प्रोफेसर राजकुमार जैन
यूं तो तुलसी की राम कथा पर मुल्क में अनगिनत जगहों पर कथावाचकों, वाचिकाओं का मजमा जमा रहता है, जहां रामभक्त भक्ति भाव से विभोर होकर तुलसी रामायण की चौपाइयों की संगीतमय कथा को सुनकर कथा वाचकों को महात्मा का दर्जा देते हुए धर्म की महिमा में डुबकी लगाते रहते हैं। लेकिन आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में भक्ति भाव की जगह उसके तालीमी पैमाने के मुख्तलिफ पहलुओं पर गहन पड़ताल, सेमिनार में शिरकत करने वाले नामवर ऐसे विद्वानों द्वारा जिन्होंने तमाम उम्र इसी पर माथापच्ची कर महारथ हासिल करने में लगाई है, को सुनने का मौका मिला।
क्योंकि यह भक्त लोगों का मेला नहीं था ज्ञान चर्चा मे वाद- प्रतिवाद, खंडन मंडन, जिज्ञासा का होना लाजमी होता है इसलिए विचारों की इस रस्सा कसी में हाज़िर श्रोताओं ने भी सवालों की मार्फत अनसमझे, अनसुलझे पहलुओं को समझने तथा वक्ता से अपनी असहमति का भी खुलकर इजहार किया।
पहले दिन तुलसी के राम पर चर्चा भारतीय शास्त्रीय संगीत की गुरुकुल रिवायत के, देवी काली के भक्त आचार्य ‘उस्ताद अलाउद्दीन खान सभागार’ में यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर योगेश उपाध्याय जो मैनेजमेंट विषय के गुरु है, परंतु भारतीय काव्य परंपरा, धर्म, संस्कृति पर भी उनकी गहरी जानकारी है। उन्होंने तुलसी समग्र के मकसद को विस्तार से समझा कर कहा की भक्ति काव्य की परंपरा हमारे यहां अत्यंत प्राचीन है।
इसका प्रारंभ लगभग छठी, सातवीं शताब्दी के आसपास दक्षिण भारत में हुआ और वहीं से यह उत्तर भारत तक पहुंची तुलसीदास इसी परंपरा के अंतर्गत बाद के चरण में आते हैं, उनकी श्रेष्ठ रचनाएं आज भी जनमानस में जीवित है। युवा पीढ़ी को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने के लिए तुलसी साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। तुलसीदास का साहित्य भारतीय संस्कृति की आत्मा है, कहकर उन्होंने कार्यक्रम की शुरुआत की।
संस्कृत शास्त्र और लोक साहित्य की उम्र दराज विदुषी आशा कुमारी ने ‘तुलसी मत अगाधा’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि तुलसी साहित्य की विविधता अत्यंत समृद्ध है। तुलसी ने अपनी रचनाशीलता के माध्यम से नए रसों का सृजन किया। वह भाषा के साथ खेलते हैं, नए शब्द गढ़ते हैं, शब्दों को नए अर्थ प्रदान करते हैं । कविता के जितने भी स्वरूप हैं, तुलसी ने लगभग सभी में रचना की है। तुलसी की भाषा अपने आप में अत्यंत व्यापक, जीवंत और गहराई लिए हुए हैं।
‘तुलसी और लोक भाषा’ विषय पर व्याख्यान देते हुए लोक मानस मर्मज्ञ विद्वान मधुकर उपाध्याय ने कहा कि तुलसीदास को समझना आसान नहीं है। उनका काव्य लोक भाषा में है, पर उसमें गहरे अर्थ निहित है, जिनकी परतें धीरे-धीरे खुलती है। तुलसी की लोक भाषा में अरबी, फ़ारसी, तेलुगु, तमिल, गोंड और बैगा आदिवासी भाषाओं के भी शब्द मिलते है। उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि अयोध्या में एक समय तुलसीदास की रामकथा वाचक करिया पंडित कथा कहा करते थे। एक श्रोता ने जब एक पंक्ति का अर्थ पूछ लिया तो करिया पंडित ने उसके पैर पकड़ लिए और बोले- आपको तो सिर्फ एक पंक्ति का अर्थ ही समझ नहीं आया, मैं इतने दिनों से कथा कह रहा हूं पर मुझे तो अभी तक कुछ भी समझ नहीं आया। यह प्रसंग दर्शाता है कि तुलसी का काव्य जितना सहज दिखता है, उतना ही गूढ़ और गहराई से भरा हुआ है।
