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देश में कानून का शासन नहीं बचा है,,,, सर्वोच्च न्यायालय

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मुनेश त्यागी

 स्वतंत्रता आंदोलन में जनता को सस्ता और सुलभ न्याय दिलाने की मांग भी शामिल थी। इसी मांग को अमलीजामा पहनाने के लिए भारतीय संविधान की धारा 39 में सबको सस्ता और सुलभ न्याय प्राप्त कराने का प्रावधान किया गया था। भारत के सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय द्वारा संविधान लागू होने के पश्चात इसी भावना से काम किया गया और सस्ते और सुलभ न्याय प्राप्ति को नागरिकों का बुनियादी अधिकार बताया गया और शीघ्र को और जीने के अधिकार का को फंडामेंटल राइट की संज्ञा दी गई।
 आजादी के बाद किसानों और मजदूरों की मांगों पर अनेक कानून बनाए गए जिसमें मुकदमों के सीमाबद्ध निस्तारण का प्रावधान किया गया, जैसे औद्योगिक विवाद अधिनियम में मुकदमे के निस्तारण की सीमा एक माह यानी 30 दिन तय की गई। मगर आज हकीकत यह है कि श्रम न्यायालय में मुकदमों में तीन तीन, चार चार महीनों की तारीख दी जा रही हैं। अदालत में 20 -20, 25-25 सालों से मुकदमे लंबित पड़े हुए हैं और निस्तारण की बाट जोह रहे हैं। मगर वहां हकीकत यह है कि मुकदमों के अनुपात में न्यायालय, न्यायाधीश और कर्मचारी व स्टैनोग्राफर्स नहीं है और कानून के शासन का निषेध जारी है। यहां पर यह बात भी नोट करने की है की पूंजीपति वर्ग और कारखानेदार कानूनों का पालन न करके, मजदूरों के साथ सबसे ज्यादा अन्याय कर रहे हैं और कानून के शासन का निषेध कर रहे हैं और कानून के शासन को धता बता रहे हैं।
 उपभोक्ता कानून में भी यही आधारित किया गया था कि मुकदमों का निस्तारण 1 या 2 माह में कर दिया जाएगा मगर इस अवधारणा और प्रावधान के विपरीत वहां चार चार महीनों से भी अधिक की तारीखें दी जा रही हैं। वहां मुकदमों के अंबार लग गए हैं। मुकदमों के अनुपात में जज, न्यायालय और क्लर्क और स्टाफ नहीं है। यहां पर भी कानून के शासन और सस्ते न्याय की अवधारणा को दफन कर दिया गया है।
 घरेलू हिंसा अधिनियम में भी एक या दो माह के अंदर विवाद का निस्तारण करने की सीमा निश्चित की गई थी मगर वहां पर भी मुकदमों का अंबार लग गया है, मुकदमों के अनुपात में जज न्यायालय और स्टाफ की संख्या नहीं बढ़ाई जा रही हैं। समय से निस्तारण न होने के कारण देश प्रदेश में लाखों की संख्या में  न्यायालय में मुकदमे लंबित हैं और निस्तारण की बाट जो रहे हैं और सस्ते और सुलभ न्याय की उम्मीद और आशा लगाए बैठे हैं। मगर यहां भी कोई उम्मीद नहीं बची है और कानून के शासन का सरकार द्वारा ही मजाक उड़ाया जा रहा है।
  यही हाल एमएसीटी, ग्रेच्युटी एक्ट, बोनस एक्ट, वेतन भुगतान अधिनियम आदि सभी कानूनों का है। हमारे देश में इस वक्त चार करोड़ 60 लाख से ज्यादा मुकदमे पेंडिंग है। सर्वोच्च न्यायालय में 70 हजार, विभिन्न हाईकोर्ट में 57 लाख और निचली अदालतों में चार करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यहां पर भी सबसे अहम सवाल यही उठ रहा है कि समय से मुकदमों का निस्तारण क्यों नहीं हो रहा है, मुकदमों का अंबार क्यों लगता जा रहा है, और वादकारियों को सस्ता और सुलभ न्याय क्यों नहीं मिल पा रहा है?
