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यूजीसी समानता नियम: संवैधानिक मंशा और राजनीतिक यथार्थ

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 -तेजपाल सिंह ‘तेज’

          लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सामान्य अपेक्षा होती है कि सरकार अपने द्वारा बनाए गए कानूनों का न केवल पालन करे, बल्कि अदालत में उनकी पूरी मजबूती से रक्षा भी करे। किंतु हाल के वर्षों में विश्वविद्यालय परिसरों में समानता, गरिमा और भेदभाव-निरोध से जुड़े यूजीसी के नए नियमों को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए कई असहज प्रश्न खड़े करता है। सबसे अहम सवाल यह है कि जिस कानून को सरकार ने स्वयं बनायाजिसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में लाया गयाउसी कानून के खिलाफ जब चुनौती आई तो सरकार अदालत में मौन क्यों रही?यह निबंध इसी मौन, उसके राजनीतिक–सामाजिक निहितार्थों, और उसके संभावित परिणामों का विश्लेषण करता है।

          लोकतंत्र की आत्मा इस सिद्धांत पर टिकी होती है कि कानून जनता के हित में बनते हैं और राज्य उनकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहता है। सामान्यतः जब कोई सरकार कोई कानून बनाती है और उसे अदालत में चुनौती दी जाती है, तो वह पूरी कानूनी शक्ति के साथ उसके पक्ष में खड़ी होती है। भारत के संवैधानिक इतिहास में इसके असंख्य उदाहरण हैं। लेकिन हालिया यूजीसी समानता नियमों के मामले में जो हुआ, वह इस परंपरा से बिल्कुल उलट है। यही कारण है कि यह प्रश्न केवल एक कानूनी विवाद नहीं रह जाता, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय बन जाता है—कि आखिर सरकार अपने ही बनाए कानून के पक्ष में क्यों नहीं बोली?

लोकतंत्रकानून और सरकार का मौन:

          लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का मौन कभी तटस्थ नहीं होता। जब कोई कानून अदालत में चुनौती के घेरे में होता है और सरकार उसकी व्याख्या, उसकी मंशा और उसके औचित्य को स्पष्ट नहीं करती, तो न्यायालय के सामने केवल एक पक्षीय कथा बचती है। यूजीसी के नए नियमों के मामले में भी यही हुआ। चुनौती देने वाले व्यक्तियों और उनके वकीलों ने जो तर्क रखे, उन्हें खंडित करने के लिए सरकार की ओर से कोई प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया गया। यह स्थिति तब और असामान्य लगती है जब यह ज्ञात हो कि सॉलिसिटर जनरल सहित सरकार के शीर्ष विधि अधिकारी अदालत में मौजूद थे। यह मौन कोई तकनीकी चूक नहीं था, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम हुए—न्यायिक संतुलन बिगड़ा और कानून बिना पर्याप्त प्रतिवाद के खारिज कर दिया गया।

यूजीसी नियमों की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ:

          2012 में बनाए गए यूजीसी नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में भेदभाव और उत्पीड़न को रोकना था, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर वे प्रभावी सिद्ध नहीं हो पाए। इसके दुष्परिणाम देश ने बहुत कड़वे रूप में देखे—रोहित वेमुला और पायल ताडवी जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल औपचारिक नियम पर्याप्त नहीं हैं। इन्हीं घटनाओं के बाद पीड़ित परिवार सर्वोच्च न्यायालय पहुँचे। न्यायालय ने भी यह स्वीकार किया कि 2012 की व्यवस्था कमजोर है और एक नए, अधिक सशक्त कानून की आवश्यकता है। यानी नया यूजीसी नियम किसी राजनीतिक सनक का परिणाम नहीं था, बल्कि न्यायिक निर्देश और सामाजिक यथार्थ की उपज था।

नया नियम: समानता की दिशा में एक हस्तक्षेप:

          नए यूजीसी नियमों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और दिव्यांगों को भी स्पष्ट रूप से संरक्षण के दायरे में लाया गया। यह बदलाव विश्वविद्यालयों की उस सामाजिक संरचना को चुनौती देता था, जिसमें ऐतिहासिक रूप से कुछ वर्गों का वर्चस्व रहा है। यह नियम केवल शिकायत निवारण का तंत्र नहीं था, बल्कि यह यह स्वीकारोक्ति भी थी कि उच्च शिक्षा संस्थानों में असमानता और भेदभाव अब भी एक जीवंत वास्तविकता है।

संसदीय समिति और सर्वसम्मति की राजनीति:

