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दिल के अरमा आंसुओं में बह गये

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संजय रोकड़े

राजनीति में किस्मत साथ ना दे या अपनों से बड़े नेता ठान ले तो अक्सर यही होता है, हम जो चाहते है वो नही होता है। उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ के चुनाव लड़ने के स्थान को लेकर भी क्या ऐसा ही हुआ है।
ये बात यूपी भाजपा में अब तक की सबसे रोचक कहानी के रुप में सामने आ रही है। क्या अयोध्या की महत्वकांक्षा और गोरखपुर में घर वापसी ने योगी की उम्मीदों पे पानी फेर दिया है। 

Everyone knows who is BJP's CM face in 2022 UP polls: Yogi Adityanath at  Panchayat Aaj Tak - Elections News


अंदरखाने में यही चर्चा जोरों पे है। फुसफुसाहट तो ये भी है कि मोदी ने योगी को वक़्त के पहले ही ठिकाने लगा दिया है। अब मुद्दे की बात ये है कि योगी गोरखपुर से चुनाव लड़ेंगे। तो क्या भाजपा ने ये एलान करके मोदी की उस मंशा को तवज्जो दी है जिसको लेकर कहा जाता है कि ये मोदी कब किसके पर कतर दे किसी को नही मालूम पड़ता है।
वजह कुछ भी हो, लेकिन गोरखपुर और अयोध्या के बीच योगी को झूले की तरह लटका कर मोदी ने आदित्यनाथ को न केवल आईना दिखा दिया है बल्कि आंतरिक कलह को भी सतह पर लाकर खड़ा कर दिया है।
बहरहाल, भाजपा और मोदी ने योगी को उनके गृह जिले गोरखपुर से ही विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार बना कर सबको चौंका दिया है। क्योकिं योगी तो अयोध्या से चुनाव लड़ने का पूरा- पूरा मन बना चुके थे। 
योगी की मंशा थी कि अयोध्या से चुनाव लड़ कर वे खुद को मोदी के समकक्ष खड़ा कर सकते थे। लेकिन भाजपा और मोदी ने योगी को अयोध्या से चुनाव उम्मीदवार न बना कर एक तीर से कईं निशाने साधे है।
अब जब ऐसी स्तिथि में योगी के मन की नही हुयी तो तरह- तरह से बचाव किया जा रहा है। अलग- अलग तरीके से सवाल खड़े किए जा रहे है। करवायें जा रह हैं। 
सबसे पहले तो आमजन में योगी की साख खराब ना हो इसके चलते ये कहा जा रहा कि क्या योगी ने ही अपने लिए खुद सेफ सीट चुनी है। वहीं भाजपा के दूसरे तबके का  स्पष्ट कहना है कि पार्टी ने ही योगी को अपनी औकात दिखा दी है। हालाकि चर्चाएं तो ये भी है कि योगी अयोध्या से ही चुनाव लड़ना चाहते है पर अब ये दूर की कौड़ी ही लगती है। अयोध्या सीट को लेकर योगी का लगाव ऐसा नही है जिसका प्रभाव हाल- फिलहाल खत्म हो जायेगा। योगी की अपनी ही पार्टी में लोग इसे मनाने को तैयार नही है।
सच तो ये है कि अयोध्या एक ऐसी जगह है जो दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े लोगों के लिए बहुत अहम है। इस सीट पर करीब 3 लाख 16 हजार वोटर है जिसमें से ज्यादातर वोटर भाजपा की विचारधारा में विश्वास रखने वाले माने जाते है। अयोध्या शहर की सीट बरसों से यूपी में पॉलिटिकल नेरैटिव का केन्द्र रही है। ये बात दीगर है कि ये नेरैटिव दक्षिणपंथियों ने ही बना रखा है।
इसमें भी दो राय नही है कि भाजपा के लिए अयोध्या, मथुरा, वाराणसी में हारने का मतलब है उसके कोर वोटर के बीच उसकी विश्वसनियता खत्म हो जाना है,  क्यूंकि वह खुद को हिंदुत्व की रक्षक के तौर पर पेश करती रही है। 
