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खेती में साम्राज्यवादी लूट के स्वरूप को समझिए सुनील की कलम से

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अमरीका-यूरोप अपने कृषि उत्पादकों को और कृषि व्यापार करने वाली कंपनियों जितना भारी अनुदान देते हैं वह साधारण जनों की कल्पना से परे है और किसी भी अर्थशास्त्रीय सिद्धांत व तर्क के विपरीत है।गरीब देशों को अनुदान आधारित अर्थव्यवस्था को बंद करने का उपदेश देनेवाली अमीर देशों की सरकारों का दोहरा व दोगला चरित्र इससे उजागर होता है।विश्व व्यापार संगठन बनने के बाद से अमीर देशों के कृषि अनुदान कम होने के बजाए और ज्यादा बढ़े हैं।दुनिया के अमीर देश सालाना करीब 300 अरब डॉलर अनुदान देते हैं।इन भारी अनुदानों के कारण उनकी कृषि वस्तुएं दुनिया के बाजार में बहुत सस्ती हो जाती हैं।गरीब देशों के किसान इससे प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर पाते और बरबाद हो जाते हैं।विश्व व्यापार संगठन की वार्ताएं बार बार असफल हो रही हैं और वार्ताओं का दोहा दौर काफी मुसीबत में पड़ गया गया है।इसका प्रमुख कारण दुनिया के कृषि व्यापार का बुनियादी असंतुलन और उसके कारण पैदा हो रही दिक्कतें हैं ।

हैरतअंगेज अनुदानों के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं।यूरोप अपने चीनी उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों से चार गुनी कीमत देता है,जिससे वहां 40 लाख टन अतिरिक्त चीनी पैदा होती है,जिसे फिर 100 करोड़ डॉलर के सालाना निर्यात अनुदान के साथ दुनिया के बाजार में बेचा जाता है ।नतीजा यह है कि काफी मंहगे चीनी उत्पादन कर बावजूद यूरोप दुनिया का दूसरे नम्बर का चीनी निर्यातक बना हुआ है और अन्य चीनी निर्यातक/उत्पादक देशों के किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

संयुक्त राज्य अमरीका में जितने मूल्य की कपास पैदा होती है,लगभग उतने ही मूल्य (470 करोड़ डॉलर) का अनुदान वहां की सरकार देती है।वहां की सस्ती कपास के कारण अफ्रीका के माली, बेनिन,चाड, बुर्किनो फासो जैसे देशों के कपास किसानों की हालत खराब हो गई है।अमरीका ने 2003 में चावल की खेती के लिए 130 करोड़ डॉलर का अनुदान दिया जो कुल मूल्य का 72 % था। थाईलैंड और वियतनाम की तुलना में वहां चावल पैदा करने की लागत दुगुनी आती है,लेकिन अनुदानों के बल पर वह दुनिया का तीसरे नंबर का चावल निर्यातक देश बना हुआ है।इसी तरह अमरीका दुनिया के बाजार में गेहूं लागत से आधे दामों पर आउट मक्का 20 %  कम दाम पर बेचता है।यूरोपीय संघ के देश एक गाय को पालने के लिए औसतन औसतन दो डॉलर प्रतिदिन का अनुदान देते हैं,जब की भारत के 77% लोग 20 ₹ रोज से कम पर गुजारा करते हैं।

तमाम प्रगति और आधुनिकतम तकनालॉजी के बावजूद अमीर देशों की खेती काफी मंहगी व अकुशल है।यह भी साफ है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार अर्थशास्त्र की किताबों के ‘तुलनात्मक लाभ के सिद्धांतों’ से नहीं चलता।इसके पीछे राजनीति और कूटनीति ज्यादा होती है। 

सुनील,पूर्व राष्ट्रीय महासचिव,समाजवादी जन परिषद

Ramswaroop Mantri

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