26 जनवरी को लाल किले पर धार्मिक झंडा फहराना मोदी सरकार की एक साजिश थी। जिसमें कुछ साजिश में शामिल थे और कुछ इस्तेमाल किए गए थे। अब सिंघू बॉर्डर पर एक शख्स की हत्या भी इसी साजिश का हिस्सा है । दोनों का मकसद एक ही है।
किसान संघर्ष और किसान मुद्दों के मुकाबले में धार्मिक मुद्दों को सामने लाना, संघर्ष कर रही जनता पर प्रहार करना, इस हंगामे में किसान संघर्ष का नेतृत्व करने वाले प्रतिनिधियों को बदनाम करना और अंततः किसान संघर्ष को चोट पहुँचाना।
दोनों षडयंत्रों की मंशा एक ही है, कथानक भी एक ही है, मात्र कहानी अलग है, कहानी की आवश्यकताओं के अनुसार पात्र बदल दिए गए हैं और मंच नया लगाया गया है लेकिन बाद के घटना क्रम में एक व्यक्ति की बलि ले ली गई है।
दोनों कहानियों का एक ही सबक है कि संघर्ष के धर्मनिरपेक्ष चरित्र की रक्षा बहुत जरूरी है और सरकार का जोर इसे धार्मिक रंगत देने पर है ।
पहली नाट रूपी घटना लोगों के लिए थोड़ी भ्रमित करने वाली थी क्योंकि झंङा लाल किले पर फहराया गया था। लेकिन जब दुश्मन हारने लगता है तो वह बौखलाहट का शिकार हो जाता है, व नाटक की पेशकारी भी कमजोर और आत्म-विरोधाभासी होने लग जाती है। इसी तरह से अब की बार की कमजोर स्क्रिप्ट लोगों के सामने अपने आप ही बहुत कुछ बयां कर रही है। 26 जनवरी को नेतृत्व कर रहे प्रतिनिधियों को लोगों के एक तबके को यह समझाना पङा था कि धार्मिक रंग देना कैसे गलत है लेकिन अब लगता है कि यह बहुत जल्दी समझ में आ रहा है।
दुश्मन के पास सच नहीं है, उसका पूरा ध्यान झूठ पर केंद्रित है, धोखे पर है ,परंतु धैर्य रखें व सबलता से ङटे रहें अगली स्क्रिप्ट इससे भी कमजोर होगी और साजिशों को पहचानना और भी आसान होगा।
संघर्ष करने वाले लोगों को साजिशों की पहचान करने का काफी अनुभव हो रहा है। इस अनुभव के आधार पर, आगे की चालें भी पछाङ दी जाएंगी।
*पंजाबी से अनुवादित*
*-पावेल कुस्सा* *(संपादक सुरख लीह)*
दोनों कहानियों का सबक गांठ बांध लो…




