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*पारंपरिक हस्तकौशल : बिला गया बेना बीनना*

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      ~ पुष्पा गुप्ता

बेना बीनना बंद हो गया। विकास नहीं आया था , तो बिजली कहाँ से आती?   लेकिन गर्मी को तो आना ही होता था. फागुन में गर्मी उँगली पकड़े और चैत बैसाख तक पहुँचा पकड़ ले. जेठ और आषाढ़ का शुरुआती हिस्सा जिसे गाँव में जेठ-असढा कहते हैं, पंडित मातादीन का पंचांग “मृग शिरा“ बताता वो तो ग़ज़ब हो जाता।

     असल गरमी यहीं , इसी नक्षत्र में दिखायी पड़ती। मनई कुकुर माफ़िक़ हाँफता लेकिन उस गर्मी से बचने के लिये उसके पास , उसके अपने उपाय होते। रहन – सहन , वास्तु शिल्प , प्रकृति की बुनावट , और हर घर का विकेंद्रित राजसी ठाटबाट। 

चलिये माज़ी में चला जाय और देखा जाय “ बग़ैर विकास “ के देश कैसा था ? जब हम इस पड़ताल को सामने रखते हैं तो हमारे  कई प्रगतिशील (?) हम पर आरोप लगाने लगते हैं  , एक – यथास्थितवादी सोच का प्रचारक है , दो – सभ्यताएँ जब लंबी दूरी तय कर लेती हैं  तो उनकी यात्रा के पहिये को , पीछे नहीं मोड़ा जा सकता , वह अपनी गति से गतिशील रहेगा ही।

      मुख़्तसर में – हम “यथास्थितवाद “ का एकांगी स्वरूप उठा लेते हैं उसको सम्पूर्णता में नहीं देखते। छोटा सा उदाहरण दे दूँ – अतीत में हम अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी को सहज , सरल और स्वनिर्मित उत्पादों से सँवार कर एक खुशहाल ज़िंदगी जीते थे.

    उस सुविधा को अतीत का  यथास्थित वाद कह कर नकारना अतार्किक लगता है , वह भी महज़ इसलिये कि वह अतीत से जुड़ा है। 

    उदाहरण के लिये अतीत में हम आज़ाद थे , वर्तमान में आज़ाद नहीं रहेंगे।

 इसे हम प्रगति से जोड़ने लगे हैं , और दिक़्क़त तो तब और बढ़ जाती है जब हम ग़ुलामी को आजादी और आजादी को अतीत में डाल कर , प्रकान्तर से यथास्थितवाद के गड्ढे में ढकेल देते हैं।

 एक सटीक उदाहरण सुनिये :

      तुलसी दास की कही हुई एक युक्ति आज भी गाहे ब गाहे सुना दी जाती है , जिसे प्रबुद्धवर्ग (?) निराशा की स्थिति बता देता है। युक्ति है :

       “कोउ नृप होंय , हमे का हानी। 

          चेरी छोड़ होबे ना रानी.“ 

        ( हुकूमत किसी की हो जाय , हमे क्या नुक़सान है,  नौकरानी की जगह , रानी  तो हो नहीं सकते)

हमारी दिक़्क़त , हमारे सोच की दिशा का तंग होना। विशेष कर साहित्य में यह घपला खूब चला है। लोग तुलसी का या किसी भी लेखक के लिखे का आकलन करते समय , अपने सीमित औज़ारों से कसने के आदि हो गये हैं।

       हम लिखे की शब्दावली को ही झांक कर अपना मन्तव्य दे देते हैं, जब कि तुलसीदास को समझाने के लिये , उस काल खंड को समझना होगा , जब यह लिखा गया , किस भूभाग पर और किस  परिस्थिति में लिखा गया , यह समझाना ज़रूरी है।

     तुलसीदास सामंत काल में जी रहे हैं , सामंत सीमित है लेकिन शासित एक निश्चित  भूभाग  है। “सामंत होते रहें ,  हमे क्या हानि  है ? “यह जो “हानि“ का न होने का एलान है , यही इतिहास बोध का दरवाज़ा खोलता है। इसे एक सूत्र में कहा जाय तो – 

    भारत राजशाही तंत्र में एक आज़ाद समाज था और जब आजाद हुए तो ग़ुलामी में बह गया।

इसे आसानी से समझा जा सकता है :

     अंग्रेज़ी साम्राज्य की ग़ुलामी के पहले तक हम राजशाही जी रहे समाज थे। लेकिन हम ग़ुलाम नहीं थे। 

     ग़ुलामी मतलब ग़ुलामी ही होता है यानी हम कुछ सीमित बाध्यताओं को छोड़ दें तो यह समाज अपने आपमें आज़ाद रहा। इसकी जीवन पद्धति , इसकी जीवन दात्री सुविधाएँ और किसी भी तरह के हस्तक्षेप से बरी था। खेती जीवन का आधार तब भी था लेकिन वह किसी का भी ग़ुलाम नहीं था।

      खेती के उपकरण गाँव ही तैयार करता था ,  हल , कुदाल , खुरपी , फावड़ा , गन्ना पेरने का कोल्हू , । खेत के लिये खाद , अपना बीज , सूत कातने के लिये चरखा , कपड़ा बुनने का हाथ करघा , गर्ज यह कि हम अपनी आवश्यक आवश्यकताओं  की पूर्ति के लिये किसी के भी  मुहताज नहीं रहे।

     यहाँ तक कि शासन व्यवस्था भी अपने समाज की ही रही , अपराध की सजा समाज ही तय करता था। राजशाही की अपनी शासन व्यवस्था वि न्याय प्रणाली थी लेकिन उसने समाज की न्याय प्रणाली ( पंचायत ) में कभी भी दख़लअंदाज़ी नहीं की । मुग़ल काल तक का इतिहास बोध हमारे स्वावलंबन और ख़ुदमुख़्तारी समाज होने की गवाही देता है। इसके अवशेष आज भी पूर्वोत्तर के राज्यों को समझ कर देखा जा सकता है।

अपना कपड़ा ,  अपना अन्न (शुद्ध , बग़ैर रसायनिक खाद के) सब उनके अपने हैं। भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा जब अपने जीवन को सरल बनाने की चकाचौंध में दूसरे पर आश्रित हो चुका है तब एक छोटी आबादी जिसे  हम आदिवासी कहते हैं वे आज भी आत्म निर्भर है। 

   – गर्मी जान मारत बा रे ! बिजलिया न आयी का? 

    (जब बिजली नहीं थी , तब गर्मी नहीं आती थी ?) 

   – लेकिन तब हम ग़ुलाम नहीं थे , न मशीन के , न तकनीक के। हम ही उत्पादक थे , हम ही उपभोक्ता थे , क्यों कि हमारे पास हुनर था। आज हम हुनर की हत्या कर के ग़ुलामी ओढ़े पड़े समाज हैं। 

    बेने को ही लीजिये.

यह बेना है.  हर घर में  बनता था. अब यह संग्रहालय की अमूल्य वस्तु है। (चेतना विकास मिशन).

Ramswaroop Mantri

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