28 फ़रवरी को संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और इज़राइल ने ईरान पर हमला शुरू कर दिया, इससे महज़ कुछ घंटों पहले ही शांतिवार्ता में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी कई माँगें मान ली थीं। इससे पहले भी जून 2025 में यूएस और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया था। दोनों बार किए गए हमले अवैध थे क्योंकि इनसे संयुक्त राष्ट्र के चार्टर द्वारा सुनिश्चित ईरान की संप्रभुता का उल्लंघन हुआ।
ईरान एक संप्रभु देश है और यूएस की ही तरह संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्यों में से एक भी है। इसलिए यूएस चार्टर में दिए गए अधिकार और ज़िम्मेदारियाँ इस पर पूरी तरह लागू हैं। यूएस ने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर किए हैं और उसकी पुष्टि की है, इसका मतलब है कि चार्टर और अन्य सदस्य राष्ट्रों के प्रति यूएस सरकार के संधि आधारित कुछ दायित्व हैं। जब पूर्व यूएस राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने यूएन चार्टर का उल्लंघन करते हुए इराक़ पर हमला किया था तो डॉनल्ड ट्रम्प ने 16 अप्रैल 2004 को हॉवर्ड स्टर्न को बताया था ‘मुझे लगता है इराक़ [पर हमला] एक बेहद ग़लत क़दम है। और मुझे लगता है कि अगर हम वहाँ से निकल जाएँ तो वह एक अच्छा लोकतांत्रिक देश बन सकता है।’ ट्रम्प आज अपना ही सुझाव भूल गए हैं।
दस करोड़ की आबादी और सदियों से चली आ रही देशभक्ति की परंपरा वाले ईरान पर पहले 2025 और फिर 2026 में यूएस ने आख़िर हमला क्यों किया? स्टेट ऑफ़ द यूनियन में अपने पिछले भाषण में ट्रम्प ने कहा कि इसकी मुख्य वजह यह है कि उन्हें लगता है ईरान परमाणु हथियार कार्यक्रम चला रहा है। जबकि ईरान लगातार कहता आ रहा है कि उसके पास कोई परमाणु हथियार बनाने का कार्यक्रम नहीं है। यह बात उस फ़तवे से भी पक्की होती है जिसे आयतुल्लाह सय्यद अली ख़ामेनेई ने सार्वजनिक तो 2003 में किया था लेकिन वह लिखा एक दशक पहले गया था। उस फ़तवे में आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने यह दर्ज किया था कि ईरान के सैनिक (यूएस और पश्चिमी जर्मनी द्वारा मुहैया) इराक़ की ग़ैर-क़ानूनी मस्टर्ड गैस और अन्य कैमिकलों का शिकार हुए हैं, इन अनुभवों और इस्लामी नैतिकता की उनकी शिक्षा ने सामूहिक बर्बादी के हथियारों को अनैतिक बना दिया है। ईरान के एक के बाद एक नेता ने यही बात दोहराई है।
24 फ़रवरी को स्टेट ऑफ़ द यूनियन के अपने भाषण में ट्रम्प ने कहा ‘हमने कभी भी उन्हें साफ़-साफ़ कहते नहीं सुना कि वे कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएँगे’। लेकिन अयातुल्लाह ख़ामेनेई तो ठीक यही कहा था। बल्कि ट्रम्प के भाषण के कुछ घंटे बाद ही ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराक़ची ने ट्वीट किया: ‘ईरान किसी भी हाल में परमाणु हथियार नहीं बनाएगा’। 