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श्रद्धांजलि:अलविदा संजीव…भारी पड़ती हैं समझदार लोगों की नादानियां 

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अमित मंडलोई

मुझे सच में श्रद्धांजलियां लिखना पसंद नहीं। किसी के जाने के बाद उसे याद करना लकीर पीटने जैसा लगता है। और खासकर ऐसे लोगों के बारे में जिन्हें अपने सामने कतरा-कतरा, टुकड़ा-टुकड़ा कम होते, बिखरते देखता हूं। जानता हूं बगीचे का हर फूल हमेशा खिला नहीं रहता और यह भी जानता हूं कि कोई लाख चाहकर भी किसी को नहीं बचा पाता। फिर भी न जाने क्यूं हर बार ऐसे किसी शख्स का जाना अपराध बोध से भर देता है। जब लगता है कि कुछ बचाया भले नहीं जा सकता था तो क्या हुआ, कुछ संभाला तो जा ही सकता था। पर पता नहीं कुछ चीजें संभाली भी नहीं जा पाती शायद, इसलिए वे सीने पर उम्रभर का बोझ बनकर रह जाती हैं। 

दोस्त संजीव का जाना कुछ ऐसा ही बोझ बन गया है। हम सारे दोस्त लंबे समय से उसे देख रहे थे पल-पल घटते हुए। जब वह मिला तो एकदम स्मार्ट कांधों तक झुलते बाल, छरहरा शरीर और एकदम सहज-सरल व्यवहार। सिर्फ आपका नहीं हर किसी का उतना ही अपना। किसी से बैर नहीं, पता नहीं क्या खूबी थी कि जिसका भी हुआ एक-दो मुलाकात में ही अंतरंग साथी हो जाता था। अखबार की सामान्य नौकरी में भी रहन-सहन रईसों वाला। कोई 15-17 साल पहले उसने साढ़े तीन हजार की ब्रांडेड सैंडल खरीदी तो मैंने मजाक में कहा, भाई वैसे तो यह संभव नहीं मगर फिर यदि में मैं कभी खरीद लूं न इतनी महंगी सैंडल तो फिर पैर में तो न पहन पाऊं। वह देर तक हंसता रहा। उसकी यही हंसी बिल्कुल मोम कर देती थी। उस पर कभी गुस्सा हो ही नहीं पाते। 

भास्कर इंदौर में वह ज्यादा दिन टिका नहीं, लेकिन हमारी दोस्ती यहां से जाने के बाद भी उतनी ही गाढ़ी रही। वह हिंदुस्तान दिल्ली पहुंचा और वहां फीचर पेज देखने लगा। कभी पेज भेजता, काम साझा करता तो सीना चौड़ा हो जाता कि कितना अच्छा काम कर रहा है। वैसे बहुत मेहनती फितरत रही नहीं कभी उसकी। मन का मालिक था। अपने ही तौर-तरीके, अपने तर्क। उसका ईमेल एड्रेस एंड संजीव देखकर मैंने पूछ लिया, ये क्या एड्रेस हुआ भला। एंड डॉट संजीव तो कहने लगा, अब मुझे क्या पता उस वक्त मन में क्या रहा होगा और क्या सोच कर इसे बनाया होगा। मैं कभी अपना कोई काम भेजता तो अच्छे काम की तारीफ भले नहीं करता, लेकिन जरा गड़बड़ होती तो तुरंत जवाब आ जाता। मैं तुमसे ऐसी अपेक्षा नहीं करता। बहुत ही सामान्य सा लिखा है तुमने, एकदम सतही सा। तारीफ सुनने की इच्छा का गला घोंटकर दोबारा खुद को पढ़ता तो समझ आ जाता कि कहां चूक हुई है। 

बंगाली कॉलोनी वाले घर में साथ खाना खाते हुए जब रश्मि ने कहा कि संजीव हमारे घर बहुत आता था। पापा के साथ इसकी लंबी बातें होती, कुछ काम भी करते रहते थे। तब हम आपस में मजाक भी बनाते थे। तब अंदाजा ही नहीं था कि मेरी शादी संजीव से ही हो जाएगी। तब लगा कैसे इत्तेफाकों पर पैर रखकर ये आदमी बढ़ता जा रहा है। एक बार फिर वह लौटकर भास्कर आया। इस बार एनएनआर में रहा, लेकिन इस बार भी ज्यादा देर नहीं रह पाया। उसकी असहमतियां कभी अप्रकट नहीं होती थी। वह अपने मसलों पर हमेशा खुलकर ही बात करता था, इसलिए बहुत जगह निभा पाना आसान नहीं था। यही वजह है कि एजुकेशन, थियेटर, इंटीरियर और पढ़न-पाठन के जमानेभर के काम के बीच भी वह इन सबसे कहीं अलग नजर आता था। 

