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उदयपुर” का डैमेज कंट्रोल…शुक्ला का थिंक टैंक” फिर हुआ फेल, भाजपा को बढ़त

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पार्टी ने ली माँ अहिल्या की शरण, शुक्ला ने जय जय सियाराम के नारे का भी ले लिया साथ

“डरी सहमी, कॉंग्रेस ने आधे दिन के लिए जनसंपर्क रोक दिया। पार्टी और मेयर उम्मीदवार शहर की अधिष्ठात्री देवी माँ अहिल्या के शरण मे पहुंचे। वार्डो में भी जनसम्पर्क रोके गए। प्रचार सामग्री काले रंग में कर दी गई। मेयर उम्मीदवार के लिए टीम शुक्ला यही नही रुकी बल्कि दो कदम आगे जाकर जय जय सियाराम का जयघोष बुलंद करती संजय शुक्ला की प्रचार सामग्री भी जारी की गई ताकि बहुसंख्यक वर्ग तक सन्देश जाए कि कांग्रेस भी उदयपुर घटना के विरोध में दिल से मैदान में है। घटना से ध्यान हटाने के लिए शुक्ला से कहलवाया भी गया कि वे स्वयम के खर्च से शहर में 5 बड़े ब्रिज भी बनवाएंगे। लेकिन इस सब कवायद में पार्टी एक दो नही पूरे 30 घण्टे लेट हो गई। घटना की खबर आग की तरह फैलने ओर उससे उपजे गुस्से को पढ़ने में पार्टी के नीति निर्धारक पूरी तरह फैल हो गए।

कांग्रेस और मेयर उम्मीदवार संजय शुक्ला का थिंक टैंक एक बार फिर फेल साबित हुआ। पार्टी को उदयपुर की तालिबानी घटना पर क्या स्टैंड लेना चाहिए, ये तय करने में 24 घण्टे से ज्यादा लग गए। बर्बर हत्याकांड को लेकर तेजी से पसरे आक्रोश ने उम्मीदवार शुक्ला को ही नही, पूरी पार्टी को सहमा दिया। चुनावी सम्भावनाओ को धूल धूसरित होते देख घबराई कांग्रेस ने माँ अहिल्या की शरण ली। महापौर उम्मीदवार की अगुवाई में पार्टी नेताओं ने राजबाड़ा स्थित अहिल्या प्रतिमा पर मौन धरना दिया और हत्याकांड की कड़ी भर्त्सना की। पार्टी ने आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा की आवाज भी बुलंद की लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 

शहर के 70 से ज्यादा प्रमुख बाजार मुक्कमल बन्द हो चुके थे। वह भी एक दिन पहले सूचना देकर। लेकिन कांग्रेस को बाजार बंद वाले दिन समझ पड़ी की हमे भी डेमेज कंट्रोल करना है। घटना के 24 से ज्यादा घण्टे बीत जाने के बाद भी पार्टी गुरुवार सुबह 9 बजे तक कोई फैसला नही कर पाई। फिर ताबड़तोड़ निर्णय लिया गया कि दोपहर तक सभी प्रकार का जनसंपर्क बन्द रखा जाए। पार्षद उम्मीदवारो को भी तत्काल ताकीद दी गई कि जब तक बाजार बंद है तब तक वोटो की मनुहार न की जाए। पार्षद उम्मीदवारो को भी अहिल्या प्रतिमा स्थल पहुचने को कहा गया। हालांकि उम्मीदवार आये नही। बस शुक्ला अपनी टीम के साथ घटना पर रंज ओर अफ़सोस जताने पहुंचे।धरना स्थल पर पहुंचे पार्टी नेताओं के चेहरे पर ” उदयपुर ” की दहशत साफ नजर आ रही थी। 