17 फ़रवरी को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने कहा कि ‘सुप्रीम लीडर के फ़तवे के आधार पर हमारा वैचारिक निर्णय है कि हम परमाणु हथियार कभी नहीं बनाएँगे और वे इस बात की पुष्टि जैसे भी करना चाहें कर सकते हैं, हम पूरी तरह तैयार हैं’। उन्होंने सवाल किया कि ‘आख़िर हम किस भाषा में समझाएँ कि हम परमाणु हथियार नहीं चाहते?’ उनका वक्तव्य फ़ारसी में था जिसका तर्जुमा कई ज़बानों में किया गया। पर लगता है कि वाइट हाउस तक ये ख़बर नहीं पहुँची।
1957 में ईरान और यूएस ने परमाणु ऊर्जा के नागरिक उपयोगों हेतु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत यूएस को यह अधिकार मिला कि वह राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइज़नहावर के बनाए ऐटम्स फ़ॉर पीस कार्यक्रम (शांति के लिए परमाणु ऊर्जा) के अंतर्गत परमाणु प्रौद्योगिकी ईरान को दे सकता है। 1959 में ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी द्वारा नियंत्रित तत्कालीन सरकार ने तेहरान परमाणु रिसर्च केंद्र खोला। कई सालों बाद यूएस ने ईरान को 5 मेगावॉट थर्मल परमाणु रीऐक्टर दिया जो मेडिकल रेडीयोआइसोटोप के उत्पादन और वैज्ञानिक शोध के लिए तैयार किया गया था।
1979 में ईरान की क्रांति के बाद, नई सरकार ने परमाणु ऊर्जा रिसर्च कार्यक्रम बंद कर दिया। 1988 में इराक़ के साथ जंग के ख़त्म होने और 1989 में आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी की मौत के बाद ईरान ने बिजली बनाने, मेडिकल आइसोटोप और वैज्ञानिक प्रशिक्षण के लिए अपना परमाणु कार्यक्रम फिर से चालू किया। 1995 में ईरान ने रूस के साथ एक समझौता किया ताकि ईरान के बुशहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र को फिर बनाया जा सके (इसका निर्माण 1975 में पश्चिमी जर्मनी द्वारा किया गया था और इराक़ ने इसे पश्चिमी जर्मनी की ख़ुफ़िया जानकारी का इस्तेमाल कर तबाह कर दिया)। इन सब के बीच याद रखना चाहिए कि ईरानी अधिकारियों ने बार-बार दोहराया है कि वे परमाणु हथियार नहीं चाहते। जब ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम फिर से शुरू किया तब ऐसा नहीं लगा कि यूएस उनके इरादों पर शक़ कर रहा हो।
हालत तब बदले जब यूएस ने 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर और 2003 में इराक़ पर हमला कर ईरान के दो ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों को ख़त्म किया (तालिबान और सद्दाम हुसैन की सरकारों को)। ईरान को– जो अब तक अपने पड़ोसी देशों की वजह से कुछ दबा हुआ था– मौक़ा मिला इराक़, सीरिया और लेबनान से रिश्ते बनाने का। यह वॉशिंगटन के लिए चौंकाने वाला था, जिसे अपने अवैध युद्धों के परिणाम साफ़-साफ़ समझ नहीं आए थे। इसलिए ईरान को अलग-थलग करने के लिए बुश सरकार ने उसके परमाणु हथियार बनाने के इरादों की खिचड़ी पकाई और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) का इस्तेमाल इस दुष्प्रचार के लिए किया।
बुश ने हमेशा की ही तरह तथ्यों को नज़रंदाज़ किया। ये तथ्य कौन से थे?