हालाकि 1990 के दशक में मंदिर आंदोलन के चरम के बावजूद सत्तारूढ़ भाजपा कई बार इस सीट पर हार का सामना कर चुकी है। बावजूद इसके अयोध्या विधनसभा सीट आकर्षण का केंद्र तो बनी ही रही है।
इधर गुप्त सूत्र बताते है कि योगी ने जब अयोध्या सीट से उम्मीदवारी का दावा पेश था तब उनके जहन में कईं बातें थी। पहली और सबसे अहम तो ये कि वो एक ऐसी सीट का प्रतिनिधित्व करना चाहते थे जो हिन्दूओं की धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। पर ऐसा हुआ नही और योगी की मंशा धरी की धरी रह गयी।
अब सवाल फिर वही उठता है कि क्या योगी को घर वापसी के लिए मजबूर किया गया है।
बहरहाल, इसके इतर एक बात ये भी समाने आ रही है कि अबकि बार भाजपा के लिए अयोध्या जितना असान नही रह गया है। मुख्यमंत्री योगी के लिए भी नही। ऐसे में योगी को वहां से उम्मीदवार बनाया जाता और वे हार जाते तो 2024 की लड़ाई का खेल ही खत्म हो जाता।
यूपी के विधानसभा चुनाव में वो भी अयोध्या से योगी जैसा नेता हार जाये तो इसके दूरगामी परिणाम खासे खतरनाक हो सकते थे।अब आप सोच रहें होगें कि अयोध्या में भाजपा ने राम मंदिर के निर्माण की प्रक्रिया शुरु कर दी है उसके बावजूद यहां से योगी या किसी भाजपा उम्मीदवार की हार होगी ये कैसी बात है।
 हां लेकिन ये एक सच है कि अयोध्या से भाजपा हार भी सकती है। आएं देखे हार का गणित कुछ ऐसे हो सकता है। ये जगजाहिर है कि 2017 के चुनाव में भाजपा के वेदप्रकाश गुप्ता 50 हजार से ज्यादा वोटों से जीते थे। इसी दौरान समाजवादी पार्टी के तेज नारायण पांडे को भी 56 दशमलव 574 वोट मिले थे और बसपा के बज्मी सिद्धिकी ने भी 39,554 वोट हासिल किए थे।
इससे पहले 2012 में समाजवादी पार्टी के तेज नारायण ने भाजपा के लल्लूसिंह को 5405 वोटों के नजदीकी अंतर से हराया था और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के धुआंधार प्रचार के बावजूद समाजवादी पार्टी को 40 दशमलव 9 फीसदी वोट हासिल हुए थे। ऐसे में अगर अयोध्या में इस विधानसभा चुनाव ओबीसी और अनुसूचित जातियां एकजुट होकर समाजवादी पार्टी की तरफ चली गयी और कांग्रेस के उम्मीदवार को अच्छे वोट मिल गये तो भाजपा को अयोध्या में ही मुंह की खानी पड़ सकती है। समझे भाजपा के लिए हार का एक गणित ये भी है।
हालाकि इसका ये मतलब नही है कि योगी के लिए गोरखपुर सीट आसान हो गयी है। गोरखपुर में भी योगी को कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ेगा।
सच कहें तो ड़र तो यहां तक भी सता रहा है कि कहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरह योगी को भी हार का सामना नही करना पड़ जाये।
कुल मिला कर अब संदेश यही जा रहा है कि योगी को मोदी ने फंसा दिया है। अब चुनावी परिणाम जो भी हो लेकिन शुरुआती दौर में मोदी ने योगी को अपनी औकात में रख दिया है। ऊपर की ये तस्वीरें भी दो अलग अलग अंदाज में अलग अलग संदेश दे रही। इसे भी समझना होगा। हारे तो गठरी बांधों और रवाना हो योगी। जीते तो मैं जो बोलूं वो सुनों योगी। 
खैर। अबकि खेल आसान नही है। कहीं जनता दोनों की गठरी ना बंधवा दे। कहना नही। 2022 तो जाये ही जाये 2024 भी जय सियाराम ना हो जाये। हालाकि अभी कुछ भी कहना अतिशयोक्ति होगा क्यूंकि इस समय सब वक़्त के गर्भ में है।
संजय रोकड़े

Ramswaroop Mantri

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