शशिकांत गुप्ते इंदौर
सीतारामजी को आज प्रसिद्ध गीतकार स्व.गोपालदास नीरज रचित गीत की कुछ पंक्तियों का स्मरण हुआ।
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।
उक्त पंक्तियां दार्शनिक हैं।
क्या व्यवहारिक जीवन में उक्त पंक्तियों में मानव में मानवीयता जागृत करने के लिए जो संदेश हैं,उन पर अमल हो सकता है?
भौतिकवाद में लिप्त जीवन यापन करने वालों के लिए तो संत तुलसीदास रचित निम्न चौपाई ही सटीक है।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे ,जे आचरहिं ते नर न घनेरे
इस चौपाई का अर्थ समझने पर नीरज रचित गीत की पंक्तियां यूं लिखी जा सकती है।
सदन में कोई ऐसा बिल सर्व सम्मति से पारित किया जाए
झूठे वादें करने वालों पर कोई सख्त कानून बनाया जाए
या इसे इस तरह भी लिखा जा सकता है।
जो वादें किए जाएं उन्हे पूर्ण करने की समयावधि निश्चित की जाए
मैने सीतारामजी से पूछा आज उक्त व्यंग्यात्मक विचार प्रकट करने का कोई विशेष कारण है?
सीतारामजी ने कहा इन दिनों धर्म का राजनीति से समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है?
जबकी सिद्धांत यह है कि,जहां धर्म और राजनीति में संघर्ष होता है वहां उन्नति होती है।
धर्म को ईमानदारी से समझने की कोशिश करें तो,महात्मा गांधी के विचारों को समझना जरूरी है।
गांधी जी के विचारों में अहिंसा का लक्ष्य सत्य है इसलिए सत्य को वे सत्याग्रह कहते थे, अपने श्रेष्ठ आदर्शों में से एक मानते थे. उनका कहना था कि, अहिंसा सत्य के लिए होती है और प्रेम से भरपूर होती है. बिना प्रेम के अहिंसा हो ही नहीं सकती. प्रेम अहिंसा की प्रेरक शक्ति के रूप में काम करती है।
सीतारामजी ने कहा गांधीजी के उक्त विचारों को उद्धृत करने का मुख्य कारण है,जो लोग धर्म की दुहाई देते हैं,वे गांधीजी की हत्या को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं?
क्या कोई भी धर्म हत्या जैसे क्रूर कृत्य का समर्थक हो सकता है?
यह भी शाश्वत सत्य है कि,विश्व के लगभग एक सौ बीस देशों ने गांधीजी पर डाक टिकिट प्रचलित हैं।
कारण अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी मजबूती का नाम है।
सीतारामजी ने कहा धर्म को लेकर युग निर्माण योजना का एक स्लोगन बहुत ही व्यवहारिक है।
कथनी करनी भिन्न जहां
धर्म नहीं पाखंड वहां
धर्म चार पुरुषार्थ में एक पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ का उपयोग अहिंसक होगा तो मानवीय संवेदनाएं में कभी भी द्वेष भाव पैदा नहीं होगा।
मानव में संवेदनाएं जागृत होगी तो वह निम्न पंक्तियों पर निश्चित ही अमल करेगा।
वैष्णव जन तो तेने रे कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे। ‘ (सच्चा वैष्णव वही है, जो दूसरों की पीड़ा को समझता हो।) ‘पर दु:खे उपकार करे तोये, मन अभिमान ना आणे रे1॥’ (दूसरे के दु:ख पर जब वह उपकार करे, तो अपने मन में कोई अभिमान ना आने दे।)
तात्पर्य समाज के लिए देश के लिए अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के बाद कोई भी व्यक्ति अपने द्वारा किए गए कर्तव्य को विज्ञापनों के माध्यम से उपकार की उपमा नहीं देगा।





