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*विश्व शांति के लिए अब नाटो की कोई आवश्यकता नहीं!*

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विजय दलाल

*प्रथम विश्व युद्ध से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध तक दुनिया की राजशाहियों द्वारा आर्थिक मंदिंयों के बीच अपने अपने राज्य विस्तार के लिए युद्धों से जो मानव व मानवता के विरुद्ध तांडव किया उसके परिणामों को कैसे भुगता यह इस दुनिया ने साक्षात देखा।*

*नाटो 11 व 12 जुलाई 2023 को विनियस, लिथुआनिया में शिखर सम्मेलन चल रहा हैश्व शांति परिषद (डब्ल्यूपीसी) के संस्थापक सदस्यों में से और शांति के लिए प्रतिबद्ध होने के नाते,नाटो का विरोध करना और इसके तत्काल विघटन की मांग करना हमारा कर्तव्य है।

विजय दलाल

*मगर आज भी रुस और यूक्रेन के युद्ध को देख कर जिसका कारण यूक्रेन की नाटो में शामिल होने की तैयारी और उसके कारण से रुस की सुरक्षा को खतरा बना।आज उन सभी के सामने यक्ष प्रश्न है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया के सभी देशों को एक आधुनिक बगैर युद्ध और बगैर हथियारों वाली शांत,  समान अवसर प्रदान करने वाली विकसित दुनिया का स्वप्न देख रहे थे।*

*इसे समझने के लिए हमें पिछले लगभग दो सौ वर्षों के इतिहास की घटनाओं व उनके कारणों पर नजर डालनी होगी। प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध उसकी समाप्ति के बाद शीत युद्ध। इसी दौरान फ्रांस की राज्य क्रांति, रूस और चीन की समाजवादी क्रांति, दुनिया पर लंबे राज करने वाले यूरोप के ताकतवर देशों के औपनिवेशिक वर्चस्व की समाप्ति। शीतयुद्ध के दौरान दुनिया का तीन खेमों में बंटना।*

*उसी के परिणाम स्वरूप 1955 में 15 रिपब्लिक से बना सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों का वारसा संधी गुट , 1949 में अमेरिका के नेतृत्व में यूरोप के देशों का नाटो, अमेरिकी नेतृत्व में ही 1955 सीटो (साऊथ ईस्ट एशिया ट्रीटी आर्गनाइजेशन) गठित किया। ये सारे संगठन एक दूसरे पर आक्रमण और उससे सामूहिक सुरक्षा के मूल आधार पर बने। लेकिन चूंकि दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका द्वितीय विश्व युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं थे तो 1961 में  भारत सहित एशिया के कुछ देश , दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका महाद्वीपों के कई विकासशील देश जो जो यूरोप के औपनिवेशिक शासकों से आजाद ही हुए थे उन ने संख्या में सबसे बड़ा तीसरा समूह गुट निरपेक्ष आंदोलन अपने आर्थिक विकास को ध्यान में रख कर खड़ा किया।

आज की इस अंतर्राष्ट्रीय जटिल परिस्थितियों को समझने के लिए प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के व उसके काल के अंतर को हमें समझना होगा। प्रथम विश्व युद्ध के समय तक पुरी दुनिया सामंती थी। राजशाहियों द्वारा ताकत के दम पर अपने शासन के विस्तार चाहे पास के देशों का हो या उपनिवेश के रूप दूरदराज के देश का हों एक दूसरे से छीनने के युद्ध थे।उस समय युद्ध के हथियार भी परंपरागत थे इन युद्धों का जनता से कोई संबंध नहीं होता था। आम जनता उस समय प्रजा ही कहलाती थी। प्रजा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उनका शासक कौन है। 

लेकिन प्रथम विश्व युद्ध से द्वितीय विश्व युद्ध का काल मानव जाति के इतिहास में राजनीतिक दृष्टिकोण से भी सबसे बड़े रूपांतरण का काल रहा। वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण औद्योगिकरण का प्रारंभ होना, रूस ,चीन , फ्रांस और अमेरिकी क्रांतियां होना और संचार के साधन विकसित होने से इन विचारों का दुनिया में तेजी से फैलना जिससे जनता का प्रजा से नागरिक होना शुरू हो गया। राजे रजवाड़े आधुनिक लोकतांत्रिक गणतंत्रों में बदलने लगे। द्वितीय विश्व युद्ध की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही।  युद्ध में टैंकों और विमानों का इस्तेमाल जिसकी शहरों और गांवों पर जनता पर बमबारी भी बड़ा कारण था।

इन आधुनिक शस्त्रों के युद्ध में उपयोग ने भी जनता की राजनीति में भागीदारी के विचार को प्रेरित किया। अब जनता  प्रजा नहीं नागरिक बन गई थी।

*लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नये अमेरिकी साम्राज्यवाद का बिगुल बजा । जैसा कि कई राजनीति शास्त्र के इतिहासकारों का मानना है कि जब युद्ध लगभग जीता जा चुका था तब जापान के नगरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमले की कोई आवश्यकता नहीं थी मगर दुनिया में समाजवाद के विरुद्ध नये शक्ति के केंद्र के आगाज का बिगुल था। यूरोप में सोवियत संघ के सामने खड़े होने और उसके विरुद्ध अपनी कार्यवाहियों को अंजाम  देने के लिए नाटो बना दिया था। अंततः 1990 में उसे कामयाबी मिली।

सोवियत संघ के विघटन के कई कारण बने उनमें सोवियत क्रांति के समय रूस में बेहद पिछड़ा सामंती शासन था उसमें भी 1917 की क्रांति से लेकर 1942 तक जो तेजी से आर्थिक प्रगति की थी वह युद्ध के कारण काफी पिछड़ गई। इतने बड़े सोवियत संघ के सभी रिपब्लिक्स को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सशक्त बनाने और तकनीकी दृष्टि से तेजी से उभरती हुई पूंजीवादी देशों की अर्थव्यवस्था का प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबला करने के बजाय पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों की रक्षा के लिए बैसाखी बन गया। साथ ही अपने देश के लोगों को ब्रेड के लिए लाईन में लगवा कर भारत जैसे की विकासशील देशों की मदद में भी लग गया।

ऐसे में अमेरिकी चालों में आ कर सबसे ज़्यादा पैसा स्पेस पर कब्जा कार्यक्रम, परमाणु हथियारों और अफगानिस्तान युद्ध में खर्च कर डाला। 

अमेरिका ने नाटो के नेतृत्व में सोवियत संघ के डिक्टेटरशिप आफ प्रोलतरियत के सिद्धांत के कारण अपने और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के लिए आयरन कर्टेन के कारण लोकतांत्रिक करण की थोड़ी भी हवा नहीं आने देने के कारण अमेरिका सोवियत संघ और पूर्वीय यूरोप के देशों को तोड़ने में कामयाब हो गया।

*अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी कामयाबी राजनीति के वैचारिक मोर्चे पर हुई वह थी लोकतांत्री करण का हथियार। जिसने पूंजीवाद के मोर्चे पर दुनिया के अर्थतंत्र और राजनीति के सत्ता के केंद्रीकरण को तो बहुत ताकतवर बना दिया वहीं सोवियत संघ में गोर्बाचोव के माध्यम से धीमी लोकतांत्री करण की प्रक्रिया ने सोवियत संघ को विघटित कर दिया। चीन ने उसी काल में और सोवियत संघ के समान ही परिस्थितियों में इसके विपरित एक अपने किस्म का राष्ट्रवाद का रास्ता अपनाया और परिणाम स्वरूप चीन को दुनिया में एक बड़ी आर्थिक और राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा कर लिया।

1990 में सोवियत संघ का विघटन दुनिया के आर्थिक और राजनीतिक संतुलन की दृष्टि से यूं टर्न साबित हुआ। उसका सबसे काला पक्ष यह था कि सोवियत संघ के टूटने से उसी के कई रिपब्लिक्स और पूर्वी यूरोप के समाजवादी पहचान से जाने वाले देश गुट निरपेक्ष आंदोलन वाले सबसे बड़े समूह में शामिल न हो कर अमेरिकी नेतृत्व वाले सैन्य संगठन नाटो में शामिल हुए। जिसने अमेरिका के एकछत्र राज के नेतृत्व में दुनिया में युद्ध और हथियारों के व्यापार को फिर से क़ायम कर दिया। उसके बाद दुनिया ने इस्राइल – फिलीस्तीन,इराक, लीबिया, भारत – पाकिस्तान और भी कितने ही बड़े छोटे युद्ध देख लिए और अभी यूक्रेन – रूस युद्ध चल ही रहा है और उसके घातक परिणामों को दुनिया देख ही रही है।

आज भी विश्व शांति की सबसे ज्यादा जरुरत दुनिया के अर्ध विकसित और विकासशील देशों को है जो हथियार विहीन सब के लिए समान अवसरों और विकास का सपना देख रहे हैं। जब वारसा संधी खत्म हो गई और यहां तक कि तीसरी दुनिया का गुट निरपेक्ष आंदोलन समूह खत्म हो गया तो अब नाटो क्यों?

पक्का विश्वास है इसके विरुद्ध फिर तीसरी दुनिया से कोई फिडेल कास्त्रो , मार्शल टीटो, अब्देल नासेर और पंडित जवाहरलाल नेहरू पैदा होगा।

विजय दलाल

संदर्भ – नाटो 11 और 12 जुलाई को विनियस, लिथुआनिया में अपना शिखर सम्मेलन आयोजित कर रहा है। यह लेख उसी संदर्भ में

Ramswaroop Mantri

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