अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

आनंदित यौन-जीवन के लिए तीन सूत्र : श्वांस, ध्यान और भावदशा

Share

डॉ. विकास मानव
(मनोचिकित्सक,ध्यानप्रशिक्षक, निदेशक : चेतना विकास मिशन)

   कु़छेक को अपवाद मान लें तो यह हम सभी का महज एक भ्रम है कि : "हम पैदा हो गये हैं, इसलिए हमें पता है—क्‍या है काम, क्‍या है संभोग।"

नहीं ! बिल्कुल पता नहीं है। नहीं पता होने के कारण ही ‘जीवन’ पूरे समय कुत्सित काम और यांत्रिक सेक्‍स में उलझा रहकर अर्थहीन व्‍यतीत होता है।
पशुओं का बंधा हुआ समय है। उनकी ऋतु है। उनके मौसम है। आदमी का कोई बंधा हुआ समय नहीं है। क्‍यों?
पशु फिर भी मनुष्‍य से ज्‍यादा संभोग की गहराई में उतरने में समर्थ है और मनुष्‍य बिल्कुल भी समर्थ नहीं रह गया है।

  जिन लोगों ने जीवन के इन तलों पर बहुत खोज की है, गहराइयों में गये हैं, जीवन के बहुत से अनुभव संग्रहित किये हैं; उनको यह सूत्र उपलब्‍ध हुआ है कि :

-अगर संभोग 2- 3 मिनट तक ही होगा तो तृप्ति नहीं होगाी। स्त्री को तो कु़छ अहसास ही न होगा तृप्ति का। इंसान बार-बार सैक्स को सोचकर केवल रुग्ण बनेगा।
-अगर 15- 30 मिनट तक ढंग से संभोग चल सके तो यह इतना तृप्ति दे देगा कि वह सप्‍ताह भर तक खत्म नहीं होगी।
-अगर 30- 60 मिनट तक संगम ऐक्टिव रह सके तो तीन महीने तक न खत्म होने वाली तृप्ति से भर देगा।
-अगर 01 से 02 घंटे तक अद्वैत की आर्गाज्मिक अवस्था रह सके तो जीवन भर न समाप्त होने वाली तृप्ति से इंसान सराबोर हो जायेगा। “स्पर्मडिस्चार्ज कंट्रोल” का यह स्टेज मेडिटेशन से हम देते हैं. कोई चार्ज भी नहीं लेते. व्हाट्सप्प 9997741245 पर संपर्क करके दक्षता हासिल करने का कार्यक्रम बनाया जा सकता है.
सामान्‍यत: 99% लोगों का क्षण भर का अनुभव है सैक्स का। प्राणायाम – ध्यान में पारंगत न रहने वाले लोगों के लिए तो एक घंटे तक की कल्‍पना करनी भी मुश्‍किल है। हम तो जीवन भर संभोग के बाद भी तृप्ति को उपलब्‍ध नहीं होते। क्‍या है यह?
बूढ़ा हो जाता है आदमी मरने के करीब पहुंच जाता है और वासना से मुक्‍त नहीं होता।
इसलिए कि-
प्रेमपूर्ण संभोग की कला और संभोग के विज्ञान को उसने समझा ही नहीं है। सो हम बिलकुल पशुओं से भी बदतर हालत पर हैं। जानवरों से भी बदतर स्‍थिति में हैं हम, अतृप्ति जनित वासनांधता और कुंठा में हम रेप, गैंगरेप-मर्डर तक का पुरूषार्थ करते हैं।

  *कुछ सूत्र*

संभोग के क्षणों में श्वास जितनी तेज होगी, संभोग का काल उतना ही छोटा होगा। श्वास जितनी शांत और शिथिल होगी, संभोग का काल उतना ही लंबा होगा। अगर श्वास को बिलकुल शिथिल करने में सफलता पा ली जाये, तो संभोग के क्षणों को पर्याप्त लंबा किया जा सकता है।
संभोग के क्षण जितने लंबे होंगे, उतने ही संभोग के भीतर से निरहंकार भाव, इगोलेसनेस और टाइमलेसनेस का अनुभव शुरू हो जायेगा। उतनी तृप्ति बरसने लगेगी।
श्वास अत्‍यंत शिथिल होनी चाहिए। श्वास के शिथिल होते ही संभोग की गहराई और तृप्ति के उदघाटन शुरू हो जायेंगे।
दूसरी बात :
संभोग के क्षण में ध्‍यान दोनों आंखों के बीच, जहां योग ‘आज्ञा चक्र’ बताता है; वहां होना चाहिये। आप ध्‍यान का सहयोग लो तो संभोग की सीमा और समय को तीन घंटे तक भी बढ़ाया जा सकता है।

 तो उस गहराई के लिए—श्वास शिथिल हो, इतनी शिथिल हो कि जैसे चलती ही नहीं और ध्‍यान, सारा अटैंशन आज्ञा चक्र के पास हो। दोनों आंखों के बीच के बिन्‍दु पर हो। 

जितना ध्‍यान मस्‍तिष्‍क के पास होगा, उतनी ही संभोग की गहराई अपने आप बढ़ जायेगी। जितनी श्वांस शिथिल होगी, उतनी लम्‍बाई बढ़ जायेगी। और आपको पहली दफा अनुभव होगा कि-
संभोग में बारम्बारता का आकर्षण नहीं है मनुष्‍य के मन में। मनुष्‍य के मन में अद्वैत का, परमानंद का आकर्षण है।
एक बार उसकी झलक मिल जाए, एक बार बिजली चमक जाये और आपको दिखाई पड़ जाये अंधेरे में कि रास्‍ता क्‍या है फिर हम रास्‍ते पर आगे निकल सकते हैं।