रामचरितमानस पर विमर्श हो तथा उसकी संयोजना, रमाशंकर सिंह ने की हो उसमें लोहिया का जिक्र ना हो यह कैसे संभव हो सकता है? उनके द्वारा संपादित ‘लोहिया के राम’ पुस्तिका का विमोचन भी इस अवसर पर किया गया। इससे पहले उन्होंने ‘डॉ राममनोहर लोहिया की सांस्कृतिक दृष्टि’ तथा ‘डॉ राममनोहर लोहिया रचनाकारों की नजर में’ ( खंड एक और दो) को संपादित कर प्रकाशित भी करवाया।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में लेखक, कला समीक्षक वह स्तंभकार ज्योतिष जोशी ने ‘तुलसीदास में लोकनायक तत्व’ विषय पर व्याख्यान में कहा कि तुलसीदास के जो आदर्श हैं, गांधी जी ने उन्हें अपने जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में आत्मसात करने का प्रयास किया। रामचरितमानस से महात्मा गांधी अत्यंत प्रेरित थे ।
इस विमर्श में सबसे ज्यादा विवादी, उत्तेजक वक्तव्य कवि, आलोचक, कला मर्मज्ञ उदयन वाजपेई का रहा। ‘नाम दर्शन’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा की तुलसी के राम की महिमा चार स्तरो पर विस्तृत है- पहला वे दशरथ के पुत्र हैं। दूसरा नाम का अपना महत्व है। तीसरा वे घट -घट में व्याप्त है । और चौथा वे सृष्टि के रचनाकार है। उन्होंने कहा कि हमें राम को केवल अयोध्या तक सीमित कर संकीर्ण दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। राम न केवल भारत के हैं बल्कि संपूर्ण विश्व के हैं। किसी एक धर्म के नहीं, बल्कि सभी धर्मो के हैं। वे संपूर्ण मानव संस्कृति को एक आधार एक दिशा प्रदान करते हैं। उदयन वाजपेई ने कहा कि किसी एक रचनाकार द्वारा कही राम कथा अपने आप में पूर्ण नहीं होती, इसलिए प्रत्येक युग और प्रत्येक कवि अपने ढंग से रामकथा कहता है। सैकड़ों रामायण लिखी जा चुकी है और आज भी नई रामायणों की रचना होती जा रही है। आने वाले समय में भी रामकथा नए सिरे से कहीं और सुनी जाती रहेगी, यही अनंतता है। सवाल ज़वाब के वक्त एक श्रोता ने जब गोस्वामी तुलसीदास की ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताडना के अधिकारी’ । चौपाई का उदाहरण देते हुए उस सत्र के दोनों वक्ताओं से सवाल किया तो ज्योतिष जोशी ने सफाई देते हुए कहा कि वह तो कुपात्रों के मुख से कही गई बात है, तथा ताड़न का अर्थ भी अलग है, तो कवि वाजपेई ने प्रतिकार करते हुए कहा सच्चाई को कबूल कर लेना चाहिए उस युग की सामाजिकता का दबाव कवि पर था, आखिरकार तुलसी भी तो एक मनुष्य ही थे। बढ़ते हुए विवाद पर दर्शक दीर्घा में बैठे हुए ग्वालियर के विद्वान कवि पवन करण ने रामचरितमानस में स्त्रियों के विरुद्ध कई चौपाइयां लिखी हुई है के कथन ने विमर्श में उत्तेजना भर दी।
महावृष्टि चलि फूटि कियारी
जिमि सुतंत्र भये बिगरहि नारी, यानी (जैसे बहुत बारिश होने पर क्यारियो की मेड़े फूट जाती हैं, वैसे ही स्वतंत्र होने पर औरतें बिगड़ जाती हैं।) श्रोताओं में बैठे एक सज्जन ने याद दिलाया की मत भूलिए गोस्वामी जी ने स्त्रियों के लिए यह भी लिखा है,
