पुष्पा गुप्ता
_तो जनाब, पैसा एक ऐसी शै है जिसके जैसा कोई नही। इससे तमाम मुसीबतें जुड़ी हैं और जुड़ा है ला,ला,लाsss..! पैसा सिर्फ ला, मगर लेकर ना जा.. । खुदा ने इंसान को बनाया. इंसान ने पैसे को. फिर पैसे को इंसान ने अपना खुदा बनाया._
"पैसा खुदा तो नही पर खुदा की कसम, खुदा से कम भी नही .." और खुदा ने नैरो एस्केप कर चैन की सांस ली।शेर वैसे तो दूसरे भी थे, चीते भी थे जिनसे इंसान बचता फिरता था, और मगर दूसरे जानवर इंसान से बचते फिरते थे।
हां, वो सुकून के दिन थे, जब इंसान जानवर मारता था, उनका मांस खा लेता, खाल पहन लेता। गुफा की दीवारों में पेंटिग बनाता। रोटी कपड़ा मकान और इंटरटेनमेंट की मौलिक जरूरत, बगैर पैसे के सुलभ थी। जरा सोचिये, क्या दिन थे वो.
_लेकिन घुमंतू जीवन दुश्वार था। कभी शिकार न मिलता तो कभी शिकारी शिकार हो जाते। जरा जिंदगी में ठहराव चाहिए था। मिला, नदियों के किनारे.. जब खेती का अविष्कार हो गया। घर मिट्टी के हो गए, कपड़ो की खोज हो गयी।_
सब अन्न के उत्पादन में लग गए। लेकिन अब जरा एक कठिनाई थी। सभी लोग एक ही काम कर नही सकते। जो खेती करते उसे हल की जरूरत थी। वो बढई बनाता, मगर वो सारे वक्त हल बनाता तो खाता क्या? नतीजा हुआ बार्टर सिस्टम, याने तू मेरा काम कर, मैं तुझे धान दूंगा। या मैं तुझे धान दूं, तू मुझे टमाटर दे।
गुड्स एंड सर्विस का आदान प्रदान शुरू हुआ, मगर इसके संचय की सुविधा न थी। संचय याने जमा करना, जैसे कि मैंने आपका घर बनाया, आपने मुझे टमाटर दिये।
मेरी सेवा याने आपका घर स्थिर है, मेरा टमाटर सड़ जाएगा। याने मेरी दी हुई सेवा का फायदा संचय न हुआ। अब..?
अजी, कौड़ियां हैं न। ये टमाटर छोड़ो, कौड़ी लो। रेयर है, दूर देश से आई है। इस कौड़ी से जब चाहो, टमाटर आलू धान या कपड़े मिल जाएंगे। और कहावत भी बनी- दो कौड़ी का आदमी।
समय के साथ चांदी या सोने जैसी रेयर मेटल, वस्तुओं और सेवाओं के आदान प्रदान के बीच एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल की जाने लगी। पैसे का आविष्कार हो चुका था। शेप में आना बाकी था।
इसमे समस्या खड़ी हुई। अब कोई एक कौड़ी के बदले पांच टमाटर दे, कोई आठ। अजी, ऐसा कैसा चलेगा। तो अब तक जो निर्धारण, लेने-देने वाले की आपसी सन्तुष्टि पर था, उसमे गांव का दबंग आ गया।
_दबंग ने बाजार में गुंडे लगाकर तय किया कि कितने कौड़ी के कितने टमाटर मिलेंगे। और जितने भी टमाटर मिले, उसमे से एक दबंग तक पहुंचाया जाए। इसी सौदे में दूसरी ओर जिसे कौड़ियां मिले, वह भी एक कौड़ी दबंग तक पहुंचाए।_
बन्दर की लड़ाई में बिल्ली का फायदा कहिये। कोई कहीं भी, किसी कुछ भी लेनदेन करे, दबंग जी को रंगदारी मिले। कोई सामान गांव में आये, या जाए तो रंगदारी मिले।
_रंगदारी दिया इसलिए जाना जरूरी है, कि गांव की सुरक्षा करनी है, गांव की रोड बिजली पानी हस्पताल ठीक करने हैं। इस रंगदारी को इज्जतदार भाषा मे टैक्स कहते है।_
जिसे हर ग्रामभक्त को ईमानदारी से ठाकुर की हवेली तक पहुंचा देना चाहिए। अलग बात की ठाकुर साहब या जलीले इलाही, हवाई जहाज खरीद कर फॉरेन ट्रिप पर निकल जाते है। हस्पताल की दीवारों में सब्जा उगता है, और सड़के .. वो छुप छुपकर चीन बना ही देता है।
_व्यापारियों की अपनी समस्या थी। खूब माल बेचते खरीदते, तो बोरे भर कौड़ियां या सोना चांदी कहाँ लेकर घूमते। किडनैपिंग हो जायेगी। उन्होंने मिट्टी की सीलमुहरों का इस्तेमाल किया।_
एक सीलमुहर याने एक बोरा कौड़ी.. जो धारक को भविष्य में मांगे जाने पर प्रस्तुत कर दी जाएगी। इसे हुंडी या रुक्का भी कह कहते है या चेक,डीडी, धनादेश .
