीं है, मेरा भी नहीं है पर बुनियादी सिद्धांत पर सहमति है।
जेपी से ज्यादा गांधी के नज़दीक कौन होगा ? घोर कम्युनिस्ट दर्शन से शुरुआत जब की थी तब भी गांधी के आश्रम में रह रहीं जेपी की नवविवाहिता पत्नी प्रभावती ने देश के लिये ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया था जो जेपी ने जीवन भर निभाया। नाम धर लेने से कुछ नहीं होता गांधी विचार पर अमल करना पड़ता है। जेपी देशद्रोही हैं तभी नेहरू जी बार बार उनके बाद कौन का उत्तर जेपी का नाम लेकर देते थे ? डा० लोहिया को पार्टी सँभालने के लिये नेहरू जी ने १९४६ में क्या प्रस्ताव इसीलिये किया था कि वे सीआईए एजेंट थे ?
इन दोनों ने कभी सत्ता स्वीकार नहीं की बल्कि आज़ाद भारत की जेलों में भी रहे एक साधारण व्यक्ति की तरह । पीडायें यातनायें सहीं और बीमार हुये तो लोहिया ज़िद करके साधारण अस्पताल में भर्ती हुये जहॉं डाक्टरों की लापरवाही से मृत्यु हो गई पर विदेश जाना इंकार करते रहे ! अंतिम इच्छा के अनुरूप दिल्ली के लावारिसों के श्मशान में दफ़नाया गया था ।
इनके बराबर कौन खड़ा है ?
हो भी सकता है ?
गाली खाना अपने राष्ट्रीय पुरुखों के लिये कोई ख़ास बात नहीं। पहले जान तो लेते कि किसके लिये क्या कह रहे हो ? नहीं सहेंगें , बर्दाश्त के बाहर है ! एक वित्तपोषित कह रहा था कल कि मेरी ज़िंदगी पूरी हो चुकी ! क्या पता किसकी पूरी हो चुकी है और क्या पता कौन किसको आउटलिव कर दे !
देखियेगा कि इस पर एक दिन कांग्रेस को ही माफ़ी माँगनी पड़ेगी जैसे आपातकाल पर माँग चुके हैं जिसे चार काले कौवे झुठलाना चाहते हैं ! बिहार का जनमानस अपने सबसे दैदीप्य पु्त्र के लिये उचित जवाब देगा और जल्दी ही ।डा० लोहिया को गाली गंगा जमुना सरयू के पुत्र नहीं सहेंगे – करारा जवाब मिलेगा । बस कौवों की करतूत पार्टी पर वैसे ही भारी पडेगी जैसे आपातकाल के समय चार चापलूस मंत्रियों की भारी पड गई थी । भूल गये कि इंदिराजी भी समाजवादी राजनारायण के हाथों चुनावी हार देख चुकी थीं । मैंने रायबरेली के दोनों चुनावअपनी आंखो से ही देखे थे कि बडबोले कैसा नपकसान करते हैं
समविचार समबोध के समताघर से चंचल जी का लिखा पढ़ते जाइये
आपातकाल के बीते पचास साल हो गए । रुदाली आज शुरू कर रहे हो – “ आपातकाल सही था , “ “ जेपी ग़लत थे “ “ डॉ लोहिया और जेपी सीआईए के एजेंट थे “ ? सच कहूँ तो गुस्सा नहीं आता , तरस आती है , हम ये नहीं कहते कि जब आपातकाल लगा या ७४ का छात्र आंदोलन चला तो आप पैदा भी नहीं होंगे , यह कहना जायज नहीं है , आपका पूरा हक है इस वाक़यात को जाने और उस पर जायज़ तार्किक बहस करें । आपकी सुविधा के लिए बता दूँ – अभी वाणी प्रकाशन से एक दमदार किताब आई है “ 1974 “ इसका संपादन किया है उस समाय के दो मशहूर पत्रकार – अम्बरीश कुमार और अरुण कुमार त्रिपाठी ने । -७४ का छात्र आंदोलन क्या था , आपातकाल क्या था , उस समय की परिस्थितियाँ क्या थी , संघ और जे पी के रिश्ते वगैरह । इस किताब में जिन लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं वे सब के सब अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं ।
छात्र आंदोलन और आपातकाल का अंत जान लेना जरूरी है जितना कि उस समय के किरदारों की भूमिका को ।
छात्र आंदोलन क्या था ? आपातकाल क्या था कैसा था ? इसे आसान शब्दावली से समझ लीजिए ।
“ लोकतंत्र में दो शक्ति समाहित है – जनशक्ति और राजशक्ति । इसी जनशक्ति और राजशक्ति के “तनाव” पर लोकतंत्र फलता फूलता है । राजशक्ति अगर मजबूत हुई तो तानाशाही का ख़तरा रहता है , और जनशक्ति ताक़तवर हुई तो अराजकता आएगी । तानाशाही और अराजकता से बचाना हो , लोकतंत्र को ज़िंदा रखना हो तो दोनों के बीच बराबर का तनाव बना रहना चाहिए “
दुनिया के इतिहासकार कभी लोक तंत्र की बात करेंगे तो ७० के दसक का भारत सामने रखना पड़ेगा जहाँ एक ही साथ जनशक्ति और राजशक्ति का “ प्रयोग “ होता है । जनशक्ति के प्रतीक हैं समाजवादी जे पी और राजशक्ति की प्रतीक हैं समाजवादी इंदिरा गांधी । दोनों गांधीवादी हैं , फर्क है तो बस इतना कि एक एक सरकारी समाजवादी है दूसरा कुजात गांधीवादी ( बकौल डॉ लोहिया – गांधीवादी तीन हैं , सरकारी गांधीवादी ( पंडित नेहरू ) मठी गांधीवादी ( विनोबा भावे ) और कुजात गांधीवादी ( तमाम समाजवादी ) । इन दो शक्तियों के टकराव का अंत इतिहास को चौका कर चौकन्ना करता है , दोनों एक दूसरे से गले मिलते हैं , दोनों में प्रायश्चित की भावना है । दोनों मिल कर इतिहास बनते हैं । भारत का यह काल खंड अपने इस प्रयोग के लिए जाना जाएगा , अंग्रेजी का एक मुहावरा है – both is right on wrong point । ग्रीक ट्रेजडी का बड़ा उदाहरण सामने आता है । दोनों ने अपने “ अति “ को स्वीकारा, दोनों इतिहास के हीरो हो गए । खलनायक कोई नहीं । मंजर देखिए ।
आपातकाल खत्म हुआ , चुनाव में श्रीमती इंदिरागांधी की पराजय हुई , जनता पार्टी सत्ता में आ रही है । सरल भाषा में जनशक्ति जीत रही है और राजशक्ति हार रही है । लेकिन इतिहास तो कहीं और लिखा जा रहा था , नेपथ्य में नहीं सारे आम । जनता पार्टी अपनी जीत का जश्न राजघाट पर मना रही है । इसके नायक जेपी श्रीमती इंदिरा गांधी के घर पहुंचे हैं , दोनों ने एक दूसरे को देखा , रोक नहीं पाये दोनों अपने आपको , दोनों की नम आँखों ने राज खोल दिया । श्रीमती गांधी का सर जेपी के कंधे पर , जेपी का हाथ इंदू की पीठ पर । दोनों रो रहे हैं ।दुनिया की सबसे ताकतवर आयरन लेडी इंदिरा गांधी आनंद भवन की इंदु बनी , पंडित नेहरू के सबसे बड़े चहेते जेपी अतीत में मड गए । दोनो के बीच कुल दो सतर का संवाद हुआ । इंदू ने पूछा
– अब क्या होगा ?
– सब ठीक हो जाएगा ।
और सब ठीक हुआ । श्रीमती गांधी ने देश से अपने गलती के लिए माफ़ी मागा , देश ने माफ़ कर दिया ।
इस पूरे वाक़ये का एक मात्र गवाह हैं गांधी शांति प्रतिष्ठान के भाई कुमार प्रशांत जो जेपी के साथ श्रीमती इंदिरा गांधी के घर गए थे
समाजवादी और कांग्रेस के रिश्ते पारिवारिक हैं । लाठी मारने से काई नहीं फटती दोस्त । विवाद मत करो । तुम इतिहास लिखने की कोशिश में जिसे अभद्र भाषा में तौल रहे हो , वे ख़ुद इतिहास हैं ।

आपातकाल के 50 साल: और उस समय इंदिरा गांधी के घर गए जेपी!
