शशिकांत गुप्ते
इतिहास में सब नोट होता हैं।
सच्चाई छुप नहीं सकती, बनावट के उसूलों से
कि खुशबू आ नहीं सकती, कभी कागज़ के फूलों से
आज जो भी कुछ हो रहा है और जो भी कुछ किया जा रहा है।
इस पर शायर साहिर लुधियानवी का यह शेर मौजू है।
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,
हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
एक समझदार इंसान का फर्ज होता है,पहले अपने घर को सवारें,अपने परिजनों की देखभाल करें,घर में बच्चों को रोजगार मुहैय्या करवाए।
अपने दायित्व का निर्वाह ईमानदारी के साथ,अपनी मेहनत की कमाई से करें।
यदि माथे पर कर्ज का बोझ असहनीय हो और कोई विलासिता पूर्ण जीवन यापन करे, और अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए,विज्ञापनों का सहारा ले,ऐसा व्यक्ति समाज के साथ छलावा ही करता है,और स्वयं के द्वारा स्वयं को धोखा भी देता है। निर्लज्ज सदा सुखी?
यह उक्ति कहावत बेशर्मी की पराकाष्ठा है।
समझदार इंसान अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं को संतोष जनक रूप से पूर्ण करने के बाद,अपनी आय में अधिशेष मतलब surplus बचत हो,उस बचत का जो सदुपयोग करता है।
यदि उक्त मानसिकता के विपरित आचरण हो तो नतीजा निम्न शेर के भावार्थ जैसा होता है। इस शेर के शायर हैं असरार-उल-हक मजाज
वहाँ कितनों को तख्त ओ ताज का अरमां है क्या कहिए
जहाँ साइल को अक्सर
कासा -ए-साइल नहीं मिलता
(साइल = भिखारी, कासा=कटोरा)
जो सिर्फ और सिर्फ जनता को सब्ज बाग दिखाने के आदी होते हैं,वे प्रसंशा के नहीं दया के पात्र होते हैं। इस बात को शायर
अब्दुल हाफ़िज़ साहिल क़ादरी अपने शेर में यूं फरमाते हैं
काबिल ए रहम हैं वो इंसान जो
ख्वाहिश ए तख्त ओ ताज रखते है
इनादिनों खैरात बांटने वाले इश्तिहारों को देख पढ़ सुन कर, spontaneous मतलब स्वाभाविक ही निम्न पंक्तियां अपने जहन से प्रकट होती है।
जब भी हम बेशकीमती इश्तिहारों में करिश्माई उपलब्धियों को देखते हैं
हमें सड़कों और धार्मिक स्थलों पर भिखारियों की कतार दिखाई देती है।
अंत में मौजूदा हालात पर यही मशवरा है जो शायर अल्लामा इक़बालजी अपने शेर में फरमाया है।
न तख़्त-ओ-ताज में न लश्कर-ओ-सिपाह में है
जो बात मर्द-ए-क़लंदर की बारगाह में है
(बारगाह= डेरा,तंबू, महफ़िल)
शशिकांत गुप्ते इंदौर





