Nirmala Bhuradia जी की वाल से……
ईरान में महिलाओं के हिजाब की अनिवार्यता के विरोध में आंदोलन चल रहा है। इसी आकलन में एक पहले पढ़ी हुई किताब फिर से पढी। यह ईरानी बुद्धिजीवी, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शिरीन एबादी ने लिखी है। ईरान में जज रह चुकी शिरीन का कहना है कि क्रांति के पहले के ईरान में लड़के लड़कियां मिलकर घूमते फिरते थे। हम जो चाहे पहन सकते थे, स्कर्ट भी। इक्की दुक्की लड़कियां बुर्के में भी दिख जाती थी। यानी लिबास राज्य का विषय नहीं था,और धर्म भी, व्यक्तिगत तौर पर हम सब काफी धार्मिक थे। ईरान में उस समय धर्मनिरपेक्ष सरकार थी। लोगों को रजा पहलवी की सरकार से कई छोटी मोटी शिकायतें थी। और एक बड़ी शिकायत थी उनकी अमेरिका परस्ती। इन वजहों से रजा पहलवी के खिलाफ माहौल बनने लगा था। शिरीन का कहना है कि वह भी क्रांति में शामिल होती जा रही थी। और उन्हें इसमें कोई अंतर्विरोध नजर नहीं आया कि उन जैसी सुशिक्षित महिला क्रांति के नाम पर ऐसे गुट में शामिल होने जा रही है जो धर्म की आड़ में रोजमर्रा की जिंदगी के मसलों को मुट्ठी में रखेगा। अयातुल्लाह खौमेनी क्रांति का नेतृत्व कर रहे थे फिर भी ईरान के कई लोगों की तरह वह भी समझ नहीं पाई कि यह सामाजिक राजनैतिक दिखने वाली क्रांति धर्म से भी जुड़ी नहीं है बस धर्म का मुखौटा पहनेगी। शिरीन क्रांतिकारियों के साथ थी तब एक वरिष्ठ जज ने उन्हें समझाया भी था कि क्या तुम्हें नहीं मालूम जिनका तुम आज साथ दे रही हो वह सत्ता में आते हैं तो वह तुम्हारा पद छीन लेंगे? सच में यही हुआ। वे लिखती है कि महीने भर में ही पता चल गया कि भड़काए गए उन्मादी बहाव में बह कर मैंने अपनी कब्र खुद खोदी थी। धर्म सत्ता ने शिरीन को जज से सीधे क्लर्क बना दिया। पुरुषों को भी सूट- टाई, पैंट- शर्ट बंद करना पड़ा। महिलाओं पर हिजाब जैसी अन्य कई पाबंदियां आयद हो गई।
इसी हिजाब का इरान में आज जबरदस्त विरोध शुरू हो गया है। सबसे खराब चीज होती है कानूनी अनिवार्यता अथवा कानूनी निषेध। हिजाब तो सिर्फ वजह बना है, ईरान में विरोध हो रहा है कानूनी अनिवार्यता का और आज के भारत के कुछ हलकों में कानूनी निषेध जैसी बातों का।