सीय- राम मय सब जग जानी।
या
कत विधि सृजी नारी जग माही। पराधीन सपनेहुं सुख नाही।।
रामचरितमानस पर सबसे सटीक टिप्पणी डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने की है,
तुलसी की रामायण में “आनंद के साथ-साथ धर्म भी जुड़ा हुआ है। धर्म शाश्वत मानी में और वक्ती भी। तुलसी की कविता से निकलती है अनगिनत रोज की युक्तियां और कहावतें, जो आदमी को टिकाती है और सीधे रखती हैं। साथ ही, ऐसी भी कविता है जो एक बहुत ही क्रूर अथवा क्षणभंगुर धर्म के साथ जुड़ी हुई है, जैसे शुद्र या नारी की निंदा और विप्र की पूजा। मोती को चुनने के लिए कूड़ा निगलना जरूरी नहीं है, न हीं कूड़ा साफ करते वक्त मोती को फेंकना। रामायण मेले का धर्म संबंधित तात्पर्य मोती-कूड़ा विवेक भी होना चाहिए”
प्रथम सर्ग के दूसरे दिन तीसरे सत्र में मध्य प्रदेश राज्य निर्वाचन आयुक्त मनोज श्रीवास्तव ने ‘तुलसी काव्य में अंतपारठयत्व’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बतौर वक्ता वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस की तुलनात्मक समीक्षा करते हुए कहा कि एक ही प्रसंग को विभिन्न रचनाकारों ने अपने-अपने अनुरूप प्रस्तुत किया है। ‘मंदिर मंदिर प्रतिकर सोधा, देखें जहां तहं अगनित जोधा। देव दशानन मंदिर मंदिर माहीं, अति विचित्र कहत जात सो नाहिं, पंक्ति से तुलसी ने दृश्य का सारगर्भित चित्रण किया है, जबकि वाल्मीकि रामायण में यही प्रसंग अत्यंत विस्तार से आता है। वहां निशाचरों के भोग-विलास, स्त्री पुरुषों की स्थिति, रात्रिकालीन वातावरण का विस्तृत और यथार्थ परक वर्णन मिलता है। इसी प्रकार उन्होंने सीता की अग्नि परीक्षा के प्रसंग पर भी तुलनात्मक विवेचना की। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि रामायण में राम द्वारा सीता से कटु वचन कहे जाने का प्रसंग उनके चरित्र की कठोरता नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि यह युद्ध केवल पत्नी को पाने के लिए नहीं, बल्कि सत्य और असत्य के संघर्ष का प्रतीक था। उन्होंने बताया कि यह आरोप कि तुलसी ने वाल्मीकि की नकल की, पूरी तरह निराधार है। हर रचनाकार अपनी दृष्टि संवेदना और समय की परिस्थितियों के अनुसार रचना करता है तुलसी की रचना में केवल कथा नहीं बल्कि प्रतीक चेतना और भाव संवेदना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। हनुमान जी द्वारा लंका में सीता की खोज के प्रसंग का उदाहरण देते हुए उन्होंने तुलसीदास की काव्य शैली की विशेषताओं को उजागर किया।
रंगकमी व संस्कृतिकर्मी व्योमेश शुक्ल ने ‘तुलसी और काशी’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने काशी की संस्कृति, परंपरा और आत्मा का गहन विवेचन करते हुए कहा कि काशी केवल एक शहर नहीं बल्कि एक जीवित चेतना है। उन्होंने बताया कि ‘काशी’ शब्द का एक अर्थ ‘प्रकाश’ है और दूसरा ‘विकास’। उन्होंने स्पष्ट किया कि शहर तो बनारस है, परंतु उस शहर की आत्मा काशी में बसती है। उन्होंने कहा कि तुलसीदास को उस समय घनघोर, विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन तुलसी ने इस विरोध से विचलित हुए बिना अपना सांस्कृतिक प्रतिरोध खड़ा किया। दबंगई का मुकाबला कविता से नहीं किया जा सकता। तुलसी ने बनारस की दबंगई का जवाब अपने राजापुर के देसी तरीके से दिया। तुलसी ने रामलीलाओ की परंपरा को जीवंत रूप दिया और बनारस की विद्वत परंपरा में नई चेतना का संचार किया। व्योमेश शुक्ल ने छात्र-छात्राओं द्वारा किए गए तुलसीदास, काशी और रामचरितमानस से जुड़े सवालों के जवाब देकर उनकी जिज्ञासाओं को शांत किया। कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर अरुण कुमार त्रिपाठी द्वारा किया गया।