2007 में यूएस की ख़ुफ़िया प्रणालियों का राष्ट्रीय ख़ुफ़िया आकलन इस नतीजे पर पहुँचा ‘हम पूरे विश्वास के साथ मानते हैं कि 2003 में तेहरान ने अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को स्थगित कर दिया’। इससे पहले तेहरान कोई परमाणु हथियार कार्यक्रम चला रहा था या नहीं, यह मुद्दा नहीं है; सीआईए और और बाक़ी एजेंसियों ने यह मान लिया कि 2003 के बाद ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं रहा।
2011 में आईएईए की रिपोर्ट ने संभावना जताई कि ईरान द्वारा तमाम तरह के साज़ो-सामान जुटाने (‘परमाणु संबंधित और दोहरे इस्तेमाल वाले उपकरण’) से लगता है कि इसका ‘सैन्य पक्ष हो सकता है’, लेकिन इस बात के कोई सबूत नहीं दिए गए। हर बार आरोपों के साथ संदेह जुड़े रहे। ऐसा लगता है कि आईएईए यूएस सरकार और इसके यूरोपीय सहयोगियों के भारी दबाव में था। इस रिपोर्ट में साफ़ दिखता था कि यह राजनीतिक दबाव में तैयार की गई थी।
2015 में आईएईए ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े पुराने और नए सवालों पर अंतिम विश्लेषण जारी किया, इसे संस्थान के महानिदेशक युकिया अमानो ने तैयार किया था। इस रिपोर्ट में निर्णायक तौर से दर्ज किया गया कि 2009 के बाद परमाणु धमाकों से जुड़ी गतिविधियों के कोई भी ‘प्रामाणिक संकेत नहीं’ हैं और कोई प्रामाणिक सबूत नहीं है कि परमाणु सामग्री का इस्तेमाल हथियारों के लिए किया गया हो।
2025 में आईएईए निदेशक राफेल मारियानो ग्रॉसी ने अल जज़ीरा को दृढ़ता के साथ बताया ‘ईरान के पास मौजूद पदार्थों से हमें यह नहीं लगता कि परमाणु हथियार बनाने की कोई सक्रिय, व्यवस्थित योजना है’।
ग्रॉसी के बयान से ज़्यादा साफ़ कोई और बात नहीं हो सकती: ‘हमें नहीं लगता’। इसे राष्ट्रपति पेज़ेशकियान के बयान के साथ रखा जाए: ‘हम किस भाषा में समझाएँ कि हम परमाणु हथियार नहीं चाहते?’
ईरान में कोई परमाणु हथियार नहीं हैं। जंग के लिए इसे बहाना बनाना बिलकुल ऐसा ही है जैसे बुश इराक़ में ‘सामूहिक तबाही के हथियारों’ की बात किया करते थे। कहाँ हैं वे हथियार? सिर्फ़ उनकी कल्पना में।
ईरान के भीतर बेशक बहुत से मसले हैं। यूएस और यूरोप द्वारा ईरान की अर्थव्यवस्था को चरमराने देने की कोशिश और शिकागो विश्वविद्यालय में शिक्षित अर्थशास्त्री एवं वित्त एवं आर्थिक मामलों के मंत्री सैय्यद अली मदनीज़ादेह के खराब आर्थिक प्रबंधन के मिले-जुले कुप्रभाव ने ईरान के मेहनतकश लोगों के लिए गंभीर समस्याएँ पैदा कर दी हैं। लेकिन इन्हें ईरान तब तक नहीं सुलझा सकता जब तक कि इसकी अर्थव्यवस्था और जनता का दम घोटने वाला यूएस द्वारा थोपा छद्म युद्ध ख़त्म नहीं किया जाता।
ईरान की जनता जंग से अच्छी तरह वाक़िफ़ है। उन पर कई बार जंग थोपी गई है, एंग्लो-पर्शियन युद्ध (1856-1857) से लेकर इराक़ द्वारा अतिक्रमण (1980) और मौजूदा छद्म युद्ध तक।
ईरानी कवि बेहज़ाद ज़र्रीनपुर (जन्म 1968) ने अपनी कविता Lidless Coffins with No Bodies [बिन लाशों के खुले ताबूत] में जंग की दहशत के बारे में लिखा, वो दहशत जो बुश की ‘बड़ी गलती’ ने फैलायी थी। मैं आपके साथ यह ख़ूबसूरत और प्रभावी कविता साझा करना चाहता हूँ:
हवा ने शहर में भर दी है
बर्बादी की बू।
कोई चिलचिलाती धूप से बचने को नहीं जा खड़ा होता
चरमराती दीवार के ठंडे साये में।
अनमना सा दस्तरख़्वान बिछा है,
परोसे हैं खोखले वादे,
खाली पेट रोटी की जगह
चबाते हैं गोलियाँ,
और दिवालिया हो चुके नमक कारोबारी
जिन्होंने भेजी हैं अपनी बोरियाँ
जंगी मैदानों में रेत से भरी जाने के लिए।
अम्मा की ज़ुबान पर पड़ा है ख़ौफ़ का ताला
उन्हें कोई दुआ अब याद नहीं आती।
स्नेह सहित,
विजय प्रसाद
Vijay Prashad






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