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विज्ञापनों की चाशनी कड़वी न हो?

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शशिकांत गुप्ते

एक युवा शायर अनवर जलालाबादी के इस शेर का स्मरण हुआ।
शर्बते-सादा-दिली का जायका फीका-सा है
कोई चालाकी मिला दो चाशनी के वा
स्ते
सादा दिली का अर्थ होता है,भोला पन, निश्चलता,और साफ दिली।
शायर की कल्पना है कि,
भोले पन के फीके शर्बत में,चालाकी की चाशनी मिला दो,शर्बत का फीका पन दूर हो जाएगा।
वर्तमान दौर में चालाकी की चाशनी में तरबतर किया हुआ ही भोले पन के शर्बत का प्रचलन सर्वत्र है।
निश्चलता तो गुमशुदा हो गई है?
उपभोक्ताओं के लिए जितने भी उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं,उनकी गुणवत्ता को विज्ञापनों में शब्दों की चालाकी की चाशनी में डुबोकर प्रस्तुत किया जाता है।
इनदिनों सामाजिक, आर्थिक,
सांस्कृतिक,धार्मिक,खेल और राजनीति हर क्षेत्र में बाजारवाद हावी हो गया है। बाजारवाद की संक्षिप्त परिभाषा गुगलबाबा से प्राप्त हुई है।
वह मत या विचारधारा जिसमें जीवन से संबंधित हर वस्तु का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत लाभ या मुनाफ़े की दृष्टि से ही किया किया जाता है; मुनाफ़ा केंद्रित तंत्र को स्थापित करने वाली विचारधारा; हर वस्तु या विचार को उत्पाद समझकर बिकाऊ बना देने की विचारधारा।
हर एक वस्तु को उत्पाद समझकर बिकाऊ बनाने वाली विचारधारा को प्रक्रिया में तब्दील कर,आमजन को मानसिक गुलाम बनाने के चेष्टा ही बाजारवाद है।
बाजारवाद का प्रभाव चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में हावी होना ना सिर्फ मानवीयता पर गंभीर प्रश्न है,बल्कि देश की भावीपीढ़ी को पथभ्रष्ट करने की साज़िश भी है?
बाजारवाद के हावी होने से जीवन के संबंधित हरएक क्षेत्र,सिर्फ और सिर्फ कमाई कैसे होगी और कितनी होगी इस मानसिकता का शिकार हो गया है।
कमाई करने के बेतहाशा कीमती विज्ञापन,और विज्ञापनो में
लोकलुभावन योजना को प्रस्तुत करना।
योजना मतलब Scheme लागू करना।
एक पर एक फ्री दो वस्तु एक साथ खरीदने पर तीन फ्री वगैराह?
चिकित्सा क्षेत्र में पैकेज की योजनाओं का प्रचलन जोरो पर है।
हरएक क्षेत्र में बाजारवाद का हावी होना,मानव के मस्तिष्क पर दूसरों पर अवलम्बित होने वाली की मानसिकता को हावी करना ही तो है। एक बार अवलंबन की मानव मस्तिष्क पर हावी हो गई तो,मानव सिर्फ और सिर्फ रोबोट बनकर ही रह जाता है।
इस मुद्दे पर गंभीर और व्यापक बहस की आवश्यकता है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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