झूट के जो लोग चाकर हो गए,
वो मिरे हुजरे से बाहर हो गए.
कर लिया पत्थर कलेजा कर लिया,
इस तरह बुत के बराबर हो गए.
छीन कर हमसे हमारे ख़्वाब तक,
आप साधो से सिकंदर हो गए.
इस कदर उलझे तरक़्क़ी में ख़ुदा,
फूल से इंसान पत्थर हो गए.
ज़िंदगी भर जो जिये डर में वही,
मार कर हमको बहादुर हो गए.
साफ़ करना था उसे अपना ज़िह्न्
हाथ उसके ख़ून से तर हो गए.
जो नहीं पहचान पाए सच कभी,
एक दिन वे लोग कायर हो गए.
छीलते ही रह गया घुइयाँ वतन,
आप फिर अदरक, टमाटर हो गए.
खोल ली हमने मुहब्बत की दुकां,
दिल लगा कर देख दिलवर हो गए.
नरेंद्र कुमार मौर्य
तस्वीर प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में साथी फरहत रिज़वी ने उतारी है.