भारतीय भक्ति काव्य परंपरा प्रथम सर्ग के चौथे सत्र का समापन सिधौली परिसर के विक्रम साराभाई ब्लॉक स्थित डॉ राममनोहर लोहिया सभागार में हुआ। जहां कवि एवं व्याख्याकार ध्रुव शुक्ल ने ‘जीवन जल हैं राम’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि आखिर नारायण का घर कहां है, वह रहता कहां है। जिसका अवतार होता है जो अवतार लेते हैं वह कहां रहते हैं। ये कथा तुलसीदास की रामचरितमानस में लिखी हुई है। आखिर ईश्वर कहां से आता है। उन्होंने आगे कहा कि ज्ञान को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है। तात्विक राम जो ब्रह्म स्वरुप है। भक्ति भाव का राम, जैसा तुलसीदास और गांधी ने कहा – राम निरंजन न्यारा रे- यह कोई दशरथ पुत्र नहीं, बल्कि एक तत्व है। लोक राम, जो लोक गीतों में, विवाह गीतों में और जनजीवन में बसते हैं। उन्होंने कहा कि इस संसार को देखकर आपको नहीं लगता कि यह संसार किसी की रची हुई एक सुंदर कविता है। तुलसीदास कहते हैं कि जड़ चेतन गुण दोष विश्व हीन करतार। अर्थात वह जगत गुणो और अवगुणों से भरा हुआ है, पर विवेक वह शक्ति है जो गुड और गोबर को अलग-अलग देखने की दृष्टि देती है। यह भवसागर पार करने वाली नाव हमारा शरीर ही है। केवट प्रसंग में यही गूढ सत्य छिपा हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि ज्ञान को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है। तात्विक राम, जो ब्रह्म स्वरुप है। भक्ति भाव का राम, जैसा तुलसीदास और गांधी ने कहा–
राम निरंजन न्यारा रे– यह कोई दशरथ पुत्र नहीं, बल्कि एक तत्व है। लोकराम, जो लोकगीतों में, विवाह गीतों में, और जनजीवन में बसते हैं। उन्होंने कहा तुलसीदास कहते हैं जिसका जीवन पानीदार नहीं वह भक्ति नहीं यानी जीवन में तरलता, संवेदनशीलता और प्रेम प्रवाह आवश्यक है।
अन्य वक्ता, व्याख्याकार आचार्य राघवेन्द्र ने ‘तुलसी काव्य की सामाजिकता’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा तुलसीदास ने रामकथा और रामचरितमानस की रचना एक ऐसे समय में कि जब भारत में इस्लामी सूफीवाद का गहरा प्रभाव था। उस दौर में वह भावना प्रबल हो रही थी कि ईश्वर निराकार है और उसका अवतार लेना संभव नहीं। ईश्वर को संसार के प्राणियों में देखना उचित नहीं माना जाता था। इसके विपरीत तुलसीदास ने रामचरितमानस के माध्यम से वह स्थापित किया कि जो अनंत, अजन्मा और अगोचर है, वही धरती पर राम रूप में अवतार लेता है। उन्होंने शिव पार्वती संवाद के माध्यम से उस शंका को भी प्रकट किया जो ब्रह्म है, वह मनुष्य के रूप में कैसे चल सकता है और फिर उसी संवाद के माध्यम से उनका समाधान भी दिया। आचार्य राघवेन्द्र क्योंकि संस्कृत के प्रखंड ज्ञाता है, उनके संबोधन में संस्कृत के श्लोकों की इतनी भरमार थी कि श्रोता तारतम्य बैठा नहीं पा रहे थे।
इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी के संस्थापक रमाशंकर सिंह ने भी हस्तक्षेप करते हुए कहा कि आज के युग में न तो वर्णाश्रम धर्म को मान्यता दी जा सकती है, न हीं स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जा सकता है। हमें ऐसा समाज बनाना है जो मनुष्यता के मूल्य पर आधारित हो, जिसमें स्वतन्त्रता, समता और भाईचारा हो। जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय मूल्य है उन्हें हमें जहां कहीं से भी प्राप्त हो ग्रहण करने में संकोच नहीं करना चाहिए। यदि हमारे भक्ति काव्य में ऐसे सार्वजनिक मूल्य निहित है, तो उन्हें आत्मसात करना ही सच्ची भक्ति की भावना है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉ मनीष जैसल ने किया।
इस अवसर पर रूपवाणी रंग समूह वाराणसी द्वारा राम को की शक्ति पूजा नाटक का मंचन किया गया सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की इस प्रसिद्ध कविता पर आधारित इस नाट्य प्रस्तुति की परिकल्पना, लेखन धीरेंद्र मोहन निर्देशन व्योमेश शुक्ल द्वारा किया गया। संस्थान के सिथौली परिसर स्थित ‘नाद’ एम्पीथियेटर पर आयोजित इस प्रस्तुति के मंचन से पूर्व निर्देशक ने कहा कि राम की शक्ति पूजा केवल राम की नहीं, बल्कि हम सब की कहानी है, क्योंकि हम सब अपने जीवन में कभी ना कभी उस क्षण से गुजरते हैं। रोशनी के लिए अंधेरा जरूरी है और कुछ कहने के लिए थोड़ी चुप्पी भी जरूरी होती है। एक डंका होता है ‘चुप’ का और वह भी बहुत तेज बजता है। उन्होंने कहा कि ग्वालियर एक ऐसा नगर है जो न केवल कला का, बल्कि सिद्धांत और साधना का अखाड़ा है। अगर आप शेर पालना चाहते हैं तो आपको जंगल बनाना होगा। बिना जंगल के शेर नहीं पाले जाते। अगर आपको तानसेन चाहिए तो बहुत से कानसेन तैयार करने होंगे।
नाटक में राम – रावण युद्ध के प्रसंग में पराजय से व्यथित राम की निराशा, हनुमान का क्रोध, जामवंत की सलाह और शक्ति आराधना का भावनात्मक चित्रण किया गया। दर्शक तब भाव विभोर हो उठे जब पूजा के दौरान नीलकमल पुष्प की जगह राम ने अपने नेत्र अर्पित करने का संकल्प लिया उसी क्षण शक्ति दुर्गा प्रकट होकर राम को आशीर्वाद देती है। कलाकारों द्वारा पात्रों के मुखौटे लगाकर पारंपरिक रूप में सज धज कर राम की शक्ति पूजा का बड़े ही रोचक ढंग से नाटक प्रस्तुत किया।
श्रृंखला आयोजन के मौके पर विश्वविद्यालय द्वारा यूनिवर्सिटी के जेसी बोस ब्लॉक, पीसी रे ब्लॉक व महात्मा गांधी ब्लॉक तक रामचरितमानस पर आधारित कलाकारों द्वारा नवीन सृजित चित्रकारी समसामयिक लोक देशज, आदिवासी, तंजावुर शैली चित्रकलाएं, मिनिएचर पेंटिंग, भारतीय लघु चित्र, राजा रवि वर्मा के चित्रों के ओलियोग्राफ और तैयार किए गए रामचरितमानस मृदशिल्प की प्रदर्शनियों को देख कर दर्शक हैरत में थे।
तीनों दिन के प्रोग्राम में हाल खचाखच भरा हुआ था। इसमें यूनिवर्सिटी के अध्यापकों, छात्रों के अतिरिक्त देशभर से आए व्याख्याता, कला समीक्षक, चित्रकार, रंग कमी, कलाकार और बड़ी संख्या में ग्वालियर शहर के कला साहित्य संस्कृति संगीत में रुचि रखने वाले भी मौजूद रहे।





