डॉ.जी.जी.पारिख (1923 – 2025) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, समाजवादी धारा और लोकतांत्रिक मूल्यों के ऐसे पुरोधा रहे जिन्होंने अपने पूरे जीवन को देश, समाज और जन आंदोलनों के लिए समर्पित किया। भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर आपातकाल और उसके बाद के दशकों तक उन्होंने न केवल सक्रिय भागीदारी की बल्कि समाजवादी विचारधारा को जीवंत बनाए रखा। वे भारतीय राजनीति, समाज और जनांदोलनों में एक ऐसे “जीवित इतिहास” थे, जिनकी स्मृतियों में गांधी, लोहिया, जयप्रकाश, युसूफ मेहर अली जैसे महानायकों का प्रत्यक्ष साथ रहा।

भारत छोड़ो आंदोलन और प्रारंभिक संघर्ष
1942 के “भारत छोड़ो आंदोलन” में 17 वर्ष की आयु में डॉ. पारिख सक्रिय हुए। उस समय गांधीजी मंच पर थे और जीजी पारिख मंच के नीचे स्वयंसेवक के रूप में। आंदोलन की वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इसी संघर्ष ने उन्हें जीवन भर के लिए लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समाजवाद की राह पर अग्रसर किया।
वे समाजवादी आंदोलन के अग्रणी नेताओं — आचार्य नरेंद्र देव, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण — से जुड़े और युसूफ मेहर अली जैसे नायकों से सीधी प्रेरणा ली।

समाजवादी धारा के स्तंभ
1948 के बाद जब अधिकतर स्वतंत्रता सेनानी सत्ता की राजनीति में उतर गए, डॉ. पारिख ने कांग्रेस सोशलिस्टों के साथ मिलकर समाजवादी आंदोलन को जनसाधारण तक पहुँचाने का काम किया। उन्होंने “सोशलिस्ट पार्टी” और बाद के वर्षों में विभिन्न समाजवादी दलों के साथ मिलकर वैचारिक व संगठनात्मक कार्य जारी रखा।
वे हमेशा संसदवाद से दूर रहे, लेकिन लोकतंत्र और समाजवादी आदर्शों के प्रति पूर्णतः समर्पित। यही कारण है कि वे विचार और रचनात्मक कार्यों को ही अपनी असली राजनीति मानते थे।

आपातकाल का प्रतिरोध
1975-77 के दौरान जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया, डॉ. पारिख बंबई सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष थे। उन्हें जॉर्ज फर्नांडिस और अन्य प्रमुख नेताओं के साथ जेल में डाल दिया गया। उनकी पत्नी मंगला पारिख और बेटी सोनल ने भी सत्याग्रह में गिरफ्तारी दी। यह देश का दुर्लभ उदाहरण है, जब एक ही परिवार के तीनों सदस्य — पिता, माता और पुत्री — आपातकाल विरोधी आंदोलन में जेल गए।

समाजवाद की यात्रा और जनआंदोलन
डॉ. पारिख ने कभी भी दल-बदल और सत्ता की राजनीति को प्राथमिकता नहीं दी। वे हमेशा समाजवाद के दो पहियों — विचार और रचना — पर टिके रहे।
उन्होंने युसूफ मेहर अली सेंटर, “जनता” साप्ताहिक, राष्ट्र सेवा दल और विभिन्न जन-आंदोलनों के माध्यम से लगातार रचनात्मक कार्य किए।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण रहा कि सत्ता से दूर रहकर भी समाजवादी आदर्शों की मशाल को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया जा सकता है।
गांधी और आंबेडकर से संवाद
जीजी पारिख का जीवन गांधी और आंबेडकर दोनों की विरासत से गहराई से जुड़ा रहा।
गांधीजी को उन्होंने बाल्यकाल में प्रत्यक्ष देखा था और उनके अनासक्तयोग को अपने जीवन का मार्गदर्शक माना।
आंबेडकर की समता और न्याय की धारणा को भी उन्होंने अपने समाजवाद में आत्मसात किया।
यही कारण है कि वे दोनों ध्रुवों को जोड़ते हुए समतामूलक समाजवाद की मिसाल बन गए।
अंतिम काल तक सक्रिय
101 वर्ष की आयु तक डॉ. पारिख सक्रिय रहे।
उनका व्यक्तित्व सिर्फ अतीत की स्मृतियों का नहीं बल्कि भविष्य की प्रेरणा का स्रोत भी था।
डॉ. जी. जी. पारिख का जीवन भारतीय लोकतंत्र और समाजवाद की अमूल्य धरोहर है।
उनकी यात्रा हमें यह सिखाती है कि —
सच्चा राष्ट्रनिर्माण त्याग और संघर्ष से होता है।
सत्ता से दूर रहकर भी विचार और रचना के माध्यम से इतिहास गढ़ा जा सकता है।
गांधी और आंबेडकर के सूत्रों को जोड़कर समाजवाद को नए सिरे से गढ़ा जा सकता है।
हम उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
वे सचमुच भारतीय समाजवादी धारा के शताब्दी नायक थे और रहेंगे।
जी जी ने देहदान किया था। अंतिम दर्शन के बाद पार्थिव शरीर अस्पताल को सौंपा जाएगा।





