शशिकांत गुप्ते
आज बहुत दिनों बाद सीतारामजी से मिलना हुआ।
मैने पूछा आप कहाँ थे इतने दिनों से?
सीतारामजी ने कहा इनदिनों एक अजब बीमारी चल रही है।
मैने पूछा कौनसी?
सीतारामजी ने कहा आहत होने की बीमारी।
मैने कहा आहत का शाब्दिक अर्थ होता है घयाल या ज़ख्मी।
सीतारामजी ने कहा धार्मिक आस्थावान लोगों को जरा जरा सी बातों में आहत होने की मानसिक बीमारी हो जाती है।
यह बीमारी संक्रमक होती है।
मैने पूछा आप तो व्यंग्यकार हो, आप को यह बीमारी कैसे हो गई?
सीतारामजी मै व्यंग्यकार हूँ। इसलिए मुझे यह बीमारी अलग तरीके से लग गई।
मैने पूछा कैसे?
सीतारामजी ने कहा जब भी मै महंगाई को गगन चूमने के लिए प्रयासरत देखता हूँ आहत हो जाता हूँ।
मेरे आहत होने का सबसे बड़ा कारण यह होता है कि, कागज़ों पर और विज्ञापनों में जब मंहगाई गायब हो जाती है?
जब भी मै बेरोजगारों की लंबी कतारें देखता हूँ आहत हो जाता हूँ। जब भी किसी अबला के साथ सामूहिक दुराचार की खबर पढ़ता हूँ तो पहले तो मैं दुःखी होता हूँ। लेकिन जब यह खबर पढ़ता हूँ कि, दुराचार करने वालें कानून पहुँच से दूर इसलिए हैं कि, उनपर किसी के वरदहस्त रूपी प्रश्रय की अनुकम्पा है।
तब मैं बुरी तरह आहत हो जाता हूँ।
जब मुझे कोई बुलडोजर दिखाई देता है,तब मैं किसी के आशियाने के जमीदोंज होने की आशंका से आहत हो जाता हूँ। बुलडोजर के द्वारा सज़ा देने कोई भी प्रावधान सविधान में नहीं यह जानने के बाद ज्यादा ही आहत हो जाता हूँ।
जब भी मै संस्कार और संस्कृति की दुहाई देने वालों के शासन में प्रत्येक सौ मीटर पर मंदिरा की दुकानों के बगल में मदिरा के सेवन के लिए आहातें देखता हूँ, तो मैं आहत हो जाता हूँ।
यह मेरा आहत होना मेरे अंदर मानवीयता होने का प्रमाण है।
जो मानव होता है, उसमें संवेदनाएं जागृत होती है।
ऐसे लोग अमानवीय घटनाएं देखकर आहत होतें हैं।
फैशनेबल आहत होना मानसिक बीमारी हो सकती है।
इस तरह मेरे अंदर की संवेदनशीलता मुझे अन्याय और अत्याचार देखकर आहत कर देती है। लंबी फेरहिस्त को यहीँ पूर्ण विराम?
शशिकांत गुप्ते इंदौर





