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बौनों की बस्ती में कद की तलाश

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मनोज पासवान

आज आपसे दो किस्से साझा करने जा रहा हूँ। किस्सा सुना सुनाया ही होता है लिहाजा इसे इतिहास के पन्नों में तलाशने की जहमत मत उठाइयेगा। इन्हें तो बस पढ़िए और उसमें डूब कर दौरान ए वक्त के नायाब मोतियों को अपनी हाथों में पकड़ने की कोशिश कीजिये।

 किस्सा नम्बर एक

एक बार मशहूर शायर मिर्जा गालिब को बादशाह बहादुर शाह जफर का दावतनामा मिला। मौका था बादशाह की ताजपोशी की सालगिरह का। इस मौके पर महल में शानदार जलसा रखा गया था। गालिब जाने को तैयार हुए तो दोस्तों ने समझाया कि मामला शाही दरबार का है, ऐसे कपड़ों में मत जाइए कुछ ढंग की पोशाक पहन लीजिये, वहाँ आपके शेरों की खूबसूरती को देखने की किसके पास आंखें हैं, आपके दिल को मापने का किसके पास तराजू है। पर गालिब ठहरे फकीराना अंदाज के मालिक वो नहीं माने, पहुँच गए मुफलिसी के लिबास में। हुलिया देख सिपाही ने दरवाजे पर ही रोक दिया , बोला कौन हो कहाँ घुसे जा रहे, यहाँ रईसों को बुलाया गया है फकीरों को नहीं। गालिब ने शाही दावतनाम भी दिखाया पर सिपाही नहीं माना , बोला किसीका चुरा लिया है क्या। गालिब उल्टे पाँव वापस लौटे, दोस्तों से मांग कर शानदार शेरवानी अचकन पहनी और फिर पहुँच गए महल। इस बार सिपाही ने न रोका न टोका, गालिब ने खुद से ही दावत नामा दिखाया तो सिपाही बोला अरे यही तो वो भिखारी भी लेकर आया था शायद आपका ही चुरा लिया था। दीवाने खास में एक से एक हस्तियां तशरीफ़ फरमा थीं।

दस्तरख्वान पर गालिब को बादशाह के बगल में बैठाया गया। दावत शुरू हुई तो गालिब वहाँ पेश किये गए पकवान उठा कर अपनी शेरवानी और अचकन को खिलाने लगे। बादशाह हैरान ये क्या कर रहे गालिब, ये हरकत तो तमीज के खिलाफ है, गालिब रुके नहीं वो अपनी पोशाक को मिठाई खिलाने में लगे रहे, आखिरकार बहादुर शाह जफर पूछ ही बैठे गालिब आप ये क्या कर रहे है, गालिब ने कहा इस जलसे में गालिब तो आये ही नहीं, गालिब को तो सिपाही ने घुसने ही नहीं दिया, यहाँ तो ये पोशाक आई है लिहाजा उसे ही खिला रहा हूँ। ये था कपड़े से औकात नापने वाली सोच पर टिकी दरबारी संस्कृति को गालिब का करारा जवाब। बहादुर शाह जफर ने जब पूरी दास्तान सुनी तो शर्मिदा हुए, माफी मांगी। अहम सवाल ये कि क्या अब ऐसी बातों पर हुकूमत और हुक्मरान शर्मिंदा होते है? 

किस्सा नम्बर दो

प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिन था। इस मौके पर डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने कवि गोष्ठी आयोजन किया था। जिसमें देश के सभी जाने माने कवि आमंत्रित थे। इसी सिलसिले में इंदिरा गांधी, बच्चन जी से मिलने गईं थी, संयोग से वहाँ कवि बाबा नागार्जुन भी मौजूद थे। इंदिरा जी ने उन्हें देखा तो बोली बाबा आप भी गोष्ठी में आइए। बाबा नागार्जुन बोले आ तो जाऊँ पर क्या आपके पिता जी मेरी कविता सुन पाएंगे। इंदिरा जी ने शालीनता से कहा क्यों नहीं सुनेंगे आप अवश्य पधारें। बच्चन जी ने भी इंदिरा जी की बात की ताईद की, नागार्जुन जाने को राजी हो गए। गोष्ठी में देश के बड़े बड़े कवियों के बीच पंडित नेहरू के सामने युवा नागार्जुन ने कविता पढ़ी–

          वतन बेच कर पं नेहरू फूले नहीं समाते हैं,

          फिर भी गांधी की समाधि पर झुक झुक फूल चढ़ाते हैं।

 कविता पढ़ने वाले का कलेजा और सुनने वाले का जज्बा दोनों ही बेमिसाल। एक की हिम्मत का जवाब नहीं तो दूसरे की सहिष्णुता का सानी नहीं। अहम सवाल यह कि क्या आज नामुमकिन को मुमकिन बनाने के दावे के दौर में ऐसा मुमकिन है? अब तो किसी ने ऐसा किया भी तो अगली सुबह दरवाजे पर ईडी और सीबीआई दस्तक देने लगेगी। इंसान कद से बड़ा नहीं होता, बड़ा होता है बड़े दिल और दिमाग से पर बौनो की बस्ती में ये मुमकिन कहाँ। हम तो बस इतना कहेंगे – क्या लोग थे वो, क्या बात थी उनकी।

Ramswaroop Mantri

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