डॉ. विकास मानव
ज्ञान त्रि-आयामी है ~
१. लौकिक ज्ञान जिसे भौतिक ज्ञान या सांसारिक ज्ञान कहते
हैं।
२. पारलौकिक ज्ञान जो लौकिक जगत, भौतिक जगत से परे
जो लोक-लोकांतर हैं उनसे सम्बंधित ज्ञान।
३. आध्यात्मिक ज्ञान जिसका सम्बन्ध आत्मा और उसके
स्वरूप से है।
प्रथम लौकिक ज्ञान का भण्डार ही इतना विशाल है कि मनुष्य हज़ारों जन्म लेकर भी उसे पूर्णरूप से प्राप्त नहीं कर सकता। हम एक जन्म में जितना, जिन विषयों को लेकर अध्ययन किये होते हैं और ज्ञान प्राप्त किये होते हैं, वह उस विशाल भण्डार की एक बून्द के बराबर भी नहीं है।
हम वर्तमान जन्म में जितना जिन विषयों का जिस सीमा तक ज्ञान प्राप्त किये रहते हैं, अगले जन्म में उसके आगे का ज्ञान प्राप्त करने के लिए संस्कार के अनुसार प्रकृति अपनी ओर से व्यवस्था कर देती है, लेकिन नियति के अनुसार बदले हुए वातावरण और बदले हुए पारिवारिक जीवन के कारण हम किसी और ही ज्ञान प्राप्ति के मार्ग पर चल पड़ते हैं जिस पर चाहकर भी सफलता नहीं मिलती।
आत्मा को जो विषय अच्छा लगे, चित्त जिस विषय में एकाग्र हो और जिस विषय के अध्ययन में रुचि हो, समझिए वही विषय और वही ज्ञान हमारे पूर्व जन्म से सम्बंधित है जिसे अधूरा छोड़कर आये हैं हम।
रही पारलौकिक ज्ञान की बात तो उसके सम्बन्ध में अब तक मानव समाज जितना जो कुछ जान-समझ सका है, वह सागर की एक बून्द के समान है। सच पूछा जाय तो पारलौकिक विषय में जितना ज्ञान मनुष्य को होना चाहिए, वह नहीं है। जो है, उसी को वह अपनी महान उपलब्धि समझ बैठा है। भारी भ्रम में है वह।
जहां तक प्रश्न आध्यात्मिक ज्ञान का है, उसकी भी स्थिति लगभग ऐसी ही है। आध्यात्मिक ज्ञान का सागर तो और भी विशाल है, बल्कि कहना चाहिए कि असीम है। सच तो यह है कि अपौरुषेय रूप में अब तक जितना जो कुछ आध्यात्मिक ज्ञान संसार में अवतरित हुआ है, वह भी असीम और अथाह आध्यात्मिक ज्ञान के सागर की एक बून्द के समान ही समझा जाएगा जिससे कोई विशेष आत्मिक लाभ नहीं।
लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के ज्ञान से पृथक है आध्यात्मिक ज्ञान जो अपने आप में सर्वथा गूढ़, गोपनीय और रहस्यमय है।
आध्यात्मिक ज्ञान का सार है – परमज्ञान
और परमज्ञान का सार है – ब्रह्मज्ञान।
लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान का मार्ग तभी प्रशस्त होता है जब प्रथम दोनों ज्ञान में पारंगता उपलब्ध हो जाए।