खुलासा फर्स्ट ने सबसे पहले इस अंदेशे को उजागर किया कि उदयपुर की घटना ने कांग्रेस और उसके मेयर उम्मीदवार संजय शुक्ला की चुनावी सम्भावनाओ पर असर किया है। मामला बहुसंख्यक समाज के गहरे दुःख और आक्रोश से जुड़ा था। लिहाजा दोपहर तक शुक्ला की आई टी विंग ने शुक्ला के जय जय सियाराम स्लोगम के साथ पोस्टर भी जारी करना शुरू किया। प्रचार सामग्री भी काले रंग में रंगा गई। जनसम्पर्क भी रोके गए। धरना दिया। हत्यारो की कड़ी सजा की मांग बुलंद की ताकि बहुसंख्यक समाज तक शुक्ला का संदेश पहुंचे कि वे भी आपके साथ है।

उधर शहर में दिनभर उदयपुर की घटना ही फ़ोकस में रही। सोशल मीडिया पर फैली गर्मी, बन्द बाजारों ओर शहर के 30 स्थानों पर जलते पुतलों ने रोष को ओर ज्यादा गहरा कर दिया। बन्द में व्यपारिक संगठनों के साथ साथ हिन्दू संगठनों के शामिल होने से इस मुद्दे पर भाजपा को बढ़त मिलती नजर आई।

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क्या कर रहा है थिंक टैंक?

ब्रिज की घोषणा भी बेअसर

कुछ चुनिंदा “दिमाग” तक सीमित संजय शुक्ला का थिंक टैंक कर क्या रहा है?? ये सवाल उदयपुर की घटना के बाद एक बार फिर चलते चुनाव में सामने आ गया। थिंक टैंक ने उदयपुर घटना में शुक्ला के चुनाव पर असर को अगर समय रहते भाप लिया होता तो शुक्ला बुधवार को ही इस मुद्दे पर मैदान पकड़कर इंडोरियो के गुस्से में शामिल हो जाते। इसका सन्देश सीधे उस वर्ग तक पहुंचता जिसके वोटों को लेकर ध्रुवीकरण की आशंका बलवती हुई है। रुद्राभिषेक, भागवत कथाओं, अयोध्या काशी जैसी धार्मिक यात्राओं के जरिये शुक्ला भाजपा के कट्टर वोटर्स के बीच भी ठंडी निगाह से देखे जा रहे थे। हिंदुत्व से जुड़ी पारिवारिक विरासत भी इसमें खासा काम कर रही थी। इसलिए इस चुनाव में टीम शुक्ला ने मुस्लिम इलाको का ज्यादा दम नही भरा न ज्यादा अल्पसंख्यक इलाको में सक्रियता दिखाई। पार्टी का मानना था कि अल्पसंख्यक वोट तो कांग्रेस को मिलना ही है। फोकस भाजपा से जुड़े वोटर्स पर ही था। इसे शुक्ला का दुर्भाग्य कहे या कुछ और…कांग्रेस शासित राजस्थान में घटना हो गई। चुनावी परिदृश्य में एक बार फिर कांग्रेस और उसका कथित तुष्टिकरण सामने आ गया। सोशल मीडिया के गुस्से ने इसे ओर हवा दे दी और पार्टी का चुनाव चिन्ह देखते ही देखते कमल से मुकाबला करता छोड़ “खूनी पंजे” में तब्दील हो गया। चुनावों को समझने वाले भी अब ये मानकर चल रहे है कि उदयपुर फेक्टर अब 6 जुलाई तक मतदाताओ के जेहन से बाहर नही जाने वाला है।

माहौल पलटने के लिए और उदयपुर से ध्यान हटाने के लिए गुरुवार को शुक्ला से घोषणाएं करवाई गई की वे अपने खर्च में शहर में 5 ब्रिज बनवाएंगे। पार्टी को उम्मीद थी कि ये घोषणा चुनावी खुमारी में डूबे शहर में दिनभर चर्चा का केंद्र रहेगा लेकिन गुरुवार को ऐसा होता तो नजर नही आया।

Ramswaroop Mantri

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