शशिकांत गुप्ते
पिछले दो दिनों से पूरे देश में जश्न का माहौल है। होना भी चाहिए।
पांच दशकों के बाद उपलब्धि जो मिली है।
उक्त उपलब्धि पर मुझे सन 1960 में प्रदर्शित फिल्म हम हिंदुस्तानी का गीत याद आया।
इस गीत को लिखा है गीतकार प्रेम धवन ने।
छोड़ो कल की बातें,कल की बात पुरानी
नए दौर में लिखेंगे,मिल कर नई कहानी
हम हिंदुस्तानी,हम हिंदुस्तानी
आज पुरानी ज़ंजीरों को तोड़ चुके हैं
क्या देखें उस मंज़िल को,जो छोड़ चुके हैं
“चांद के दर पर जा पहुंचा है आज ज़मान”
नए जगत से हम भी नाता जोड़ चुके हैं
गीतकार प्रेम धवन की कल्पना छः दशक के बाद साकार हुई।
उपर्युक्त सफलता का श्रेय किसको देना चाहिए?
गांधीजी के अनुयायी भूदान प्रणेता विनोबा भावेजी ने कहा है।
किसी कूप खनन के लिए निन्यानवे कुदाल चलाने वाला जब थोड़ा विश्राम करने के लिए रुकता,दूसरा कोई व्यक्ति सौ वी कुदाल चलता है,और कूप में पानी निकल आता है।
प्रशंसा सौ वी कुदाल चलाने वाले मिलता है।
यह बात विनोबा जी ने व्यंग्यात्मक रूप से कही है।
कुछ स्वार्थी तत्व हमेशा दूसरों के किए गए अथक श्रम को स्वयं ही भुनाने में लगे रहते हैं।
कोई कितनी भी चतुराई करे,सच्चाई कदापि छिप नहीं सकती है।
ऐसे स्वार्थी लोगों के लिए बतौर नसीहत सन 1970 में प्रदर्शित फिल्म गोपी के गीत की निम्न पंक्तियां सटीक है।
यह गीत लिखा गीतकार राजेंद्र कृष्णजी ने।
हे मूरख की प्रीत बुरी जुए की जीत बुरी
बुरे संग बैठ ते भागे ही भागे भागे ही भागे
हे काजल की कोठरी में कैसे ही जतन करो
काजल का दाग भाई लगे ही लागे
हे कितना जती को कोई कितना सती हो कोई
कामनी के संग काम जागे ही जागे,
ऐसे स्वार्थपूर्ति की मानसिकता जागृत होने का कारण कौवा चला हंस की चाल वाली कहावत में स्पष्ट रेखांकित होता है।
अंत में शायर इक़बाल अज़ीम का यह शेर मौजू है।
क़ातिल ने किस सफ़ाई से धोई है आस्तीं
उसको ख़बर नहीं कि लहू बोलता भी है
शशिकांत गुप्ते इंदौर





