० हत्यारे का धर्म/मज़हब देख कर उबलना ठीक नहीं।
० श्रद्धा ने कोई गलती नहीं की उसके साथ तो धोखा हुआ।
० डॉ राकेश पाठक
दिल्ली में आफताब पूनावाला ने अपनी लिव इन पार्टनर श्रद्धा का बेरहमी से कत्ल कर दिया। उसके 35 टुकड़े करके फेंकता रहा लेकिन अब पुलिस की गिरफ्त में है।
ऐसे दरिंदे और भी हैं जिन्होंने पत्नी , प्रेमिका की क्रूर हत्या की है। देहरादून के इंजीनियर राजेश गुलाटी ने अपनी पत्नी के 72 टुकड़े कर दिए थे तो इंदौर के हर्ष शर्मा ने पत्नी का कुत्ते की जंजीर से गला घोंटा और चाकुओं से गोद दिया था।
नैना साहनी को काट कर तंदूर में भूनने वाला सुशील शर्मा भी ऐसा ही दरिंदा था।
इसके उलट लिव इन पार्टनर फिरोज का कत्ल करने वाली प्रीति शर्मा भी इसी समाज में मौजूद हैं।(गाजियाबाद का मामला)
इस मामले में दो तरह के लोग उबल रहे हैं…एक तो कातिल के मुसलमान होने पर और दूसरे वे जो श्रद्धा को ही लिव इन में रहने पर दोषी ठहरा रहे हैं।
पहली बात तो ये कि हत्यारे का कोई धर्म/मजहब नहीं होता। आफताब जैसे दरिंदे, हैवान को सभ्य समाज में रहने की इजाजत नहीं हो सकती। मुल्क के कानून में जो सबसे बड़ी और कड़ी सज़ा हो वो उसे मिलना ही चाहिए। जितना जल्द हो सके उतना बेहतर।
ऐसे हैवान के पक्ष में एक भी आवाज़ उठे तो उसको मुंहतोड़ जवाब दिया जाना चाहिए। वैसे नामुमकिन है कि कोई अफताब जैसे शैतान के हक में एक लफ्ज़ भी बोले।
दूसरी बात
कुछ लोग मृतका श्रद्धा को ही दोषी, जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कहा जा रहा है कि उसने घर वालों की मर्जी के खिलाफ़ कदम उठा कर गलत किया। लिव इन में रहने पर भी एतराज किया जा रहा है।
(वैसे इस तरह की बातें करने वाले लोग आफताब के मुसलमान होने से ही ज्यादा पीड़ित हैं या उन्हें औरत की आजादी पर ही एतराज है।)
श्रद्धा बालिग थी, उसने प्रेम किया और साथ रहने का फैसला किया। यह सब उसका अधिकार था। लिव इन को कानून और कमोबेश समाज भी मान्यता देता ही है।
श्रद्धा ने न तो प्रेम करके गुनाह किया और न साथ रह कर। हां जब आफताब के जुल्म शुरू हुए तब भी उसके साथ बने रहकर उसने मानवीय भूल की है यह माना जा सकता है। तब भी क्या उसने कभी कल्पना की होगी कि वो जिस आदमी से प्रेम करती है, जिसके लिए अपना घर द्वार छोड़ आई है वो किसी दिन उसे यूं हैवान बन कर कत्ल कर देगा? हां उसके साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ और उसे जान गंवानी पड़ी।
क्या परिवार और समाज की सहमति से विधिवत हुई शादियों में ऐसे हैवानों ने अपने जीवनसाथी की हत्याएं नहीं की हैं…क्या दहेज के लिए या मामूली शको सुबहा होने पर पहले हत्याएं नहीं होती रही हैं..? हां हत्या के तौर तरीके से ये हत्या दरिंदगी और क्रूरता की पराकाष्ठा कही ही जाएगी।
इसलिए मेहरबानी करके श्रद्धा को दोष देना बंद कीजिए। वो गुनहगार नहीं थी।
० और भी हैं ऐसे दरिंदे नाम बस नाम अलग हैं..
आफताब जैसे दरिंदे हमारे समाज में और भी हैं।
दशकों पहले अपनी पत्नी नैना को टुकड़ों में काटकर तंदूर में भुनने वाले सुशील शर्मा का नाम आज की पीढ़ी को शायद याद भी न हो। वैसे अब सुशील जेल से बाहर आ चुका है।
अभी कुछ साल पहले देहरादून में सॉफ्टवेयर इंजीनियर राजेश गुलाटी ने शक के कारण पत्नी की हत्या कर दी। शव को 72 टुकड़ों में काट कर डीप फ्रीजर में रखा और फिर धीरे धीरे टुकड़े फेंकने जाता था। आजकल जेल में है।
अभी 2020 में इंदौर में हर्ष शर्मा नाम के युवक ने प्रेम विवाह के तीन महीने बाद कुत्ते की जंजीर से अपनी पत्नी का गला घोंट दिया फिर चाकुओं से गोद दिया।
हर्ष मप्र के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष का पोता है।
पिछले हफ्ते जबलपुर के एक रिसॉर्ट में प्रेमी अभिजीत पाटीदार ने प्रेमिका का गला रेत कर मार डाला। खून से लथपथ तड़पती हुई प्रेमिका का वीडियो बनाया और सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया।
ऐसे हत्यारे मनुष्य कहलाने के लायक तो नहीं ही हो सकते..ये सिर्फ़ और सिर्फ़ हैवान हैं, दरिंदे हैं, नराधाम हैं। इन्हें कानून सम्मत सबसे बड़ी सजा मिलना चाहिए।
राकेश पाठक





