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परिवार के आपसी द्वंद का कारण रोटी, कपड़ा और दवाई के सवाल 

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सीमा भारती 

रोटी, कपड़ा और दवाई आज भी एक प्रमुख सवाल बना हुआ है जिसके कारण परिवार में सगे-संबंधियों के बीच लड़ाइयां होती रहती हैं। जिस लड़ाई को समाज के द्वारा सत्ता से लड़कर जीत हासिल कर हालात को बेहतर बनाना था, वह महज परिवार के आपसी द्वंद का कारण बन चुकी है। नतीजतन, सत्ता अपनी बुनियादी जवाबदेही से बच निकलती है। 

मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के यूनियन गेट के जस्ट अंदर एक बैठक में थी, जहां दो महिलाएं एक पुरुष आपस में बात कर रहे थे। एक महिला अपने पैरों की चोट दूसरी औरत और आदमी को दिखाते हुए कह रही थी कि मेरा बेटा रोज 50 रोटी बेचता है लगभग दो किलो आटे का, लेकिन मैंने उससे कहा कि मेरे पैर पर चोट लगी है पट्टी करा दो, तो बेटे ने कहा अभी पैसा नहीं है।

वह कह रही थी कि क्या अब उसके पास पैसे नहीं होंगे पर नहीं कराया? यह कह कर वह रोने लगी। शायद उनका दूसरा बेटा भी वहीं चाय बेचता है, उसी वक्त केतली में चाय लेकर आया और अपनी मां को 3 कप चाय नाप कर दूसरी केतली में डाल दे दिया। तब दूसरी औरत पूछा कि तुम्हारा बेटा चाय नाप कर क्यों दे रहा है तो पहली औरत ने बताया अब ये तीन कप चाय मुझे बेचना है।

ये हालात बयां कर रहे हैं कि रोटी, दवाई के लिए लड़ाई तो चल रही है लेकिन घरों के बीच में। जनता अपने दुख और लाचारी का कारण अपने आपको या परिवार को मान रही है पर क्या बस यही बात है?

क्या ये सवाल बेटे की नैतिकता का है जो 50 रोटी बेचता है यानी 150 रुपए कमाता है, वो बेटा भी परिवार वाला है। या उस मां का जिसके पैर में चोट लगी है और पट्टी कराने की चाह रखती है? क्या बेटे के पास सम्मान जनक रोजगार होने का अधिकार नहीं था या उस बुजुर्ग महिला को सुरक्षित स्वास्थ्य की पहुंच नहीं होना चाहिए था? क्या उसका बेटा कपूत है या गैर जिम्मेदार बेटा है?

ऐसा यह एक मामला नहीं है बल्कि हजारों मामले होंगे जहां परिजन प्राथमिक जरूरतों के अभाव में आपस में लड़ रहे हैं। लोवर या लोवर मिडिल क्लास में पारिवारिक क्लेश का कारण अशिक्षा या अनैतिकता नहीं बल्कि प्राथमिक जरूरतों का अभाव है।

क्या विकसित देश ऐसा होता है या जिस देश की तरक्की फाइव ट्रिलियन की हो, वहां की जनता अपनी प्राथमिक जरूरतों के लिए इस तरह से कुंठित अवस्था में जी रही हो। एक तरफ बड़े-बड़े धन्ना सेठ तो दूसरी तरफ एक महिला के चोट पर पट्टी लगना भी मुश्किल हो रहा हो। तब आप इसमें दो सवाल पाएंगे, पहला प्राथमिक जरूरत की कमी और दूसरा जनता का ध्यान सेल्फ बेल्मिंग या अपने परिवार के सदस्यों को ब्लेम करने का क्यों है? क्यों वो इसके और कारणों का पता लगाने में असमर्थ है।

उन्हें क्यों सभी चीजों के लिए अपने पार्टनर और अपने बच्चे या परिवार के लोग ही जिम्मेदार लगते हैं? जनता समस्याओं की जड़ तक क्यों नहीं सोच पा रही है क्या उन्हें सोचने नहीं दिया जा रहा है या वो सोचने समझने की क्षमता विकसित नहीं कर पा रहे है? 

