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*नेपाल के हालात और भारत में राधाकृष्णन की  जीत के मायने!*  

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– सुसंस्कृति परिहार 

 ऐसा लग रहा है 9 सितम्बर 2025 का दिन नेपाल में लोकतांत्रिक शासन के ख़ात्मा का दिन साबित हुआ है। यदि युवा आंदोलन कारियों की नज़र से इस दिन का मूल्यांकन किया जाए तो इसकी वजह मंहगाई और भ्रष्टाचार को बताया जा रहा है।कहा यह जा रहा है कि लोकतंत्र की छत्रछाया में ये नेता अधिनायकवाद की ओर बढ़ चले थे।जबकि जनता ने सामंतवादी सरकार के लिए जिम्मेदार राजतंत्र को उखाड़ फेंका था। हालांकि नेपाल को राजतंत्र की ओर  पुनः धकेलने की कोशिश में कई हिंदुवादी संगठन लगे हुए थे जिनके तार बताया जा रहा है कि भारत की हिंदुत्ववाली ताकतों से जुड़े थे।यह इसलिए भी सच लगने लगा था क्योंकि जब नेपाल जैसा एकलौता हिंदुराष्ट्र ,लोकतांत्रिक देश बना तब सबसे ज्यादा चोटिल भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने वाली शक्तियां ही हुई थीं। 

लेकिन उनके इस गुपचुप आंदोलन की जो सफलता दिख रही है  उसे धार  दिया एक युवा ने जिसका नाम सुडान गुरुंग या सुदन गुरुंग!24 वर्षीय सुदन गौरांग जिसे नेपाल का”Gen Z क्रांतिकारी” कहा जा रहा है! यह ना ही कोई राजनीतिकौ एकमात्र सत्ता से सरकार को हटाना ही हो गया था। जिसमें वे सफ़ल भी रहे।जिससे हिंदुत्व वादियों की पौ-बारह हो गई है। आश्चर्यजनक इसलिए और भी है कि लोकतांत्रिक देश में सरकार को सम्मान जनक तरीके से चुने हुए सांसद हटा सकते थे।अब देखना यह है कि इन उपद्रवकारी ताकतों को एकजुट करने वालों की असलियत सामने आती है या नहीं क्योंकि वे अपने मकसद में सफल हो गए हैं।

दूर दृष्टि डालें तो भारत को छोड़कर सारे  हमारे तमाम पड़ौसी  देशों में जन आक्रोश लगभग इन्हीं कारणों से उपजा है वहां सत्ता परिवर्तन इसी तरह की अराजकता के माध्यम से हुआ है। श्रीलंका, बांग्लादेश ने यह हिंसक राह दिखाई है। नेपाल इस तरह का तीसरा देश है। इंडोनेशिया और पाकिस्तान में भी अंदर अंदर ज्वार उठता दिखाई दे रहा है।

इन घटनाओं को देखते हुए भारत को सावधान रहने की ज़रूरत है। यहां युवा उत्तेजित ज़रुर है किंतु वे संवैधानिक रास्ते से बदलाव के पक्षधर हैं। मगर यदि लोकतांत्रिक चुनावों में वोट चोरी का अध्याय बंद नहीं होता है तो भारत में ऐसे अराजक तत्वों को रोका जाना मुश्किल होगा।

बहरहाल लोकतंत्र का नेपाल में खात्मा होना चिंता का विषय है।इसी दिन भारत में उपराष्ट्रपति का चुनाव भी था।जीत तो सत्तारूढ़ पार्टी की तय थी किन्तु इंडिया गठबंधन ने जिस एका का परिचय दिया तथा निर्दलीय साथ में आए। वह इस बात का द्योतक है कि सत्तारूढ़ पार्टी की ज़मीन दरकी हुई है।इसे इस तरह समझा जा सकता है उप राष्ट्रपति चुनाव सन् 2022में एनडीए को 528 और इंडिया गठबन्धन को 182 वोट मिले थे।2025 के चुनाव में अब एनडीए को 452 और इंडिया गठबन्धन को इस वर्ष 300वोट मिले हैं यदि15 रिजेक्ट वोट मिल जाती तो  स्थिति और मज़बूत होती। लेकिन दो सालों में आया यह परिवर्तन मायनेखेज है और सत्तारूढ़ दल की हार को दर्शाता है। चूंकि यह चुनाव सांसदों के आंकड़े पर निर्भर था इसलिए जीत होना ही थी। किंतु विपक्ष की बढ़त सरकार  के लिए भी खतरे का इशारा कर रही है।अब बिहार विधानसभा चुनाव में जनता कैसा जनादेश देती है वह महत्वपूर्ण होगा।

कुल मिलाकर दोनों देशों में लोकतंत्र को किनारे कर हिंदुराष्ट्र की ओर धकेलने की कवायद जारी है। उपराष्ट्रपति चुनाव में मिले मतों से विपक्ष की हैसियत में इज़ाफ़ा हुआ है उससे लगता है आने वाले समय में भारत प्रजातंत्र की रक्षा में समर्थ होगा।

नेपाल के लोगों को भी इस बदलाव को गंभीरता से लेना चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा कर ही जन जन की रक्षा संभव होती है।

Ramswaroop Mantri

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