पुष्पा गुप्ता
आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) द्वारा अपनी दिवंगत मां की अंत्येष्टि के सम्बन्ध में जब लिखा ही है तो इसका वह पक्ष भी लिखा जाना चाहिए था, जो कहीं अधिक क्रांतिकारी घटना है और जिसका किसी व्यक्ति द्वारा किया जाना आज भी असंभवप्राय है।
साथ ही, सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इससे यह भी पता चलता है कि शास्त्रीयता व्यवस्थाओं तथा धार्मिक मान्यताओं की मनुष्य के जीवन में आख़िर सीमा क्या है और किस हद तक वे महत्वपूर्ण हैं।
हुआ यह था कि आचार्य शंकर को जब नम्बूदिरी-ब्राह्मणों सहित उनके गांव से सभी लोगों ने अपनी मां का दाह-संस्कार अपने हाथों करने तथा मुखाग्नि देने (जिसका वचन वह संन्यास ग्रहण करने से पूर्व अपनी मां को दे चुके थे) से रोकना चाहा और शास्त्रों का हवाला देकर इस बाबत उनका विरोध किया था कि संन्यासी अंत्येष्टि-संस्कार नहीं कर सकता क्योंकि संन्यास ग्रहण करते ही उसका दूसरा जन्म हो जाता है और अपने पूर्व-जीवन के लिए वह मर चुका होता है।
फिर भी आचार्य शंकर जब अपनी मां की अंत्येष्टि अपने हाथों करने तथा उन्हें मुखाग्नि देने के अपने निश्चय पर अडिग रहे तब नम्बूदिरी-ब्राह्मणों सहित सभी ग्रामवासियों ने इस सम्बन्ध में उनको किसी भी प्रकार की सहायता देने से मना कर दिया।
तब आचार्य शंकर ने अकेले ही स्वयं अंत्येष्टि सम्पन्न करने का निश्चय किया। किन्तु इसमें समस्या यह थी कि वह उन दिनों किशोर ही थे सो शारीरिक बल में कमज़ोर, और फिर उनकी मां भी भारी शरीर की थीं– इस कारण वह अकेले ही अपनी मां के शव को श्मशान-भूमि तक नहीं ले जा सकते थे। लिहाज़ा उन्होंने अपने घर के बाहर चबूतरे पर ही उनके दाह-संस्कार का निश्चय किया– मगर इसमें भी मुश्किल यह थी कि अपनी मां के शव को उस चबूतरे तक भी अकेले स्वयं नहीं ले जा सकते थे।
अतएव उन्होंने अपनी मां के शव को कुल्हाड़ी से टुकड़े-टुकड़े काट डाला तथा एक-एक टुकड़े को उस चबूतरे तक ले जाकर सबको शरीर के रूपाकार में ही इकट्ठा किया और फिर वहां अपने हाथों मुखाग्नि देकर अपनी मां का दाह-संस्कार किया।
इस सम्बन्ध में एक बात और। आजकल धर्म-दर्शन-संस्कृति से सम्बन्धित विषयों पर खूब लिखा जा रहा है, लेकिन उनसे संबद्ध बहुत-सारी बातें बहुधा छुपा भी ली जाती हैं। क्यों हो रहा है ऐसा, पता नहीं। जानकारी के अभाव के कारण हो रहा है ऐसा या फिर कोई और न्यस्त कारण है इसके पीछे, यह भी पता नहीं।
लेकिन ध्यान रहे कि अधूरा सच किसी पूरे झूठ से भी कहीं अधिक ख़तरनाक होता है। इसी की परिणति देखी जा सकती है आज के माहौल में भी, जब आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर धर्म-दर्शन-संस्कृति की संरक्षा के ठेकेदार बने लोग धरती के हर कोने को मानव-रक्त से रक्ताभ किये जा रहे हैं और उसी आधी-अधूरी जानकारी के बल पर पांडित्य का दंभ भरते लोग भी अपनी सहमति व प्रशंसा के ज़रिये उन ठेकेदारों के रक्त-यज्ञ में मनुष्यों की समिधा डाले जाने का मार्ग निरन्तर प्रशस्त करते जा रहे हैं।





