मुनेश त्यागी
पिछले कुछ समय से कार्यपालिका और न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर तलवारें खिंची हुई है। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने लगभग 30 जजों की नियुक्ति के लिए अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार के पास भेजी हुई हैं, मगर सरकार ने इस पर डेढ़ साल तक कोई कार्यवाही नहीं की और इन सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया। जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया तो केंद्र सरकार ने इन न्यायाधीशों की नियुक्ति न करके कॉलेजियम की सिफारिशों को सर्वोच्च न्यायालय को वापस भेज दिया।
इस मामले को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका में आपस में तनातनी हो गई है। हकीकत यह है की सर्वोच्च न्यायालय, न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अपने सुझाव भेज रहा है मगर सरकार उन पर बिना कोई कार्यवाही किए हुए बैठी हुई है और जब इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सख्ती बरती तो केंद्र सरकार ने उनकी सिफारिशों को वापस भेज दिया।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार जनता को सस्ता और सुलभ न्याय करवाने के लिए उपलब्ध कराने के लिए हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय में एक पीआईएल डाली गई जिसमें कहा गया कि इस देश के सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में काम कर रहे जजों की संख्या को दोगुना कर दिया जाए, इससे जनता को सस्ता और सुलभ न्याय मिल पाएगा।
मगर सुप्रीम कोर्ट ने इस पीआईएल को खारिज कर दिया और कहा कि हमारे देश की हालत यह है कि यहां पर अदालतों में पहले से ही पैर रखने की जगह नहीं है। जजों की संख्या दोगुनी करने की बात तो छोड़ दीजिए, यहां पर एक भी अतिरिक्त जज नियुक्त नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय की इस बात में दम है क्योंकि सिविल रूल्स के मुताबिक अदालतों में एक दिन में 27 मुकदमें ही सुनवाई के लिए निश्चित किए जाने चाहिएं, मगर आज हालात इतने विकट हो गए हैं कि यहां पर अधिकांश अदालतों में दो सौ दो सौ मुकदमें एक दिन में सुनवाई के लिए नियत किए जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की इस दलील में काफी वजन है क्योंकि हम देख रहे हैं कि जिस अनुपात में न्यायालयों में मुकदमों की संख्या बढ़ी है, उस अनुपात में अदालतें मौजूद नहीं हैं, न्यायिक अधिकारी उपलब्ध नहीं हैं और ना ही कोर्ट क्लर्क और स्टेनो उपलब्ध हैं, जिस कारण न्याय देने में बहुत बड़ी समस्याएं पैदा खड़ी हो गई हैं।
आज हालात यह हैं कि सर्वोच्च न्यायालय में 70,000 मुकदमे पेंडिंग हैं, विभिन्न उच्च न्यायालयों में 60 लाख मुकदमें पेंडिंग हैं और जिला अदालतों में चार करोड़ 30 लाख मुकदमें पेंडिंग है। जजों की संख्या की स्थिति यह है कि जहां सुप्रीम कोर्ट में कुल 34 जज होने चाहिए वहां पर 7 वैकेंसी खाली हैं। विभिन्न उच्च न्यायालयों में जहां 1,108 न्यायिक पद हैं वहां पर 336 पद खाली हैं और निचली अदालतों में जहां 24,827 जज होने चाहिएं, वहां पर 6,604 पद खाली पड़े हैं। कुल मिलाकर हालत यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 20% उच्च न्यायालयों में लगभग 30% पद खाली पड़े हैं और निचली अदालतों में लगभग 25% पद बरसों बरस से खाली पड़े हुए हैं।
इस बारे में वकील समुदाय ने और कई राजनीतिक पार्टियों ने सरकार से मांग की है कि इन खाली पड़े हुए न्यायिक पदों को जल्द से जल्द भरा जाए और मुकदमों के अनुपात में अदालतों का निर्माण किया जाए, जजों, बाबूओं और स्टेनो की नियुक्तियां की जाएं। मगर सरकारें इन सारी कोशिशों के बाद भी आंख बंद किए हुए और कान बहरे किए हुए बैठी हैं। मोदी सरकार से कुछ उम्मीदें बंधी थीं, मगर इसने तो कांग्रेसी सरकारों को भी पीछे छोड़ दिया है और जनता को केवल जुमले और झूठे नारे ही मिल पाए हैं।
1987 में भारत के विधि आयोग ने अपनी सिफारिशों में कहा था कि हमारे देश में 10 लाख जनसंख्या पर 107 जज होने चाहिए। कांग्रेस और अब बीजेपी सरकार ने इस और कोई ध्यान नहीं दिया और आज हालात यह हैं कि 10 लाख जनसंख्या पर केवल 20 जज काम कर रहे हैं।
जहां न्यायपालिका के लिए जीडीपी का 3% बजट होना चाहिए, वहां पर जीडीपी का मात्र.08% ही खर्च होता है, जिस कारण वादकारियों को सस्ता और सुलभ न्याय मिलना लगभग असंभव हो गया है, नामुमकिन हो गया है। यहीं पर यह भी एक हसीन हकीकत है कि विभिन्न मांगों और दवाओं के बावजूद भी सरकारें न्यायपालिका पर समुचित बजट खर्च करने को तैयार नहीं है।
बहुत सारी कोशिशों के बाद भी सरकार न्यायालयों की संख्या बढ़ाने में, क्लर्कों और स्टेनों की संख्या बढ़ाने में और जजों की संख्या बढ़ाने में कोई रुचि नहीं ले रही है। हमने कई न्यायालयों में देखा है कि कई जज़िज कई कई साल तक बिना स्टेनो के ही अपनी टर्म पूरी कर जाते हैं, मगर वे चाहते हुए भी वांछित न्यायिक कार्य करने में असमर्थ रहते हैं, क्योंकि उनके पास कोई स्टेनो होता ही नहीं है और सरकारों से शिकायत करने के बाद भी सरकारें, इस और कोई ध्यान नहीं देती हैं।
इन्हीं सब कारणों से कारणों से लाखों लाख मुकदमें पिछले तीस-तीस, चालिस चालिस सालों से लंबित है और करोड़ों वादकारियों ने तो इंसाफ की उम्मीद करते करते अपने प्राण त्याग दिए हैं मगर उनको न्याय के दर्शन नहीं हो पाये हैं। और लाखों लाख मुकदमों में उनके बच्चे, उनके बारिश अदालतों के चक्कर काटते देखे गए हैं और उन्हें भी वहां पर निराशा ही हाथ लग रही है।
उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए लगता है कि अगर सरकार की जनता को न्याय देने की यही नीतियां चालू रहीं, तो हमारे करोड़ों करोड़ वादकारियों को कभी कोई न्याय नहीं मिल सकेगा और इसकी पूरी जिम्मेदारी केवल और केवल सरकार की है।





