मुनेश त्यागी
30 साल पहले बहुत सोच समझकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना की थी और भारत के राजनीतिक वर्ग ने सोच समझकर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर मुहर लगा दी थी तत्कालीन सभी राजनीतिक पार्टियों से लेकर, आज तक इस प्रणाली का समर्थन किया है मगर पिछले कुछ वर्षों से इसमें देखा गया है कि इसमें कुछ खामियां आ गई हैं
इसमें जनता के तमाम तबकों को जनसंख्या के हिसाब से समानुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। भारत की केंद्र सरकार ने भी इस समस्या को दूर करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। उसने भी विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की कोई मीटिंग नहीं बुलाई, इस पर कोई चर्चा नहीं की और ना ही इस विषय में सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों से कोई बात की और अब मामला इस हद तक पहुंच गया है कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय की कोलिजियम की कार्यप्रणाली से खुश नहीं है।
वह इसे एक दब्बू संस्था बनाना चाहती है, इसे अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करना चाहती है और इसे एक जेबी संस्था बनाना चाहती है। यहीं पर दूसरे दल भी कॉलेजियम सिस्टम का तब तक बने रहना स्वीकार कर रहे हैं कि जब तक कोई कारगर व्यवस्था इस बारे में न बन जाए।
हाल ही में भारत के कानून मंत्रालय द्वारा पार्लियामेंट्री पैनल को दिए गए आंकड़ों के अनुसार पिछले 5 सालों में भारत के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 79 प्रतिशत न्यायाधीश ऊंची जातियों से थे। इन आंकड़ों से साफ तौर से स्पष्ट है कि भारत की 25 हाईकोर्टों में पिछड़े वर्ग, एससी, एसटी और माइनॉरिटी वर्ग का प्रति प्रतिनिधित्व न्याय के खिलाफ है और यही हाल निचली अदालतों में भी मौजूद है।
भारत के कानून मंत्रालय ने पार्लियामेंट की स्थाई समिति को सूचित किया है की भारत में कॉलेजियम प्रणाली जो पिछले 3 दशक से जारी है, उसमें सामाजिक विविधता के अनुसार उच्च न्यायालयों में ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों का जनसंख्या के हिसाब से समानुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं है। भारत के 25 न्यायालयों में ओबीसी, एससी, एसटी और माइनॉरिटी के जजों का विवरण इस प्रकार है,,, ओबीसी भारत की जनसंख्या के 35% लोग हैं मगर उनका न्यायपालिका में केवल 11% प्रतिनिधित्व है। इसी प्रकार अनुसूचित जाति जो लगभग प्रतिशत 15% हैं उनका 2.8% प्रतिनिधित्व और अनुसूचित जातियों का जिनकी जनसंख्या 7:30 परसेंट है, उनका प्रतिनिधित्व केवल 1.3 पर्सेंट है और अल्पसंख्यक वर्ग का जो जनसंख्या में लगभग 20 करोड़ के करीब है उनका केवल 2.6% न्यायपालिका में भागीदारी है।
न्यायपालिका में काम कर रहे कॉलेजियम सिस्टम दो स्तर पर भारत में काम कर रहा है, सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर और उच्च न्यायालय के स्तर पर। सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम में चार सदस्य होते हैं जिसके मुखिया भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं और इसी प्रकार उच्च न्यायालयों में कॉलेजियम सिस्टम में 3 सदस्य होते हैं जिनके मुखिया उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश होते हैं। यह दोनों कॉलेजियम सिस्टम भारत की सर्वोच्च न्यायालय और भारत के 25 उच्च न्यायालयों के न्यायमूर्तियों की नियुक्तियां करते हैं।
भारत के सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम और उच्च न्यायालय के कोलिजियम की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वे सामाजिक विविधता को ध्यान में रखते हुए, भारत के उच्च न्यायालयों में और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्तियां करें। पिछले तीस साल पहले इसी आशा और विश्वास को लेकर भारत में कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना की गई थी।
तीस साल के बाद यहां पर निराशा ही हाथ लग रही है क्योंकि उच्च न्यायालयों में और सर्वोच्च न्यायालय में पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक वर्गों का जनसंख्या के हिसाब से समानुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं है। यह बिल्कुल न्याय विरुद्ध है। इस प्रकार यह आसानी से कहा जा सकता है कि कोलिजियम प्रणाली भी भारत की जनता को उच्च न्यायालयों में समानुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं दे पा रही है और यह स्थिति उस आशा और विश्वास को खंडित करती है जिसमें यह सोचा गया था कि कॉलेजियम प्रणाली भारत के सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में जनता के सभी तबकों को जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व देंगे।
मगर वे ऐसा करने में बिल्कुल असमर्थ और नाकामयाब हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कॉलेजियम प्रणाली के लिए अति आवश्यक है कि वह उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में जनता के विभिन्न तबकों के हिसाब से जनसंख्या के अनुसार न्यायाधीशों को प्रतिनिधित्व प्रदान करें।
तभी जाकर जनता को सस्ता सुलभ और असली न्याय मिल सकता है। जब तक ऐसा नहीं किया जाता, तब तक संविधान के उद्देश्यों और सिद्धांतों को पूरा नहीं किया जा सकता और जनता को सस्ता, सुलभ, न्यायसंगत और असली न्याय नहीं दिया जा सकता और तब तक यह एक दिवास्वप्न ही बना रहेगा। जब तक ऐसा नहीं किया जाता, तब तक जनता के साथ खुले तौर पर अन्याय होता रहेगा और उसको कभी भी सस्ता, सुलभ, वास्तविक और असली न्याय नहीं मिल पाएगा।