_इधर दबंगो का अपना अपना कंपटीशन होता था। छोटा दबंग, बड़ा दबंग, उससे बड़ा दबंग, सबसे बड़ा दबंग। इलाके का साइज बढ़ाना, सबसे बड़ा दबंग बनना सबकी तमन्ना होती थी।_
वो भाषणी दबंगो का युग नही था, एक सम्राज्य बनाने में जान का जोखम था। इत्ते जोखम से राज बनाया तो अब ठाकुर का प्रचार कैसे हो? आखिर कैसे दुनिया जाने की साहब बहादुर ने इधर का चार्ज सम्भाल लिया है। तब न सबसे तेज चैनल थे, न सोशल मीडिया, सब जगह एक साथ आठ भी नही बजता था। तो बस एक ही मीडिया हो सकता था – पैसा, जो हर हाथ तक पहुंचता था।
जो चांदी, सोना या धातु लेन देन में चलती, उस धातु की मात्रा निर्धारित की। उसपर राजाजी का चेहरा, या खानदानी चिन्ह उकेरा जाता। राजा अपनी जो छवि प्रसारित करना चाहता- याने वीणा बजाता राजा, दुश्मन को मारता राजा, या फिर सिम्पल अपना थोबड़ा याने कैमरे की ओर देखता राजा।
पहले सिक्के पंच मार्क सिक्के थे। याने गर्म धातु पर हथौड़ा मारा जाता। हथौड़े में जो आकृति होती, उसका उल्टा धातु पर छप जाता। यह सिक्के अनगढ़ होते।
धीरे धीरे सिक्के ढाले जाने लगे। याने धातु को पूर्णतया गलाकर उसे डाई में डालकर ठंडा होने देना। पैसा अपने स्वरूप में आ गया था। राजा का सिक्का चलने लगा।
राजा जैसा होता, सिक्का वैसा ही चलता। सिक्के की कीमत के साथ राजा की इज्ज़त भी गिरती। हालांकि 2014 के बाद यह सिस्टम उल्टा हो गया। अब गिरता रुपया चढ़ती इज्जत की निशानी है। सुना ही होगा कि जब भिश्ती राजा बना, तो चमड़े के सिक्के चलवा दिये।
तो इन सिक्कों के साथ मानव सभ्यता के सैंकड़ो बरस इसी तरह गुजरे। उन्नीसवी सदी की शुरआत के साथ कागजी नोट प्रचलित हुए। नोट हुआ, तभी नोटबन्दी हुई। वरना सिक्के कभी बन्द नही हुए। बेसिक जरूरतें वही है, रोटी कपड़ा मकान और इंटरटेनमेंट।
आज कल ये सब कुछ डेटा में समाहित कर दिया गया है। डेटा खाओ, डेटा पहनो, डेटा से बनी वाल में रहो, डेटा की दीवारों को रंगों।
डेटा ही सब देता है। तो जो डेटा देता है, वही खुदा है। जियो, और जियो को जीने दो। इस डेटा ने खुदा को भी बदल दिया है। पैसे को बदल दिया है। सिक्के से नोट की धीमी यात्रा के बाद, नोट फटाफट प्लास्टिक के कोडेड चौखटों में बदल गए।
वह भी जाता दिखता है, अब तो सिर्फ एक ओटीपी ही रह गया है। ओटीपी ख़ुदा तो नही, मगर खुदा की कसम ..!
ताजा हालात ये कि पैसा गायब हो गया है। वह डेटा मास्टर्स के रहमोकरम पर है।
पैसे के इस नए रूप को छू नही सकते, देख नही सकते खुदा की तरह, मगर उंसके लिए गुनगुना सकते हैं :
पैसा, ये पैसा, है कैसा .. नही कोई ऐसा,
जैसा ये पैसा, के हो मुसीबत, न हो मुसीबत
सात आठ नो दस, ला ला ला ला …!
🎭चेतना विकास मिशन





