शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी आज माजक के मूड हैं। सन 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म मदर इंडिया का गीतकार शकील बदायुनी रचित गीत गुनगुना रहें हैं।
दुःख भरे दिन बीते रे भैया
अब सुख आयों रे
रंग जीनव में नया लायों रे
मैने पूछा आज आपको क्या हो गया है?
सीतारामजी ने कहा आप तो जानतें हैं। मै व्यंग्यकार हूँ। कभी कभी स्वप्नलोक में भी विचरण करना चाहिए।
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को “ग़ालिब” यह ख्याल अच्छा है
मैने कहा हाँ सही कहा आपने इनदिनों वर्तमान व्यवस्था द्वारा स्वप्न ही तो दिखाए जा रहें हैं।
सीतारामजी ने कहा स्वप्न दिखाने वाले जानते हैं कि, स्वप्न वे लोग ही देखतें हैं,जो हमेशा चिंता ग्रस्त होतें हैं और चैन से सोते नहीं है। मतलब अर्ध निद्रा में ही रहतें हैं।
सीतारामजी ने कहा यथार्थ में झाँकने पर किसी अज्ञात शायर का ये शेर याद आता है।
अमीर-ए-शहर के ताक़ों में जलने वाले चराग़
उजाले कितने घरों के समेट लाते हैं
संभ्रांत कहलाने वाले लोगों के लिए पौष्टिक आहार और पौष्टिक आहार ग्रहण करने के लिए सलाहकारों के विज्ञापनों देख, सुन और पढ़कर आश्चर्य होता है।कारण दूसरी ओर कुपोषण से पीडित और परलोक सिधारने वाले नोनिहलों की सरकारी और गैर सरकारी संख्या का अंतर गम्भीर प्रश्न उपस्थित करता है?
दूसरी ओर पोषण आहार रिक्त भंडार गृह से कागजों पर ही भारी वाहनों में लादा जाता है और
गंतव्य स्थानों पर भेजा जाता है।
मतलब पौषण आहार ही घोटाले के चक्कर मे फ़स गया है?
इस घटना पर शायर महताब राय ताँबाजी का इस शेर का स्मरण होता है।
दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से
इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से
इसीलिए वैचारिक चिराग़ निरंतर जलतें रहना चाहिए। कारण दिन और रात की समयावधि निश्चित है।
जागरूक लोगों का फर्ज है,चिरागों को बुझने न देना।
चिरागों की एहमियत पर शायर वसीम बरेलवीजी फरमातें हैं।
रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है
वैचारिक क्रांति में सक्रिय कभी भी निराश नहीं होतें हैं।
वैचारिक क्रांति में सलग्न लोग हमेशा अपना हौसला बुलंद रखतें हैं।
मल्लाहों के भरोसे नदियां पार मत करों। मल्लाह के भरोसे नब्बे धन छह महीने बीता दिए।
आमजन की स्थिति इन पंक्तियों में इंगित भावों जैसे हो गई है।
दिखला के किनारा हमें मल्लाह ने लूटा
कश्ती भी गई,हाथ से पतवार ही छूटा
इस मुद्दे पर शायर राहत इंदौरीजी का ये शेर याद आता है। इस शेर में वैचारिक क्रन्तिकारियों के लिए संदेश है।
तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो
इसीलिए हमेशा मानसिक रूप से यथार्थ में ही रहना चाहिए।
वो सुबह कभी तो आएगी
निश्चित आएगी।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





