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प्रेम के दरिये को सूखने से बचाना है

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-आशीष तेलंग

इस घटना का लिव इन और धर्म विशेष से क्या लेना देना है? 

मुख्य मुद्दे से हट कर चर्चा को बस लिव इन और धर्म पर समेटा जा रहा है जबकि वैवाहिक संबंधों में भी और लगभग हर धर्मों में ऐसी सैकड़ों घटनाएं हो चुकी हैं। 

एक घटना हुई और हमने लिव इन या पारंपरिक विवाह के प्रश्न पर बहस शुरू कर दी जबकि गहरे में देखें तो इस तरह की घटनाओं का बीज संबंध यानि रिलेशनशिप में छुपा होता है। 

प्रश्न यहां संबंध यानि रिलेशनशिप का है जो आज के दौर में इंसान की ज़िंदगी को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा पहलू है। और इसको कायम रखने के लिए भले ही रुपये पैसे या अन्य भौतिक चीजों की ज़रूरत पड़े पर जीवंतता इसको प्रेम ही प्रदान करता है। 

प्रेम ही हर संबंध का सेतु होता है, यदि वो नहीं तो फिर वो संबंध नहीं बस बंधन रह जाता है। प्रेम और अपनापन ही उस बंध में सम् जोड़ कर उसको परिपूर्ण करता है। 

सो खेल तो पूरा प्रेम का है, इंसानी जज़्बात का है, इंसानियत का है। कोई सिस्टम अपना लो, विवाह या लिव इन, उसकी सांसे और धड़कन तो प्रेम पर ही चलेंगीं। 

लेकिन जब प्रेम का दरिया सूख जाता है तो शेष रह जाती है वासना। इस वासना से फिर रिलेशनशिप को चलाए जाने का जो खेल शुरू होता है वो अंततः इस अनहोनी पर आ के ही ख़त्म होता है। 

प्रेम और वासना में क्या फ़र्क है? 

मान लीजिए आप एक बगीचे में हैं और डाली पर एक सुंदर फूल खिला है। अब यदि आप उसके प्रेम में डूबते हो तो उसे तोड़ोगे नहीं, बस निहारोगे, खुशबू लोगे, खो जाओगे उसमें कहीं। उसको डाली पर ही बने रहने दोगे। ये प्रेम है। 

लेकिन यदि चाहत में आपने उसको तोड़ लिया तो फिर वो वासना हो गई, प्रेम नहीं रहा। अब वो पाने की हसरत हो गई। कि पा लूँ, कब्ज़ा लूँ, अपना बना लूँ। ये प्रेम नहीं है, वासना है और ये वासना ही संबंधों के लिए ज़हर बन जाती है। और जिसने फूल तोड़ लिया फिर वो पंखुड़ियां भी एक एक करके तोड़ता जाता है। वासना ठहरती नहीं है। 

इसी संदर्भ में एक बड़ा ही सुंदर प्रसंग है विष्णु खांडेकर के महान एवं कालजयी उपन्यास ययाति में। उसका मुख्य पात्र भले ही ययाति हो पर उसका सबसे सशक्त किरदार कच है। इतना मोहक किरदार मिलना दुर्लभ है। 

ययाति की पत्नी देवयानी कच से प्रेम करती है। कच एक सन्यासी है और अपने आश्रम में रहता है। उसी आश्रम में एक बालिका भी रहती है जिसपर कच को बड़ा स्नेह रहता है। 

एक बार वो बच्ची कच के पास आती है और कहती है कि बाहर चलिए, मुझे आपको एक उपहार देना है। वो कच को एक बगीचे में ले जाती है जहां एक सुंदर फूल खिला हुआ है। 

वो जैसे ही उस फूल तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाती है, कच उसको रोक लेता है और कहता है कि बेटी तुम्हारा उपहार मुझे प्राप्त हो गया, इस फूल को अब डाली पर ही रहने दो। 

ये है प्रेम और इसी प्रेम के दरिये को सूखने से बचाना है, तभी संबंध बचेंगे, संसार बचेगा। 

-आशीष तेलंग

Ramswaroop Mantri

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