आपातकाल के बीते पचास साल हो गए। रुदाली आज शुरू कर रहे हो- “आपातकाल सही था”, “जेपी ग़लत थे”, “डॉ. लोहिया और जेपी सीआईए के एजेंट थे”? सच कहूँ तो ग़ुस्सा नहीं आता, तरस आती है, हम ये नहीं कहते कि जब आपातकाल लगा या 74 का छात्र आंदोलन चला तो आप पैदा भी नहीं होंगे, यह कहना जायज नहीं है, आपका पूरा हक है इस वाक़यात को जानें और उस पर जायज़ तार्किक बहस करें। आपकी सुविधा के लिए बता दूँ – अभी वाणी प्रकाशन से एक दमदार किताब आई है “1974“। इसका संपादन किया है उस समाय के दो मशहूर पत्रकार – अम्बरीश कुमार और अरुण कुमार त्रिपाठी ने।
74 का छात्र आंदोलन क्या था, आपातकाल क्या था, उस समय की परिस्थितियाँ क्या थीं, संघ और जेपी के रिश्ते वगैरह। इस किताब में जिन लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं वे सब के सब अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं।
छात्र आंदोलन और आपातकाल का अंत जान लेना ज़रूरी है जितना कि उस समय के किरदारों की भूमिका को।
छात्र आंदोलन क्या था? आपातकाल क्या था, कैसा था? इसे आसान शब्दावली से समझ लीजिए।
“लोकतंत्र में दो शक्ति समाहित है- जनशक्ति और राजशक्ति। इसी जनशक्ति और राजशक्ति के “तनाव” पर लोकतंत्र फलता-फूलता है। राजशक्ति अगर मज़बूत हुई तो तानाशाही का ख़तरा रहता है, और जनशक्ति ताक़तवर हुई तो अराजकता आएगी। तानाशाही और अराजकता से बचाना हो, लोकतंत्र को ज़िंदा रखना हो तो दोनों के बीच बराबर का तनाव बना रहना चाहिए।“
दुनिया के इतिहासकार कभी लोकतंत्र की बात करेंगे तो 70 के दशक का भारत सामने रखना पड़ेगा जहाँ एक ही साथ जनशक्ति और राजशक्ति का “प्रयोग“ होता है। जनशक्ति के प्रतीक हैं समाजवादी जे पी और राजशक्ति की प्रतीक हैं समाजवादी इंदिरा गांधी।


दोनों गांधीवादी हैं, फर्क है तो बस इतना कि एक एक सरकारी समाजवादी है दूसरा कुजात गांधीवादी (बकौल डॉ. लोहिया – गांधीवादी तीन हैं, सरकारी गांधीवादी (पंडित नेहरू) मठी गांधीवादी (विनोबा भावे) और कुजात गांधीवादी (तमाम समाजवादी)। इन दो शक्तियों के टकराव का अंत इतिहास को चौका कर चौकन्ना करता है, दोनों एक दूसरे से गले मिलते हैं, दोनों में प्रायश्चित की भावना है। दोनों मिल कर इतिहास बनते हैं। भारत का यह कालखंड अपने इस प्रयोग के लिए जाना जाएगा, अंग्रेजी का एक मुहावरा है- both is right on wrong point. ग्रीक ट्रेजडी का बड़ा उदाहरण सामने आता है। दोनों ने अपने “अति“ को स्वीकारा, दोनों इतिहास के हीरो हो गए। खलनायक कोई नहीं। मंजर देखिए।
आपातकाल खत्म हुआ, चुनाव में इंदिरा गांधी की पराजय हुई, जनता पार्टी सत्ता में आ रही है। सरल भाषा में जनशक्ति जीत रही है और राजशक्ति हार रही है। लेकिन इतिहास तो कहीं और लिखा जा रहा था, नेपथ्य में नहीं, सारेआम। जनता पार्टी अपनी जीत का जश्न राजघाट पर मना रही है। इसके नायक जेपी श्रीमती इंदिरा गांधी के घर पहुंचे हैं, दोनों ने एक दूसरे को देखा, रोक नहीं पाये दोनों अपने आपको, दोनों की नम आँखों ने राज खोल दिया। श्रीमती गांधी का सर जेपी के कंधे पर, जेपी का हाथ इंदू की पीठ पर। दोनों रो रहे हैं। दुनिया की सबसे ताकतवर आयरन लेडी इंदिरा गांधी आनंद भवन की इंदु बनी, पंडित नेहरू के सबसे बड़े चहेते जेपी अतीत में मड गए। दोनों के बीच कुल दो सतर का संवाद हुआ। इंदू ने पूछा
– अब क्या होगा?
– सब ठीक हो जाएगा।
और सब ठीक हुआ। श्रीमती गांधी ने देश से अपने गलती के लिए माफ़ी मांगी, देश ने माफ़ कर दिया।
इस पूरे वाक़ये का एक मात्र गवाह हैं गांधी शांति प्रतिष्ठान के भाई कुमार प्रशांत जो जेपी के साथ श्रीमती इंदिरा गांधी के घर गए थे।
समाजवादी और कांग्रेस के रिश्ते पारिवारिक हैं। लाठी मारने से काई नहीं फटती दोस्त। विवाद मत करो। तुम इतिहास लिखने की कोशिश में जिसे अभद्र भाषा में तौल रहे हो, वे ख़ुद इतिहास हैं।





