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सावित्रीबाई फुले द्वारा जलाई गई शिक्षा की मशाल को महफूज रखने की जरूरत

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 मुनेश त्यागी 

     आज यानी 3 जनवरी को भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन है। उन्होंने अपने पति ज्योति राव के सहयोग और समर्थन से उस समय की रूढ़िवादिता का विरोध किया, बाल विवाह की मुखालिफत की, छुआछूत का विरोध किया, समाज में फैली जात-पात को छोड़ने और उसकी गोलबंदी तोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने लिंग भेद, जाति भेद और बालिका हत्या का जमकर विरोध किया। 

     उनके रास्ते में उस समय शिक्षा पर काबिज ताकतों द्वारा भयंकर हमले किये गये, उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया, उन पर कीचड़ और पत्थर फेंके गए, मगर उन्होंने कभी भी हार नहीं मानी। जब भी वे बच्चों और औरतों को पढ़ाने स्कूल जाती थीं तो दो साड़ियां लेकर जाती थी क्योंकि ब्राह्मणवादी और औरतों की शिक्षा विरोधी ताकतें उन पर गोबर, कीचड़ और पत्थर फेंकती थीं। बाद में स्कूल जाकर वे उस साड़ी को बदलकर दूसरी साड़ी पहनती थी। सावित्रीबाई फुले और शेख फातिमा शेख ने शिक्षा की जो मशाल जलाई थी, वह आज मध्दिम पड़ गई है। उस शिक्षा की मशाल को आज और तेज जलने की जरूरत है।

     भारत के महाराष्ट्र की महान और पहली शिक्षिका और समाज सुधारक जिसने सारे विरोधों के बाद फातिमा शेख के साथ मिलकर औरतों के लिए भारत में पहला बालिका स्कूल खोला था। आज यानी 3 जनवरी 1831 को उनका जन्मदिन है। भारत में इस दिन को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में जाना और मनाया जाता है। उनका परिवार एक कृषक परिवार था। उनके पति का नाम ज्योतिराव फुले था। उन्होंने विधवा ब्राह्मणी के पुत्र को दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार किया जिसका नाम यशवंतराव था जो बाद में उनके प्रयासों से डॉक्टर बना और जो दलितों और गरीबों का इलाज करता था।

       जब भारत गुलामी के दलदल में फंसा था, जब औरतों को कोई आजादी नहीं थी और तमाम सारी औरतें गुलामी की जिंदगी जी रही थीं, तब किसी औरत द्वारा औरतों के लिए, स्कूल का खोला जाना, बहुत ही बड़े जिगरे काम था, बहुत बड़े साहस का काम है। भारत में सबसे पहला महिला स्कूल सावित्रीबाई फुले द्वारा 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में खोला गया था। यह स्कूल सबसे पहले, उस्मान शेख ने, अपने मकान में बनवाया था। इसी स्कूल में उस्मान शेख की बहन फातिमा शेख शिक्षिका बनी, जो आखिरी वक्त तक सावित्रीबाई फुले का साथ देती रही।

    उन्होंने न केवल महिलाओं को पढ़ाने और पढ़ने के लिए स्कूल खोला, बल्कि उन्होंने दलितों, पिछड़ों और सदियों से शोषित, पीड़ित और वंचित समाज के लिए भी स्कूल खोले और उनके अंदर शिक्षा के प्रति जागरूकता का अलख जगाया। जिस समय सावित्रीबाई और फातिमा शेख ने यह बीड़ा उठाया, उस समय का तमाम मेहनतकश तबका,,, शूद्र, गुलाम, दास, किसान, मजदूर, सब के सब मनुवादी गुलामी और दासता के शिकार थे, छूआछूत के कोढ के शिकार थे। 

    उन सब को लिखने, पढ़ने, धन दौलत रखने और हथियार रखने का कोई अधिकार नहीं था। पूरे मेहनतकश समाज में नितांत अधिकारहीनता का आलम था। चारों ओर दासता, हीनता, अधिकारहीनता और गुलामी का माहौल पसरा हुआ था। ऐसे जन विरोधी माहौल में और समाज में शिक्षा की बात करना और इसे धरती पर उतारना बहुत बड़े हौसले और बुलंद इरादों का काम था। उनका उस जमाने में यह काम एकदम क्रांतिकारी था। उनके इस महान और क्रांतिकारी कारनामे और जज्बे को इंकलाबी सलाम।

      यह काम करना उन्हें बहुत महंगा पड़ा था और बेहद दर्द और पीड़ा का सामना करना पड़ा था। उस समय के लोगों ने बालिका शिक्षा का जबरदस्त विरोध किया था। यहां तक की सावित्रीबाई फुले परिवार का सामाजिक बहिष्कार किया गया और उन्हें व्यक्तिगत प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ा। उन पर कूड़ा कीचड़ और पत्थर तक फेंके गये, लेकिन उन्होंने इस सब को अपने जीवन के मिशन के रूप में लिया। इसमें उन्होंने किसी की भी परवाह नहीं की और अपने उसूलों से कोई समझौता नहीं किया और महिला शिक्षा की अपनी मुहिम को जारी रखा।