          शिक्षा संबंधी संसदीय समिति, जिसे अक्सर ‘लघु संसद’ कहा जाता है, ने इस विषय पर विस्तृत विचार-विमर्श किया। विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया और अंततः यह निष्कर्ष निकला कि समानता से जुड़े किसी भी ढांचे में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी को शामिल करना अनिवार्य है। यह कोई एक दल या एक नेता की राय नहीं थी, बल्कि एक साझा राजनीतिक सहमति थी, जिसे सरकार ने भी औपचारिक रूप से स्वीकार किया। ऐसे में यह और अधिक रहस्यमय हो जाता है कि वही सरकार बाद में इस नियम की रक्षा से पीछे क्यों हट गई।

दुरुपयोग” की आशंका और उसका विरोधाभास:

          न्यायालय में नए नियमों के खिलाफ सबसे बड़ा तर्क यह दिया गया कि इसका दुरुपयोग हो सकता है। लेकिन यह तर्क एक अजीब विरोधाभास से भरा हुआ था। कानून अभी लागू भी नहीं हुआ था, उसका एक भी दुरुपयोग का उदाहरण मौजूद नहीं था, फिर भी आशंका को वास्तविकता के रूप में प्रस्तुत किया गया। भारत में ऐसे अनेक कानून हैं जिनके दुरुपयोग के प्रमाण उपलब्ध हैं, फिर भी उन्हें समाप्त करने की बात कभी गंभीरता से नहीं उठी। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या “दुरुपयोग” का तर्क वास्तव में कानूनी चिंता था या राजनीतिक असहजता का आवरण।

ओबीसी का समावेश: असली विवाद का केंद्र:

          यदि इस पूरे विवाद को उसके मूल में देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि असली असहजता ओबीसी के समावेश को लेकर है। अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकार संवैधानिक बाध्यता के कारण स्वीकार किए गए हैं, लेकिन ओबीसी को लेकर सत्ता संरचना में हमेशा हिचक बनी रही है। विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों में, जहाँ निर्णय लेने वाले पदों पर वर्चस्वशाली वर्गों की संख्या अत्यधिक है, वहाँ यह नियम शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता था। संभवतः यही कारण है कि जैसे ही विरोध तेज हुआ, सरकार ने चुप्पी साध ली।

2012 के नियमों की वापसी: एक विडंबनापूर्ण समाधान:

          अदालत के फैसले के बाद 2012 के नियमों को पुनः लागू कर दिया गया, जबकि वही नियम पहले प्रभावी नहीं माने गए थे। यह स्थिति एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है—जो व्यवस्था पहले असफल रही, वही भविष्य में कैसे सफल होगी? यदि सर्वोच्च न्यायालय ने कभी स्वयं माना था कि 2012 का ढांचा पर्याप्त नहीं है, तो केवल नए नियम को हटाकर पुराने को वापस लाना समाधान नहीं कहा जा सकता।

समानता समिति और प्रतिनिधित्व की सीमाएँ:

          नए नियमों में समानता समिति का प्रावधान एक सकारात्मक कदम था, लेकिन उसमें प्रतिनिधित्व का संतुलन स्पष्ट रूप से सुनिश्चित नहीं किया गया। वास्तविकता यह है कि विश्वविद्यालयों में शिक्षण और प्रशासनिक पदों पर आज भी एक विशेष सामाजिक समूह का प्रभुत्व है। ऐसे में यदि निर्णय लेने वाली समितियों में वंचित समुदायों की निर्णायक भागीदारी नहीं होगी, तो समानता का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

उपसंहार

          यूजीसी के समानता नियमों का खारिज होना केवल एक कानूनी निर्णय नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की प्राथमिकताओं को उजागर करता है। यह दिखाता है कि जब कोई कानून सत्ता-संरचना और सामाजिक वर्चस्व को चुनौती देता है, तो उसकी रक्षा राजनीतिक रूप से असुविधाजनक हो जाती है। यदि विश्वविद्यालयों को वास्तव में विचार, समानता और न्याय के केंद्र बनाना है, तो आधे-अधूरे उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। नए नियमों को सुधार के साथ पुनर्जीवित करना, प्रतिनिधित्व को वास्तविक बनाना और सरकार की स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति ही आगे का रास्ता है। अन्यथा, इतिहास एक बार फिर दोहराया जाएगा—और उसकी कीमत वही चुकाएंगे, जिनके लिए ये कानून बनाए जाते हैं।

(उर्मिलेश :https://www.youtube.com/live/A9y8vyGZAE4?si=Ah1A6i7WClVRtl-)

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