हम उसके आसमान से ऊंचे किसी नए ही शिखर पर पहुंचने का सपना देखते थे। लगता था कि ये पता नहीं कहां जाकर रुकेगा। पर क्या पता था कि उसके हौसले भले नहीं रुकें लेकिन शरीर के भीतर लगातार कुछ रुक रहा है, उसे रोकने लगा है। इसका पहला अहसास मुझे दिल्ली में हुआ। किसी काम से वहां पहुंचा तो इसे फोन किया। बोला यार मैं दिन में मंडी हाउस जाऊंगा थियेटर देखने, वहीं क्यों नहीं आ जाता। कोई फेस्टिवल चल रहा था वहां। मिला तो लगा कि बहुत दुबला हो गया है, लेकिन चेहरे पर वही नूर था। खाने-पीने में कुछ ना-नकुर करते दिखा तो मैंने पूछा क्या हुआ है। कहने लगा यार हार्ट में प्राब्लम हुई है। मैं चौंक गया, लेकिन क्या कहता उसे। उसी दिन फांस सी चूभ गई।

फिर जब मैं नोएडा में किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था तो एक रात को संदीप राऊजी के साथ आ धमका। इतनी रात को भूतों की तरह दोस्तों से मिलने सिर्फ वहीं आ सकता था। वह रात बड़ी गुलजार रही। हम देर रात तक बतियाते रहे। मजिठिया के लिए चल रहे साथियों के संघर्ष से लेकर और भी जमाने भर की बातें होती रहीं। 

आखिरी मुलाकात हुई गाजियाबाद में उसके घर पर। किसी काम से दिल्ली गया था और वह काम सुबह 11 बजे तक ही निपट गया तो सीधे उसके पास पहुंच गया। हालत देखकर चौंक गया। बायपास हो चुकी थी, किडनी में भी कुछ परेशानी थी, लेकिन नेतागिरी पूरी जारी थी। कुछ नवयुवक उसके आसपास जमे हुए थे। कुछ योजनाएं भी कानों में पड़ी। यहां सभा-वहां बैठक। लौटते हुए उससे कहा भी कि तबीयत का ध्यान रखो यार। उसने फिर हंसकर टाल दिया। इस बीच कुछ मैसेज, कुछ फोन हुए पर बहुत कम हुए।

कल अचानक संदीप का भोपाल से फोन आया कि यार मामला गड़बड़ है। पिछली बार भी गया था तो वह डायलिसिस के लिए आया था। पूजा तो देख भी नहीं पाई उसे इतनी हालत खराब थी। अब तो बता रहे हैं कार्डिएक अटैक के बाद ब्रेन हैमरेज भी हो गया है। हालांकि शाम को बात कि तो पता चला डॉक्टर कुछ इंतजार का कह रहे हैं, क्योंकि पिछले महीने भी वह ऐसे ही वेंटिलेटर पर आने के बाद फिर रिकवर कर गया था। रात को रश्मि से बात हुई तो इतना ही सुन पाया कि वेंटिलेटर पर है और कुछ बाकी नहीं है। 

फिर आज सुबह साढ़े सात बजे संदीप का मैसेज… जो मैंने जानबूझकर दोपहर में देखा, मानो मैसेज नहीं पढ़कर में कुछ टालने की कोशिश कर रहा था। जबकि मुझे पता था कि मैं कुछ टाल नहीं पाऊंगा। टाल पाता तो कभी का टाल दिया होता है। अब कुछ बाकी नहीं है सिर्फ बाकी है तो ढेर सारे काश… काश… काश और काश। अलविदा संजीव, कभी नहीं सोचा था यार कि इस तरह तुझसे जुदा होंगे। 

तस्वीरें उसी आखिरी मुलाकात की, जिसमें आमतौर पर फोटो लेने से बचने वाला मैं पलट-पलट कर उसकी तस्वीरें खींच रहा था।

Ramswaroop Mantri

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