  समस्त तथ्यों पर नजर डालकर निष्कर्ष यही निकलता है कि वादकारियों को सस्ता शीघ्र और सुलभ न्याय पाने में सिर्फ और सिर्फ केंद्र व राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं क्योंकि वे मुकदमों का सीमाबद्ध निस्तारण व समाधान नहीं चाहती, उनका निपटारा नहीं चाहती, क्योंकि मुकदमों के अनुपात में  न्यायाधीश,न्यायालय और स्टाफ नहीं हैं। सस्ता और सुलभ न्याय सरकारों के एजेंडे में नहीं है। न्यायपालिका पर होने वाला बजट नगण्य है जो इस समय जीडीपी का .02% है जबकि यह तीन परसेंट होना चाहिए। इस बजट से और सरकार की वर्तमान नीतियों और नियत से वादकारियों को कभी भी सस्ता व शीघ्र न्याय नहीं मिल सकता। जनता के साथ हो रहे लगातार अन्याय के लिए सरकार की नीतियां ही जिम्मेदार नहीं है और सरकार ही सबसे बड़ी कानून तोडक संस्था बन गई है।
इसी के साथ-साथ इस देश का धन्ना सेठ वर्ग और पूंजीवादी और सामंती सोच भी इस देश में अन्याय के साम्राज्य को विस्तार दे रही है और इनका आज भी कानून के शासन में कोई विश्वास नहीं है। इनके अंदर जनतांत्रिक विचारों और संस्कृति का कोई विस्तार नहीं हुआ है। इनमें से अधिकांश लोग कानूनों का पालन नहीं करते मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं देते बोनस ग्रेच्युटी से उन्हें वंचित रखते हैं और बहुत सारे कानूनों का जानबूझकर उल्लंघन करते हैं और कानून के शासन को मटियामेट करते हैं।
 अभी अभी पिछले दिनों भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुलेआम कहा है कि इस देश में कानून का शासन नहीं बचा है, अधिकारी और उच्च वर्ग के लोग कानून के शासन को तोड़ रहे हैं, उसकी धज्जियां उड़ा रहे हैं और कानून के शासन में सबसे बड़ी बाधाएं बन रहे हैं। जनता को सस्ता और शीघ्र न्याय दिलाने के लिए कानून को तोड़ने वालों के खिलाफ तुरंत से तुरंत सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई करने की जरूरत है ताकि समाज में संविधान और कानून का शासन कायम किया जा सके और उसकी रक्षा की जा सके।
 अतः यहां पर बड़े ही विश्वास और इत्मिनान के साथ कहा जा सकता है कि भारत में कानून का शासन स्थापित करने के लिए, एक बार फिर नई प्रतिबद्धता के साथ, संवैधानिक मूल्यों, नीतियों और नियमों को कानूनी अमलीजामा पहनाया जाए, न्यायपालिका के बजट में माकूल बढ़ोतरी की जाए, मुकदमों की अनुपात में न्यायाधीशों की, बाबूओं की और स्टेनोग्राफर्स की नियुक्तियां की जाएं और मुकदमों के अनुपात में नए और आधुनिक न्यायालयों का निर्माण प्राथमिकता के आधार पर किया जाए। इसी के साथ-साथ जनता और वादकारियों में शीघ्र सस्ते और सुलभ न्याय की मुहिम चलाई जाए और जनता में अन्याय न करने की नीति और नियत पैदा की जाए, वरना तो इस देश में सरकार और सरकारी संस्थाएं, उसकी नीतियां और नीयत कानून के शासन को सबसे ज्यादा रौंद रही होंगी और इस देश में कभी भी कानून का शासन कायम नहीं हो सकेगा।

Ramswaroop Mantri

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