~ सुधा सिंह
_वेद प्रत्येक जड़ में उसके अभिमानी देवता का होना मानता है। भगवान् राम ने समुद्र से प्रार्थना की थी कि वह उन्हें लङ्का जाने के लिये मार्ग दे दे। देवतात्मा समुद्र ने उनकी प्रार्थना सुनी थी और लङ्का पहुँचने के लिये उपाय भी बताया था। इस तरह वेद का यह सिद्धान्त अनुनायियों के जीवन में व्यवहार के रूप में उतरा हुआ है। यहाँ वेद की एक ऐसी घटना प्रस्तुत की जा रही है, जो इस तथ्य को भली-भाँति उजागर करती है।_
महर्षि विश्वामित्र पिजवन के पुत्र सुदास के पुरोहित थे। एक बार सुदासने विश्वामित्र के पौरोहित्य में बहुत बड़ा यज्ञ कराया। यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो गया। दक्षिणाके रूपमें विश्वामित्रको बहुत सा धन प्राप्त हुआ। महर्षि विश्वामित्र उस धनको छकड़ेपर और रथपर लादकर अपने आश्रमपर लौट रहे थे।
रास्तेमें व्यास (विपाशा) और सतलज (शतद्रु)- का संगम पड़ा। नदियाँ अगाध थीं और वेगसे बह रही थीं। रथसे उनको पार नहीं किया जा सकता था।
महर्षि विश्वामित्र अकेले न थे। उनके साथ अन्य लोग भी थे। दूरसे आ रहे थे। थकानसे चूर-चूर हो रहे थे। अतः महर्षिने नदियोंसे मार्ग माँगना ही उचित समझा। उन्होंने प्रार्थना करते हुए कहा-‘हे शतद्रु और विपाशे! तुम दोनों मातासे भी बढ़कर ममतामयी (‘सिन्धुं मातृतमाम् ० ऋ० ३ । ३३। ३) हो। हम तुम्हारे पास आये हैं।’
महर्षि विश्वामित्रकी पुकार सुनकर दोनों नदियों विचार करने लगीं। यह विप्र क्या यह चाह रहा है कि हम इसे मार्ग दे दें। महर्षिकी माँगकी पूर्ति तो हमें करनी ही चाहिये, किंतु इसमें अड़चन यह है कि हम दोनोंको देवराज इन्द्रने जो यह आदेश दे रखा है कि हम दोनों वेगसे बहती हुई परिसर प्रदेशको निरन्तर सिंचित करती रहें, इसमें त्रुटि हो सकती है (ऋ० ३। ३३।४)।
नदियोंको चुप देखकर महर्षिने फिर विनती की— ‘हे जलसे लबालब भरी हुई नदियो! मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम अपने प्रबल वेगको बिलकुल रोक ही लो। मैं तो केवल यह कह रहा हूँ कि तुम अपने-अपने जलको इतना कम कर लो कि मैं रथ, छकड़े और लोगोंके साथ पार उतर जाऊँ।
फिर जैसी-की-तैसी हो जाओ। दूसरी बात यह है कि पार हो जानेके बाद यज्ञमें हम तुम्हें सोम- रस प्रदान करेंगे’ (ऋक्० ३।३३।५।)
नदियोंने कहा-‘महर्षे। हम दोनों देवराज इन्द्रकी आज्ञाके पालनमें कभी चूक नहीं होने देतीं, क्योंकि उन्होंने वज्रसे खोदकर हमें जन्म दिया है, मेघके द्वारा हमें जीवन दिया है और अपने कल्याणकारी हाथोंसे सहारा देते हुए हमको समुद्रतक पहुँचाया है तथा उसीके हाथमें हमें सौंप दिया है। इस तरह हम दोनों उनकी सदा ऋणी हैं। अतः उन्हींकी आज्ञाका पालन करती हैं’ (ऋक्०३ | ३६ | ६)।
इस तरह नदियोंने पहले तो महर्षि विश्वामित्र का प्रत्याख्यान कर दिया, किंतु फिर उन्होंने उनकी माँगको स्वीकार कर लिया। नदियोंने कहा- ‘महर्षे! जैसे ममतामयी माँ अपने बच्चेको दूध पिलानेके लिये झुक जाती है, वैसे ही हम भी तुम्हारे लिये कम जलवाली हो जाती हैं। जल इतना कम कर दे रही हैं कि तुम्हारे रथके धूरे ऊपर रहें, तुम दूरसे आये हो, थक भी गये हो, इसलिये छकड़े और रथ आदिके साथ पार हो जाओ’ (ऋ० ३ । ३३ । १०)।
इस तरह महर्षि विश्वामित्रने उन दोनों नदियोंको जो ‘मातृतमाम्’ कहा था। उसे नदियोंने चरितार्थ कर दिखाया और अपनी वत्सलताका परिचय दिया।
आजके जड़वादी युगको विश्वामित्र तथा नदियोंका यह संवाद खटकता है और इसका दूसरा अर्थ किया जाता है।
किंतु सत्य तो सत्य ही रहता है और सत्य यह है कि यह दो चेतनोंका संवाद है, जैसे- विश्वामित्रका शरीर जड़ है और उसमें चेतनका आवास है, वैसे नदियोंके जलीय शरीर तो जड़ हैं, किंतु उनकी अधिष्ठात्री देवी चेतन हैं.
इस सम्बन्धमें कुछ आप्त वचन ये हैं :
१. निरुक्तने इसे इतिहास माना है— ‘तत्रेतिहासमाचक्षते’ (निरुक्त २ । ७)।
२. प्रपर्वतानां सप्तोना संवादो नदीभिर्विश्वामित्र- स्योत्तितीर्षोरिति’ (अनुक्रमणी का० स० ३।३३)।
३. सूक्ते प्रेति तु नद्यश्च विश्वामित्रः समूदिरे। पुरोहितः सन्निज्यार्थं सुदासा सः यन्नृषिः। विपाछुतुद्रुद्वयोः सम्भेदं शमित्येते उवाच ह। (बृहद्देवता ४। १०५-१०६)
४. ‘विश्वामित्रस्य संवादं नद्यतिक्रमणे जपेद्॥’ (ऋक् विधान १७७) (ला० बि० मि०)





