रीता चौधरी
यहाँ हम वह पेश कर रहे हैं जो किसी ने हमें लिखा है. लाखों में से किसी एक को अपवाद मान लें तो यह विवरण किसी न किसी रूप में सभी पर लागू होता है. स्त्री समाज पर भी लागू होता है. स्त्री पर यह विवरण और भी बदतर रूप से लागू होता है क्योंकि वह प्रतिकूल पति की भी गुलाम बनी रहती है. उसकी अस्मिता का हर पल ख़ून होता है. उसके इमोशन, उसके अरमान, उसकी खुशी- तृप्ति से किसी को भी मतलब नहीं होता. वह सिर्फ काम करने की मशीन, भोग की वस्तु भर होती है. कुल मिलाकर आधुनिक इंसान जंगली जानवर बन गया है और उसका समाज मानवीय जंगल. मूढ़ पशु सा करतब. यांत्रिक लाइफ, टोटली रोबोटिक सेचुएशन.
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घुटनों घिसटना, गिरना-पड़ना, स्कूल जाना, रोना-पिटना यानी ऐसे ही जीवन के 20 साल हवा मानिंद उड़ गए।
फिर शुरू हुई अगले कोर्स या नौकरी की जहमत। ये नहीं वो, दूर नहीं पास। ऐसा करते करते कोई जॉब मिला. फिर हाथ आया पहली तनख्वाह का पैसा। शुरू हुआ अकाउंट में जमा होने वाले शून्यों का अंतहीन खेल। ऐसे 2- 3 वर्ष और निकल गए। बैंक में थोड़े और शून्य बढ़ गए। उम्र 25 से 35 साल घट गयी।
पहले नहीं हुआ था तो फिर अब विवाह हो गया। जीवन की अलग रामकहानी शुरू हो गयी। शुरू के एक 2 साल नर्म, गुलाबी, रसीले, सपनीले गुजरे। हाथो में हाथ डालकर घूमना फिरना, रंग बिरंगे सपने। भरम टूटा, ये दिन जल्दी ही उड़ गए। फिर बच्चे के आने ही आहट हुई। वर्ष भर में पालना झूलने लगा। अब सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया। उठना बैठना खाना पीना लाड दुलार।
समय कैसे फटाफट निकल गया, पता ही नहीं चला। इस बीच कब हाथ पार्टनर के हाथ से निकल गया, बाते करना घूमना फिरना कब बंद हो गया : दोनों को पता ही न चला।
बच्चा बड़ा होता गया। पत्नि बच्चे में व्यस्त हो गयी और मैं नून तेल के जुगाड़ वाले अपने काम में। घर और गाडी की क़िस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक डिपॉजिट में शुन्य बढाने की भी चिंता। उसने भी अपने आप काम में पूरी तरह झोंक दिया और मेने भी.
इतने में मैं 40-45 का हो गया। घर, गाडी, बैंक में शुन्य, परिवार सब है फिर भी कुछ कमी? पर वो कमी है क्या, समझ नहीं आया। पत्नि की चिडचिड बढती गयी, मैं उदासीन होने लगा।
यूँ ही दिन बीतते गए। समय गुजरता गया। बच्चा बड़ा होता गया। उसका खुद का संसार तैयार होता गया। कब जवानी आई और चली गयी पता ही नहीं चला। हम दोनों ही 48-50 के हो गए। एक दिन नितांत एकांत क्षण में मुझे वो गुजरे दिन याद आये और मौका देख कर पत्नि से कहा, “अरे जरा यहाँ आओ, पास बैठो।”
उसने अजीब नजरो से मुझे देखा और कहा, “तुम्हे कुछ भी सूझता है यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है तुम्हे बातो की सूझ रही है।”
कमर में पल्लू खोंस वो निकल गयी। इस तरह आया 55वां साल. आँखों पर चश्मा फिक्स हो गया. बाल, कान, दाँत भी जबाब देने लगे. दिमाग में भी उलझने शुरू हो गयी।
बेटा कॉलेज में था। देखते ही देखते उसका कॉलेज ख़त्म। वह अपने पैरो पे खड़ा हो गया। उसके पंख फूटे और उड़ गया परदेश। मैं खुद बुढा हो गया। पत्नि भी उमरदराज लगने लगी। बाहर आने जाने के कार्यक्रम बंद होने लगे।
अब तो गोली दवाइयों के दिन और समय निश्चित होने लगे। बच्चे बड़े होंगे तब हम साथ रहेंगे सोचकर लिया गया घर अब बोझ लगने लगा। बच्चे कब वापिस आयेंगे यही सोचते सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे।
एक दिन यूँ ही सोफे पे बेठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वो दिया बाती कर रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। लपक के फोन उठाया। दूसरी तरफ बेटा था। जिसने कहा कि उसने शादी कर ली और अब परदेश में ही रहेगा। उसने ये भी कहा कि पिताजी आपके बैंक के धन को किसी वृद्धाश्रम में दे देना। आप भी वही रह लेना। कुछ और ओपचारिक बाते कह कर बेटे ने फोन रख दिया।
मैं पुन: सोफे पर आकर बेठ गया। उसकी भी दिया बाती ख़त्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी, “चलो आज फिर हाथो में हाथ लेके बात करते हैं.”
वो तुरंत बोली, “अभी आई”।
आँखे भर आई। आँखों से आंसू गिरने लगे और गाल भीग गए. अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गयी और मैं निस्तेज हो गया। हमेशा के लिए! उसने शेष पूजा की और मेरे पास आके बैठ गयी “बोलो क्या बोल रहे थे?”
लेकिन मेने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छू कर देखा। शरीर बिलकुल ठंडा पड गया था। मैं उसकी और एकटक देख रहा था। क्षण भर को वो शून्य हो गयी।
उसे कुछ समझ में नहीं आया. लेकिन एक दो मिनट में ही वो चेतन्य हो गयी। धीरे से उठी पूजा घर में गयी। एक अगरबत्ती की। इश्वर को प्रणाम किया। फिर से आके सोफे पे बैठ गयी. मेरा ठंडा हाथ अपने हाथो में लिया और बोली, “चलो कहाँ घुमने चलना है तुम्हे ? क्या बातें करनी हैं तुम्हे ? बोलो.”
ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई. वो एकटक मुझे देखती रही। आँखों से अश्रु धारा बह निकली। मेरा सर उसके कंधो पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था।
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हमारे सुधी पाठकों,
बचपन से कफ़न तक इंसान तन से, मन से, सोच से, विचार से, कल्पना से, स्वप्न से जितने भी अच्छे-बुरे काम करता है : उसका यही मक़सद होता है की वह सूखी हो जायेगा. क्या ऐसा होता है? नहीं होता ऐसा. उसकी खुशी और भी खत्म होती रहती है, दुःख बढ़ता रहता है. एक दिन महा अतृप्ति और पीड़ा में वह खत्म हो जाता है. यह विकास की नहीं, विनाश की यात्रा हुई. यह लाइफ ट्रिप नहीं, डेथ ट्रिप हुई. क्या ये ही जिन्दगी है ? नहीं!
राह या हमराह जो जरूरी है, बदलो. समय रहते बदलो. सब अपना नसीब साथ लेके आते हैं इसलिए कुछ समय अपने लिए भी निकालो। जीवन अपना है तो जीने के तरीके भी अपने रखो। शुरुआत आज से करो। कल कभी नहीं आएगा…!





