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*फांसी नहीं, इंजेक्शन से मौत का विकल्प! समस्या क्‍या है?*

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सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा के तरीके को लेकर केंद्र सरकार की सोच पर कड़ी टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि सरकार समय के साथ बदलने को तैयार नहीं है, जबकि दुनिया के कई देशों ने अब अधिक मानवीय तरीके अपनाए हैं. मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें फांसी की सजा पाए कैदियों को लिथल इंजेक्शन (lethal injection) से मौत का विकल्प देने की मांग की गई है.
यह जनहित याचिका अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर की गई थी. उन्होंने तर्क दिया कि फांसी देना क्रूर, अमानवीय और लंबा खिंचने वाला तरीका है, जबकि लिथल इंजेक्शन तेज, मानवीय और गरिमापूर्ण है. उन्होंने कहा, कम से कम कैदी को विकल्प तो दिया जाए कि वह फांसी चाहता है या इंजेक्शन. यह उनका मौलिक अधिकार है कि वे एक गरिमापूर्ण मौत चुन सकें. याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि भारतीय सेना में पहले से ही लिथल इंजेक्शन का प्रावधान मौजूद है, फिर आम कैदियों को यह विकल्प क्यों नहीं दिया जा सकता.
सरकार का जवाब: संभव नहीं

केंद्र सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि ऐसी व्यवस्था लागू करना व्यावहारिक नहीं है. सरकार ने इसे नीतिगत निर्णय का विषय बताया और कहा कि किसी कैदी को अपनी मौत का तरीका चुनने का अधिकार देना जटिल नीति और प्रशासनिक चुनौतियां खड़ी करेगा. इस पर न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने टिप्पणी की, समस्या यह है कि सरकार आगे नहीं बढ़ना चाहती. फांसी का तरीका बहुत पुराना है, समय के साथ चीजें बदलती हैं. लेकिन सरकार पुराने ढर्रे पर अड़ी हुई है.

फांसी दर्दनाक और लंबी प्रक्रिया
याचिकाकर्ता ने अपने तर्क में कहा कि फांसी से मौत कई बार 40 मिनट तक खिंच जाती है, जिससे कैदी को अत्यधिक पीड़ा होती है. इसके विपरीत, इंजेक्शन, फायरिंग स्क्वाड, इलेक्ट्रोक्यूशन या गैस चेंबर जैसी विधियां मिनटों में मौत देती हैं, और इनमें तकलीफ बहुत कम होती है. उन्होंने अदालत को बताया कि अमेरिका के 50 में से 49 राज्यों में अब लिथल इंजेक्शन ही अपनाया जा रहा है. साथ ही, संयुक्त राष्ट्र की उस सिफारिश का भी हवाला दिया गया जिसमें कहा गया है कि अगर मृत्युदंड दिया भी जाए तो “कम से कम दर्द” के साथ दिया जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
याचिका में कहा गया कि फांसी की सजा की प्रक्रिया (सीआरपीसी की धारा 354(5)) न केवल अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का उल्लंघन करती है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के ही ग्यान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996) फैसले के विपरीत भी है. उस फैसले में न्यायालय ने कहा था कि “जीवन का अधिकार” में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी शामिल है. पीठ ने यह साफ किया कि वह फिलहाल किसी ठोस आदेश पर विचार नहीं कर रही, लेकिन सरकार से अपेक्षा करती है कि वह नए और मानवीय विकल्पों पर गंभीरता से विचार करे. अदालत ने कहा, वक्त बदल गया है. अगर समाज और कानून आगे बढ़ रहे हैं, तो सजा देने के तरीके भी विकसित होने चाहिए.
क्यों अहम है यह मामला
भारत में आज भी फांसी ही मृत्युदंड लागू करने का एकमात्र तरीका है. स्वतंत्रता के बाद अब तक 750 से अधिक कैदियों को फांसी दी जा चुकी है, जबकि कई विकसित देशों ने यह तरीका दशकों पहले छोड़ दिया. सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस को फिर से जीवित करती है क‍ि क्या मौत का तरीका भी मौलिक अधिकारों के दायरे में आता है? अगर अदालत याचिकाकर्ता के पक्ष में जाती है, तो भारत में मृत्युदंड की प्रक्रिया में कानूनी और नैतिक दोनों स्तरों पर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

Ramswaroop Mantri

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