इसकी तुलना अगर हम कार्ल मार्क्स के संकल्पना “अपने आप में वर्ग” या “अपने लिए वर्ग” से करें तो पाएंगे कि क्यों जनता को इस बात का अहसास नहीं हो रहा है कि उनकी पारिवारिक लड़ाई का मुख्य कारण उसके अपने घर के सदस्य नहीं बल्कि वो सरकार है जो हज़ार वादे करके सत्ता में आती हैं और आने के बाद उनको भूल जाती है।

लेकिन वो जनता अपने रोजमर्रा के संकटों से इस तरह से घिरी है कि उसको ये सोचने का वक्त ही नहीं है। वो इस बात पर ध्यान केंद्रित ही नहीं कर पा रही है कि उसके पारिवारिक क्लेश का कारण कुछ और है। ये सोचने में असमर्थ है कि उसे सम्मानजनक रोज़गार ना मिल पाने का क्या कारण है, क्या वो अयोग्य है या कोई और कारण है?

अगर आप इस पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि हमारी सामाजिक संरचना उसे यह बताने में सफल होती है कि वो कम पढ़ा-लिखा है, इसलिए सम्मानजनक रोजगार पाने का हकदार नहीं है। वो अयोग्य है, जिसे वो जाति की तरह अपनी किस्मत समझ कर अपने रोजमर्रा के जीवन में जूझता रहता है। पर ये बात सही नहीं है बल्कि समाज में तमाम तरह के जाति, धर्म और लिंग से संबंधित नियम हैं कि एक व्यक्ति को पढ़ने और सीखने का अवसर ही नहीं दिया जाता है।

जिस देश की प्रधानता जाति, धर्म और लिंग हो, उस देश में नॉट फाउंड सूटेबल जैसा कोई कांसेप्ट नहीं होना चाहिए। लेकिन जनता आज अपने पारिवारिक संकट का कारण अपनी अयोग्यता और अपने परिवार के सदस्यों की कमी मानने लग जाती है और एक उम्र के बाद व्यक्ति रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता में फंसा रहता है, जिससे उस्का ध्यान इस तरफ से हट जाता है कि उसकी दयनीय अवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है?

जनता इस बात से एलिनेट हो जाती है या वो इस बात पर ध्यान ही नहीं कर पाती कि उसकी ऐसी हालत के लिए कौन जिम्मेदार हैं? और तब तक वह “अपने आप में वर्ग” बनी रहती है लेकिन जैसे ही कोई अपने रोज़ी रोटी के सवाल से उठता है उसका ध्यान इस बात पर जाने लगता है कि दुनिया में क्या हो रहा हैं। कौन कर रहा है। तब वह “अपने लिए वर्ग” बन जाता है।

यहां जनता के “अपने आप में वर्ग” से “अपने लिए वर्ग” में बदल के लिए उसे एक अच्छी नौकरी, और स्वास्थ्य की जरूरत है जिसका अहसास सरकार या धार्मिक ठेकेदारों को होता है लेकिन वह इन्हें इस बात को मालूम ही नहीं होने देना चाहते हैं और उसके लिए कुछ नहीं करते है लेकिन ये बात जनता को नहीं पता होती कि उसकी दयनीय स्थिति का मुख्य कारण क्या है।

जिस दिन उसे इस बात पर गौर करने का मौका मिला वह सड़क पर आ जाएगी, सरकार के खिलाफ हो जाएगी और ये सवाल करेगी कि मैं इस देश का नागरिक हूँ और लोकतंत्र के जरिए आपको सत्ता पर काबिज होने का अवसर मैंने ही आपको दिया है तो फिर मेरे रोटी, कपड़े मकान का सवाल आपका सवाल क्यों नहीं है? क्यों मैं इस दयनीय स्थिति में हूँ? आपने हमारे और हमारे परिवार के लिए क्या किया ?

तब समाज की सामाजिक संरचना चरमरा जाएगी और समाज का नया निर्माण होगा जिसमें बराबरी रहेगी, सामाजिक न्याय के साथ समानता और भाईचारा रहेगा।

Ramswaroop Mantri

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