ऐसे समझें
एक आदमी एक गंदे घर में बैठा है। दीवालें अंधेरी हैं और धुएँ से पुती हुई हैं। घर बदबू से भरा हुआ है, लेकिन-
वह खिड़की खोल सकता है।
उस गंदे घर की खिड़की में खड़े होकर वह देख सकता है दूर आकाश को, तारों को, सूरज को, उड़ते हुए पक्षियों को : और तब उसे उस घर के बहार निकलने में कठिनाई नहीं रह जायेगी।
जिस दिन आदमी को संभोग के भीतर तृप्ति की थोड़ी भी अनुभूति होती है उसी दिन वासनांध/हवसी/यांत्रिक/पाशविक सेक्‍स का गंदा मकान और ऐसे दुराचारी सेक्‍स की अंधेरे से भरी दीवालें व्‍यर्थ हो जाती हैं।

  लेकिन-

यह जानना जरूरी है कि साधारणतया हम उस मकान के भीतर पैदा होते हैं, जिसकी दीवालें बंद है। जो अंधेरे से पूती है। जहां बदबू है जहां दुर्गंध है; लेकिन- इस मकान के भीतर ही पहली दफ़ा मकान के बाहर का अनुभव करना जरूरी है, तभी हम बहार जा सकते हैं।
जिस आदमी ने खिड़की नहीं खोली उस मकान की और उसी मकान के कोने में आँख बंद करके बैठ गया है कि मैं इस गंदे मकान को नहीं देखूँगा, वह चाहे देखे और चाहे न देखे; वह गंदे मकान के भीतर ही है और भीतर ही रहेगा।

  जिसको हम ब्रह्मचारी कहते हैम। तथाकथित जबरदस्‍ती थोपे हुए ब्रह्मचारी, वे सेक्‍स के मकान के भीतर उतने ही हैं जितने साधारण आदमी। 

आँख बंद किये बैठे हैं, आप आँख खोले हुए बैठे हैं, इतना ही फर्क है। जो आप आँख खोलकर कर रहे हैं, वह आँख बंद कर के भीतर कर रहे हैं।
जो आप शरीर से कर रहे हैं, वे मन से कर रहे हैं। कोई फर्क नहीं है।
इसलिए पहले संभोग के प्रति दुर्भाव छोड़ दें। समझने की चेष्‍टा, ‘सिर्फ़ एक’ सुपात्र पार्टनर के साथ प्रयोग करें और संभोग को एक पवित्रता की स्‍थिति व मंजिल दें।

 *तीसरी बात :*

एक दिव्य भावदशा चाहिए संभोग में उतरते समय। वैसी भाव-दशा जैसे कोई मंदिर के पास जा रहा है।
क्‍योंकि-
संभोग के क्षण में हम परमात्‍मा के निकटतम होते है। इसीलिए तो संभोग में परमात्‍मा परमानंद के सृजन का, संतति के सृजन का काम करता है। इस साधना में हम क्रिएटर के निकटतम होते हैं।
जी हां,
वास्तविक संभोग की अनुभूति में हम स्रष्‍टा के, परमात्‍मा के निकटतम होते हैं। इसीलिए तो हम मार्ग बन जाते हैं, परमानंद जीवन में उतरता है और गतिमान हो जाता है।

पत्‍नी को ऐसा समझें, जैसे वह प्रकृति है, आदिशक्ति शिवा है। पति को ऐसा समझें कि वह परमात्‍मा है, उसका सब-कुछ अमृत है।
गंदगी में, क्रोध में, कठोरता में, द्वेष में, ईर्ष्‍या में, जलन में, भय में, चिन्‍ता के क्षणों में कभी भी सेक्‍स के पास न जायें।
जब प्राण ‘प्रेयर-फुल’ हों, जब ऐसा मालूम पड़े कि आज ह्रदय शांति से और आनंद से कृतज्ञता से भरा हुआ है, तभी क्षण है संभोग के निकट जाने का।
वास्तविक ‘काम’ में दो व्‍यक्ति, एक- दूसरे से जुड़ते हैं और जिस्मोजान से ‘एक’ हो जाते हैं। ‘ध्यान’ में ‘एक’ व्‍यक्‍ति समष्‍टि से जुड़ता है और ‘एक’ हो जाता है। काम दो व्‍यक्‍तियों के बीच मिलन है। ध्यान एक व्‍यक्‍ति और अनंत के बीच मिलन है। दोनों ‘अद्वैत’ ही देते हैं।

समग्र प्रेम और वास्तविक संभोग बिना स्‍वभावत: दो व्‍यक्‍ति का मिलन क्षण भर को होता है।
एक की अयोग्यता की दशा में दोनों व्‍यक्‍ति सीमित हो जाते हैं। उनका मिलन असीम नहीं हो सकता। यही पीड़ा है, यही कष्‍ट है, सारे दांपत्‍य का, कि जिससे हम जुड़ना चाहते हैं, ‘उससे भी’ सदा के लिए नहीं जुड़ पाते।
एक के सुपात्र न होने या एक की नपुंसकता की दशा में हम महज क्षण भर को जुड़ते हैं और फिर फासले होते जाते हैं। ये फासले पीड़ा देते हैं। ये फासले भीतर से बहुत कष्ट देते हैं : बाहर से हम हंसते रहें- समझौता करते रहें, ये अलग बात है।
भीतर से दूसरे प्रति क्रोध व घृणा का जन्म होता है। जीवन नर्क़ बनकर रह जाता है।
(चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें