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तुलसी की रामायण में सोना, हीरा, मोती बहुत है, लेकिन उसमें कूड़ा भी है-लोहिया

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प्रस्तुति नीरजकुमार

राममनोहर लोहिया ने लिखा है कि “तुलसी की रामायण में निश्चय ही सोना, हीरा, मोती बहुत है, लेकिन उसमें कूड़ा और उच्छिष्ट भी काफी है।. . . मोती को चुनने के लिए कूड़ा निगलना जरूरी नहीं है, न ही कूड़ा साफ करते वक्त मोती को फेंकना।” मुझे लगता है,रामचरितमानस और तुलसी के संदर्भ में लोहिया की यह विवेकसंगत, तार्किक और संतुलित दृष्टि हिंदी के किसी आलोचक की दृष्टि से अधिक प्रासंगिक है। ग्रहण -त्याग का यह विवेक ही तुलसी संबंधी हमारे मूल्यांकन का आधार होना चाहिए।परम्परा को खारिज करने की जगह उसके श्रेष्ठ तत्वों को ग्रहण करने में ही समझदारी है।पर, जब सारा खेल ही भावना का हो जाए तो विवेक की बात कौन करे?

टी. एस. इलियट ने 1928 में यह घोषणा की कि वे राजनीति में राजभक्त, धर्म में एंग्लो कैथोलिक और साहित्य में अभिजात्यवादी हैं।क्या इस घोषणा के आलोक में रचनाकार और आलोचक के तौर पर इलियट को पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए?और क्या खारिज कर देने से इलियट खारिज हो जाएंगे?दरअसल , हमें समझना चाहिए कि इलियट और तुलसी अपने प्रतिगामी विचारों के बावजूद महान रचनाकार हैं।

हमारी यह समझ बहुत विचित्र है कि अन्तर्विरोध के रहते कोई महान नहीं हो सकता है।शायद इसीलिए समर्थकों का सारा जोर अंतर्विरोध को ढकने पर होता है तो विरोधियों का सारा बल अंतर्विरोध को उजागर करने पर। जबकि सच्चाई यह है कि महान प्रतिभाओं में प्रायः अंतर्विरोध होता ही होता है।

समर्थन और विरोध के भावुक अतिवाद से बाहर निकलकर हमें ग्रहण और त्याग का विवेक दिखाना चाहिए।कतिपय प्रतिगामी विचारों के कारण तुलसी के समस्त साहित्यिक अवदान को खारिज करना गलत है तो साहित्यिक-सांस्कृतिक अवदान को सामने रखकर उनके प्रतिगामी विचारों का बचाव भी गलत है।

Ramswaroop Mantri

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