    सावित्रीबाई फुले एक महान सामाजिक समाज सुधारक भी थीं। उन्होंने विधवा विवाह करने, सती प्रथा रोकने, बालिका विवाह रोकने, छुआछूत खत्म करने जाति प्रथा उन्मूलन, विधवा बालमुंडन विरोध किया और औरतों और दलितों को समाज में ऊपर लाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की थी। उन्होंने भारतीय समाज में छाई ऊंच-नीच और छोटे-बड़े की मानसिकता का विरोध किया था और इसे बदलने का भरपूर आह्वान किया था।

       आज हमारी माताएं, बहने, बहुएं और बच्चियां जिस माहौल में रह रही हैं, उसे यहां तक लाने में सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख का बहुत बड़ा योगदान है। अगर इन दोनों महान शिक्षिकाओं के जेहन में समानता और शिक्षा का ख्याल न आया होता तो हमारी औरत जात आज भी चूल्हे चौके से बाहर नहीं निकल पाई होतीं।

       आज हम सोचते हैं कि यदि इन दोनों ने उस समय में यह ऐतिहासिक और साहसिक कदम नहीं उठाया होता तो शायद आज भी भारतीय समाज की अधिकांश औरतें, मर्द जात की गुलामी ही कर रही होती और मर्दों के पैरों में पड़ी हुई होतीं।

       वैश्विक स्तर पर, सबसे पहले रूस में 1917 की किसानों और मजदूरों की जनक्रांति ने ही दुनिया में सबसे पहले सभी औरतों को पढ़ने और शिक्षित होने की और मुफ्त शिक्षा के अधिकार का इंतजाम किया था। उन्हें मनुष्य के बराबर शिक्षा समानता और रोजगार का अधिकार मुहैया कराया गया था और इसी रूसी क्रांति ने दुनिया में सबसे पहले औरतों की गुलामी के विनाश का बिगुल बजाया था।

     बाद में इसी क्रांति की बदौलत औरतों को शिक्षा और रोजगार के अवसर मिलते ही रूस की और तमाम समाजवादी देशों की औरतें देखते ही देखते मर्दों के समाज से आगे निकल गईं। उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। क्रांति के फलस्वरूप मिली आजादी के बाद औरतों ने शिक्षा स्वास्थ्य खेल और साहित्यिक जगत में मर्दों को पीछे छोड़ दिया। सच में हमारी दुनिया की औरतें इन्हीं क्रांतियों की सबसे ज्यादा धनी है क्योंकि इन्हीं क्रांतियों ने पूरी दुनिया में समाजवादी समाज ने उन्हें पढ़ने लिखने और रोजगार के अवसर प्रदान किए और हजारों साल के शोषण, जुल्म, अन्याय और अशिक्षा से उन्हें मुक्ति दिलाई।

       सावित्रीबाई फुले की पहल का ही असर था कि आजादी प्राप्ति के बाद, भारत के संविधान में मर्दों की भांति तमाम औरतों को भी पढ़ने लिखने और शिक्षित होने का अधिकार दिया गया और इस मुफ्त शिक्षा की वजह से औरतें देखते ही देखते अधिकांश स्कूलों, कालेजों में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उन्हें डॉक्टर और नर्स बनने में देर नहीं लगी और कमाल यह है कि भारत में आज औरतें भी आदमियों के कंधे से कंधा मिलाकर जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं।

      इस सब का सबसे ज्यादा श्रेय भारत की पहली महिला शिक्षा सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख को जाता है। हालांकि आज औरतों की स्थिति हमारे समाज में वह नही बन पाई है जिसका सपना सावित्रीबाई फुले देखा था। भारत में आज भी मनुवादी सोच और पितृसत्तात्मक मानसिकता हावी है। औरतें हमारे समाज में आज भी शोषण, भेदभाव और विभिन्न अपराधों की शिकार बनी हुई हैं। हमें इन औरत विरोधी मानसिकता, सोच और माहौल को बदलने के लिए सबको एकजुट प्रयास कर आगे आना होगा।

      सबसे पहले सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख और उसके बाद नेहरू की सरकार ने भारत में यहां की बालिकाओं और औरतों को शिक्षा देने की जो लौ जलाई थी, आज वह लगातार मध्दिम प्रदेश जा रही है क्योंकि सरकार शिक्षा के बजट में कटौती करती जा रही है। सरकारी स्कूलों को बंद करके शिक्षा का शिक्षा को मुनाफे का सौदा बनाकर उसका निजीकरण कर दिया गया है। इस देश के 81 करोड़ गरीब लोगों का पढ़ना आज लगभग मुश्किल हो गया है। आज भी हमारे देश में 40% से ज्यादा जनसंख्या अनपढ़ है। आज हमें फिर से सावित्रीबाई फुले और  फातिमा शेख द्वारा जलाई गई शिक्षा की मशाल को महफूज रखने की जरूरत है और इस शिक्षा की लौ को और अधिक तेजी से जलाने की जरूरत है।

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